श्री बीतक - प्रकरण ३६ | Beetak prakaran 36
॥ अथ दस नाम सन्यासी की विधि ॥
फेर दस नाम सन्यास जो, बोले इस्ट प्रमाण । मन्या सात मठ चार हमारे, परम हंस मत ए जान ॥१॥
प्रथम मठ मन्या पच्छिम की, मठ सारदा तहां आये । परम द्वारका क्षेत्र है, सुदेचर देवता सुहाये ॥२॥
भद्रकाली देवी सही, गंगा गोमती तीरथ । अनुभूति सरूपाचारज, सारे सब अरथ ॥३॥
कीटवार है सम्प्रदा, तीरथ आश्रम दो नाम । ब्रह्मा विस्णु हैं देवता, ए पच्छिम मन्या विश्राम ॥४॥
दूसरी मन्या है पूरब की, वन आरण्य दो नाम । भोग गोवर्धन है मठ, भोगवार सम्प्रदा ठाम ॥५॥
पद परसोतम क्षेत्र है, देवता है जगन्नाथ । बलभद्र और पद्माचारज, बिंबलाई देवी साथ ॥६॥
रोहिन्या महोदधि तीरथ, ए पूरब मन्या होए । इन आचारजन के मुखें, सुनी श्री राज नें सोए ॥७॥
त्रीजी मन्या जो कही, सुनियो ताकी विध । जोसी मठ आनन्दवार सम्प्रदा, पद बद्रीनाथ आश्रम है सिध ॥८॥
नर नारायण हैं देवता, गिरि परबत सागर नाम । नरा टोटका आचारज, पुन्यागिरि देवी ठाम ॥९॥
मुक्त क्षेत्र अलखा नदी तीरथ, ए त्रीजी मन्या जान । इन आचारजों ने कहयो, आपनो सबे प्रमान ॥१०॥
चौथी मन्या दक्षिण दिसकी, तीन नाम हैं ताहिं । पुरी भारती सरस्वती, श्रृंगेरी मठ है जाहिं ॥११॥
भूर्वार है सम्प्रदा, पद रामेश्वर क्षेत्र सत । संकर आद बाराह देवता, कामिक्षा देवी गत ॥१२॥
श्रृंगी ऋषि पृथ्वी धराचारज, टोक भद्रा तीरथ सार । चौथी मन्या को मतो, सुन्यो सबे विचार ॥१३॥
पांचमी मन्या जो कही, उरधा ताको नाम । ताको मठ सुमेर है, कासी सम्प्रदा ठाम ॥१४॥
ज्ञान पद कैलास क्षेत्र है, निरंजन देवता सत । माया को देवी कही, ईस्वर आचारज मत ॥१५॥
मान सरोवर तीरथ, पांचमी मन्या सोए । सुनके आप चित विचारिया, ए जग बाहिर नहीं कोए ॥१६॥
छठी मन्या की विध जो, बरनत अगम अगाध । दसों नाम का इष्ट है, भजत बोहोत विध साध ॥१७॥
मन्या छठी कही आतमा, मठ परआतम मूल । सत सन्तुष्ट कही सम्प्रदा, जोग पद परे न भूल ॥१८॥
नाभि क्षेत्र परमहंस देवता, मनसा देवी उर आन । चेतन व्यापी आचारज, त्रिकुटी तीरथ जान ॥१९॥
सरोवर क्षेत्र है सही, छठी मन्या विधि ऐह । एह बात है साथ की, लेत आप पर तेह ॥२०॥
अब मन्या सुनो सातमी, जंबू दीप भरत खण्ड माहिं । ब्रह्मापुत्र सिखा सही, सूत्र साखा ताहिं ॥२१॥
यग्यो पवित्र में सूत्र कहयो, बरने सत मठ चार । पच्छिम मठ पूरब द्विती, दो उत्तर दक्षिन सार ॥२२॥
चार मठ के चार ब्रह्मचारी, आनन्द सरूप चेतन प्रकास । हंस परमहंस बोध कुटीचर, सप्तमठ मन्या जास ॥२३॥
सातों मठ के सन्यासी, बोले सबे विचार । उपदेस बोध दीक्षा कहे आपनी, सो देखो तौल निरधार ॥२४॥
सात मन्या के सात मंत्र हैं, मन्या प्रथम पश्चिम सुहाये । तीरथ आश्रम दो नाम की दीक्षा, सो देखो चित ल्याये ॥२५॥
सातों मन्या के मंत्र
मंत्र- ॐ ह्रीं नीलहंसः सोऽहम् परमहंसः । ॐ सोऽहम् सिद्धान्त भास्करोऽहम् । स्वदेचर देवता । सोऽहम् ब्रह्मेति ॥
पूरब मन्या को मंत्र है, तारन हमारो जोए । वन आरन दो नाम की, दीक्षा सुनो अब सोय ॥२६॥
मंत्र- ॐ सोऽहम् मठः प्रतीच्यात्सर्वदिड मुखेन नमस्ते करोम्यहम् । जगन्नाथो देवता । सोऽहम् ब्रह्मेति मन्त्र:॥
उत्तर मन्या के नाम त्रय, गिरि परवत सागर । तिनकी दीक्षा कहत हों, सुनियो चित आगर ॥२७॥
मंत्र- ॐ सोऽहम् हंसः तत्वमसि अहं ब्रह्मास्मि । नारायणो देवता । सोऽहम् ब्रह्मेति मन्त्र:॥
तीन आचारज दक्षिन मन्या के, पुरी भारती सरस्वती मत । तिनकी दीक्षा मंत्र जो, सुनो कहत हों सत ॥२८॥
मंत्र- ॐ भूभुर्वः स्वः ब्रह्म ॐ क्लीं स्मीति सोऽहं आत्मा तत्वमसि अहं ब्रह्मास्मि सोऽहं हंसः । आदि वाराहो देवता । सोऽहम् ब्रह्मेति मंत्र:॥
मन्या ऊर्धा पांचमी, मठ सुमेर परवान । कासी सम्प्रदा ज्ञान पद, तिनकी दीक्षा सुनो जान ॥२९॥
मंत्र- ॐ नीलहंसः परमहंसः सोऽहम् तत्वमसि । निरञ्जनो देवता । सोऽहम् ब्रह्मेति मंत्रः ॥
छठी मन्या आतमा, पर आतम मठ होए । परमहंस है देवता, तिनकी दीक्षा कहों सोए ॥३०॥
मंत्र- ॐ सोऽहम् हंसः तत्वमसि पदं, ब्रह्मत्वं पद माया असिपदं । तत्पदं जीवो ब्रह्म । परमहंसो देवता । सोऽहम् ब्रह्मेति मंत्र:॥
सातमी मन्या जम्बू दीप में, भरत खण्ड मध आए । ब्रह्मा पुत्र शिखा सूत्र, तिनकी दीक्षा सुहाए ॥३१॥
मंत्र- ॐ ह्रीं नीलहंसः सोऽहम् परमहंसः । सच्चिदानन्दो देवता । सोऽहम् ब्रह्मेति मंत्रः ॥
या भांत सन्यास मत, दीक्षा मंत्र सब बिद्ध । और द्वादस परमहंस गायत्री, सुनी सतगुरें ताकी सिद्ध ॥३२॥
मात-पिता उधारण कारण, अपने पिंड और प्राण । पूरब जनम उद्धारवे को, मत सन्यास प्रवान ॥३३॥
जागृत कुल गुरु चरने बरन्यो, नसे कोट अघपाप । नारायण की है प्रापती, पारायण सब जग आप ॥३४॥
पच्छिम मन्या के तीरथ आश्रम, पूरब मन्या वन आरन । उत्तर मन्या गिरि परवत सागर, सबके तरन तारन ॥३५॥
दक्षिण पुरी भारती सरस्वती, यों दस नाम मठ चार । ए मत जुगान जुग चले आये, जे सुनाये तुम्हें सार ॥३६॥
वेद उक्त सन्यास मत, गुरूदत्त उजास । परमहंस परिब्राज का, संकर कहयो प्रकास ॥३७॥
सन्यास मत के आचारज, चारों जुग के जेह । तिनके नाम कहत हों, सुनियो चित दे तेह ॥३८॥
ब्रह्मा विस्णु रूद्र सतजुग में, त्रेता जुग में तीन । वसिस्ठ सक्ति परासर, ए देखो तुम चीन ॥३९॥
द्वापर जुग में दो आचारज, व्यास सुकदेव नाम । कलियुग में पुनि तीन हैं, गौड गोविन्द संकर ठाम ॥४०॥
संकराचारज के चार सिष्य भये, तिन में ब्रह्माचारज एक । दूजे पदमाचारज, तीजे नराटोटकाचारज विसेख ॥४१॥
चौथे श्रृंगी ऋषि कहे, तिन चारों के हैं सिष्य दस । सोई दस नाम सन्यास हैं, मारग बांध लियो जस ॥४२॥
ब्रह्माचारज के सरूपाचारज, तिनके हैं सिष्य दोय । एक तीरथ एक आश्रम, देखो दण्डीवान प्रसिद्ध होय ॥४३॥
पदमाचारज के बलभद्र, तिनके वन आरन । नरा टोटकाचारज, गिरि पर्वत सागर तरन तारन ॥४४॥
श्रृंगी ऋषि के उर्द्धाचारज, तिनके सरस्वती भारती पुरी । ए दस नाम विस्तार कलिजुग में, सन्यास सम्प्रदा प्रगट करी ॥४५॥
(प्रकरण ३६, चौपाई १७२७)
