श्री बीतक - प्रकरण ३७
अथ षट दर्सन की बिध
षट दर्सन बोले तबे, प्राचीन हम मत । सो देखो तुम समझके, भगवत प्रापत सत ॥१॥
चतुर्मुखी ब्रह्मा सदा, चार वेद नित्यान । अध्ययन अहनिस करें, पूर्व मुखें ऋग जान ॥२॥
अध्ययन उत्तर मुखें, करें अथरवन वेद । पच्छिम मुख तें बोलहीं, यजुर्वेद के भेद ॥३॥
दखिन मुख ते उचरे, सामवेद नित्यान । तिनके षट अंग हैं सही, कहों तिनके प्रमान ॥४॥
प्रगट भये मुख पूर्व तें, नैयायिक दरसन । पच्छिम मुख तें प्रगटे, तिनके कहों बचन ॥५॥
पातांजल और सांख्यमत, वैसेसिक परवान । पच्छिम मुख तें प्रगटे, तीन सास्त्र ए जान ॥६॥
मीमांसा दरसन चतुर, दखिन मुख तें होए । अति निरमल वेदान्त मत, उत्तर मुख ते सोए ॥७॥
एह विध खट दरसन भये, तिनके कहों प्रमान । खट आचारज हैं सही, नाम सुनो तिह ज्ञान ॥८॥
गौतम तें प्रत्यक्ष हुआ, न्याय सास्त्र प्रकास । मीमांसा दो मिल कही, जैमुन जी और व्यास ॥९॥
कर्म विवेक जैमुन कहयो, सारीरिक कृत व्यास । मीमांसा की दोय विधि, कही तुम्हें प्रकास ॥१०॥
कपिल देव तें सांख्य है, पातान्जल मत सेस । कर्ण देव वैसेसिक, सिव वेदान्त उपदेस ॥११॥
ए आचारज मूल हैं, छेऊ सास्त्र के लेख । वाद चतुर को करत है, भिन्न भिन्न मत देख ॥१२॥
नैयायिक दरसन की, भेद वाद विध आये । माया जीव ईस्वर त्रई, भिन्न अनादि सुहाये ॥१३॥
बीस एक परनालिका, सीढ़ी दुख की जौन । नास होय तब सुख को, प्रापत होवे तौन ॥१४॥
प्रसन कियो श्रीजू तबे, तुममें नही विचार । ईस्वर जीव विनास है, तुम्हारे बचन मंझार ॥१५॥
बीस एक सीढ़ियां कही, दुख की भारी जौन । तिन मध्य माया जीव सब, कहो सुख की सो कौन ॥१६॥
सूक्ष्म सरूप नित तुम कहयो, स्थूल कहत हो नास । बीस एक सीढ़ियन से, कहां नित को बास ॥१७॥
तब मीमांसा दरसनी, बोले कर्म प्रधान । कारण करता कर्म है, कर्म इस्ट प्रमान ॥१८॥
जीव ईस्वर ब्रह्म हैं, सब कर्मन को रूप । कर्म बिना कछु और नहीं, सदा अनादि अनूप ॥१९॥
श्री जी बोले प्रस्न तब, कर्म विषे हैं भ्रांत । ब्रह्म अखण्ड सरूप हैं, सदा एक रस जात ॥२०॥
कर्म तहां उपजे खपे, थिरता उनमें नाहिं । अहंकार मन का अमल, कर्म लगत है ताहिं ॥२१॥
अहंकार मन जीव में, तिहितें कर्मी सोए । मन पहुंचे नही ब्रह्म को, कर्म तहां क्यों होए ॥२२॥
माया ते पुनि रहित हैं, ब्रह्म सरूप समान । वेद सास्त्र में यों कहयो, तुममें ताना तान ॥२३॥
सांख्य सास्त्र के दरसनी, बोले तबै विचार । प्रकृत पुरुष सबके परे, सबको कारण सार ॥२४॥
प्रकृत पुरुष जब मिलत हैं, जगत प्रगट तब होए । भिन्नभये मिट जात हैं, हमरो मत यह सोए ॥२५॥
प्रकृत पुरुष तें कहत हो, जगत भयो सब एह । सूरज दृस्टें तिमिर रहें, एही बड़ो सन्देह ॥२६॥
महाप्रलय सब जगत को, प्रकृत पुरुष लों होए । रूप रहे नही प्रकृत को, मिले कहां ए दोए ॥२७॥
निराकार के मूर्त है, भेद कहो समझाए । प्रलय मध्य अस्थान कहां, रहे कहो सब भाए ॥२८॥
जो तुम अपनी बुद्ध कर, निराकार कहो ताहिं । तो मिलन कहो कैसे भयो, दोऊ भेद पुनि नाहिं ॥२९॥
वैशेषक दरसन तब बोले, सबको मूल काल मत खोले । काल पाए उपजत है एही, ख्याल खेलावत सबको तेही ॥३०॥
सबको खाए करत है नासा, एही रूप ब्रह्म को वासा । श्री जु प्रस्न कियो तब तिनको, मूल कहत हो काल जो सब को ॥३१॥
वेद वाक्य मध्य काल को नास, काल रहित है ब्रह्म प्रकास । कहयो श्रुति स्मृति के माहीं, काल तहां पहुंचत है नाहीं ॥३२॥
काल पाये उपजे सो बिनसे, उतपत लीन होय सब तिनसे । ब्रह्म माहीं उतपत लय नाहीं, सब तें दूर रहे सब माहीं ॥३३॥
कहयो सरूप ब्रह्म को ऐसो, तुम तो कहत हो सबलिक जैसो । अंग सबलिक माया माहीं, निर्विकार सब ही में नाहीं ॥३४॥
होय काल मध्य ब्रह्म सो नाहीं, या विध कहयो वेद के माहीं । निराकार तुम काले कहो, तैसो रूप ब्रह्म को लहो ॥३५॥
तब बोले पातांजल ज्ञानी, व्यापक ब्रह्म सकल मध्य जानी । एही भवन ब्रह्म को लेखो, व्यापक इतहीं है तुम देखो ॥३६॥
पिण्ड माहिं आठ अंग लेके, खोज कीजिये जब चित दे के । नाड़ी चक्र सोधिये जबहीं, मिले ब्रह्म आप में तबहीं ॥३७॥
आठ अंग योग के जेही, नाम कहत हों तिनके एही । आसन प्राणायाम जो कहिये, प्रत्याहार धारणा लहिये ॥३८॥
ध्यान समाध नेम जप जोई, आठों अंग योग के सोई । ज्योत रूप तुम ब्रह्म ही मानों, कारण बीज जगत को जानो ॥३९॥
उपजे उपजावे सब यामें, जगत रहत किरना सम तामें । बुद्ध विषे लेओ ऐ मत सार, ग्रहो चित में कर निरधार ॥४०॥
श्री जी पूछयो प्रश्न विवेकें, मेटो आसंका ए चित देके । ब्रह्म सच्चिदानन्द सरूप, जगत असत जड़ दुख को रूप ॥४१॥
सत वस्त ते सत ही उपजे, द्रव्य असत तें असत ही निपजे । इच्छा रहित ब्रह्म श्रुति के माहीं, उपज खपत तामें कछु नाहीं ॥४२॥
उपज खपत माया तें होई, वेद सास्त्र मध कहयो जो सोइ । वेद कहत माया में भास, तातें करत सक्त प्रकास ॥४३॥
किरना सूरज भेद न आए, माया ब्रह्म बीच बहु भाए । परस्पर प्रतिवादी दोऊ, एक पात्र मध्य रहे न कोऊ ॥४४॥
सत असत की जात है न्यारी, यामें रहे विचार बहु भारी । रहे प्रमान बचन सब केरे, यह बिध खोलो प्रस्न जो मेरे ॥४५॥
फेर वेदान्ती दरसन जेही, ब्रह्म बिना कछु कहत न तेही । माया को अनाद पुन कहे, माया सदा ब्रह्म मध्य रहे ॥४६॥
माया माहें ब्रह्म है व्यापक, सर्व देसी है सर्व लायक । ब्रह्म बिना दूजा जो देखे, तिनको हम अज्ञानी लेखें ॥४७॥
अणु तें तुम हस्ती लों जानों, एक ब्रह्म सब माहिं बखानों । इच्छा रहित सबन तें न्यारा, करता कर्म न कछु बिचारा ॥४८॥
साक्षी- जो तुम सर्वत्र ब्रह्म कहयो, तब तो अज्ञान कछुये नाहिं । तो खट सास्त्र भये काहे को, मोहे ऐसी आवत मन माहिं ॥४९॥
निराकार सब माहीं बिराजे, इच्छा रहित सदा छब छाजे । होत जगत कौन तें एही, मेटो आसंका तुम अब तेही ॥५०॥
ब्रह्म विषे माया कछु नाहीं, तीन काल रहित नहीं ताहीं । पुन अनाद माया को कही, ब्रह्म सर्वत्र माया बिध लही ॥५१॥
ब्रह्म मध्य माया कौन विध, तीन काल नहीं आए । सर्वत्र ब्रह्म किहि बिध लसे, भेद कहो समझाए ॥५२॥
पुन अनाद माया कही, कौन भाँत है सोए । निराकार साकार के, कहो भेद जो होए ॥५३॥
साखी- भिन्न आत्मा जगत ते, संकर कही प्रकास । पुन आत्मा सब में कही, कहो भेद प्रकास ॥५४॥
वेदान्तन से वाद बहु, भया जो मेला माहिं । कहाँ लों कहों बनाए के, देखो हते जो वाहिं ॥५५॥
कोई कहे सबे ब्रह्म है, तब तो अज्ञान कछुए नाहीं । तो षट सास्त्र भये काहे को, मोहे ऐसी आवत मन माहीं ॥५६॥
ए सबे षट दर्सनी, षट सास्त्र अचारज जोए । न्यारे न्यारे मत सबे, सुने श्री राज नें सोए ॥५७॥
तब सब मत मारग नें मिलके, कही श्री जी सों विख्यात । अपने मत हम सब कहे, अब आप कहो साख्यात ॥५८॥
कौन सास्त्र में कहां कही है, सो हमें कहो दे साख । नई राह है तुम्हारी, सो कहो हमें विध भाख ॥५९॥
श्री जी का जवाब
कही व्यास हरवंस में, देखो संत विचार । जनमेजय राजा प्रते, सुनो विरोध तज सार ॥६०॥
कही अनहोनी व्यासें नृपसों, नृप सुन पूछत सोए । ब्रह्म रूप मुनि प्रकट हैं, दुर्घट सब थे जोए ॥६१॥
नृप तब पूछी व्यास सों, सनकादिक थें सोए । तुम लों ऋषि बहु प्रगटे, क्या ब्रह्म रूप तुम ना होए ॥६२॥
तब व्यासें नृप सों कही, वे भये नहीं कोई काल । हू हैं प्रकट कलयुग में, प्रगट आए के हाल ॥६३॥
उत्तम पुरुष बिन और को, देवी देव न ध्याये । अकथ कथा नवतन कहे, जग सुन पूजे ताये ॥६४॥
ए व्यासें नृप सों कही, बहुत विध विस्तार । तिनकी साख जो देत हों, देखो संत विचार ॥६५॥
श्लोक- उक्तम् च हरिवंशे भविष्योत्तरे अभाविनो भविष्यन्ति मुनयो ब्रह्मरूपिणः । उत्पन्ना ये कलौयुगे, प्रधान पुरुषाश्रयाः ॥ कथायोगेन तान्सर्वान् पूजयिष्यन्ति मानवाः । यस्य पूजा प्रभावेन जीव सृष्टि उद्धारणम् ॥ (हरिवंश पुराण, भविष्य पर्व, अध्याय ४, श्लोक २१-२२)
या भांत वेद उपनिषद में, विध विध कही बनाए । और अस्टादस पुराण में, आगम सास्त्र लेखाए ॥६६॥
जो ग्राहक या वस्त को, सो लेवे चित ल्याए । ताको वेद उपनीषदें, हम सब दे समझाए ॥६७॥
तब सबने चित में लई, ए नहीं कहूं बंधाए । पूछिए धाम क्षेत्र संप्रदा, तब जवाब नहीं आए ॥६८॥
स्वामी विध संप्रदाए की, कहो साख दे सोए । ज्यों हम अपनी सब ने कही, त्यों तुम कहो प्रसंन होए ॥६९॥
करके गर्व बोले सबे, प्रस्न विविध विस्तार । साखा सिखा कहो आपनी, फेर कहो सूत्र विचार ॥७०॥
सेवन अपनो निज कहो, गोत्र इस्ट अरू जाप । साधन मंत्र पुरी कहो, कहो देवी परताप ॥७१॥
साला कहिए अपनी, क्षेत्र होए जो कोए । सुख विलास रिष देव जो, तीरथ सास्त्र जो होए ॥७२॥
ग्यान कहिए कुल आपनो, फल और द्वार प्रकास । कहां निवास कौन संप्रदा, कहो उत्तर प्रस्न उजास ॥७३॥
कृपा द्रस्ट बोले तबे, सुनो साध सब कोए । प्रस्न प्रस्न को उत्तर, तुमको दें हम सोए ॥७४॥
अकथ भेद अदभुत एह, चित दे सुनो तुम सब । कीजो हिरदे विचार, धरो दोस जिन अब ॥७५॥
श्रुति स्मृति की साख दे, कहों तुमें समझाए । ग्राहक हो चित दे सुनो, तो कलजुग भ्रम जाए ॥७६॥
श्री निजानन्द सम्प्रदाय
सतगुर ब्रह्मानंद है, सूत्र है अक्षर रूप । सिखा सदा इन सें परे, चेतन चिद जो अनूप ॥७७॥
श्लोक- ब्रह्मानन्दं परम् सुखदं केवलं ज्ञान मूर्तिम्, द्वन्द्वातीतं गगन सदृशं तत्वमस्यादि लक्ष्यम् । एको नित्यं विमलमचलं सर्वदा साक्षि रूपं, भावातीतं त्रिगुण रहितं सद्गुरं तं नमामि ॥ (स्कन्द पुराणे गुरुगीतायाम्)
श्लोक- यदक्षरं परं ब्रह्म तत्सूत्रमिति धारयेत् । सूचनात्सूत्रमित्याहु:सूत्रं नाम परं पदम् । तत्सूत्रं विदितं येन स विप्रो वेदपारगः । (ब्रह्मोपनिषद)
श्लोक- शिखा ज्ञानमयी यस्य उपवीतं च तन्मयम् । ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति ब्रह्मविदो विदुः ॥ चिदेव पंचभूतानि चिदेव भुवनत्रयम् ॥ (ब्रह्मोपनिषद)
श्लोक- आनन्द विज्ञान घन एवास्मि । तदेव मम् परमं धाम तदैव शिखा तदेवोपवीतं च । (परमहंस उपनिषद)
सेवन है पुरुषोत्तम, गोत्र चिदानंद जान । परम किशोरी इस्ट है, पतिव्रत साधन मान ॥७८॥
श्लोक- द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कुटस्थोऽक्षरः उच्यते ॥ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । (गीता १५/१६-१७)
श्लोक- अनादिमादिं चिदरूपं चिदानन्दं परं विभुः । वृन्दावनेश्वरं ध्यायेत त्रिगुणस्येक कारणम् ॥ (वाराह संहितायाम् गोत्रस्य साक्षी)
श्लोक- सिद्धिरूपासि चाराध्या राधिका जीवनं मम् । ये स्मृत्वा भावयन्ति त्वां तैरहं भावितः सदा । तत्र में वास्तवं रूपं यत्र यत्र भवद्दृशः । ममेष्टं च ममात्मा त्वं राधैव राध्यते मया ॥ (पुराण संहिता ६/३६,३८)
श्लोक- नाहं वेदैर्न न तपसा न दानेन न चेज्यया । भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवं विधोऽर्जुन ॥ (गीता ११/५३,५४)
श्री जुगल किशोर को जाप है, मंत्र तारतम सोए । ब्रह्म विद्या देवी सही, पुरी नौतन मम जोए ॥७९॥
श्लोक- राधया सह श्रीकृष्णं युगलं सिंहासने स्थितम् । पूर्वोक्तं रूप लावण्यं दिव्य भूषा श्रृंगम्बरम् ॥ (वाराह संहिता)
श्लोक- स्वकृत विचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया, तरतमतश्चकास्यनलवत स्वकृतानुकृतिः । अथ वितथास्वमूष्ववितथं तव धाम समं, विरजधियोऽन्वयन्त्यभिविपण्यव एक रसम् ॥ (भागवत १०/८७/१९)
श्लोक- ॐ ब्रह्म विद्यां प्रवक्ष्यामि सर्वज्ञानम् उत्तमम् । यत्रोत्पत्ति लयं चैव ब्रह्माविष्णु महेश्वराः ॥ (ब्रह्म विद्योपनिषद)
अठोत्तर सौ पख साखा सही, साला है गौलोक । सतगुरु चरण को छेत्र है, जहां जाए सब सोक ॥८०॥
सुख विलास मांहें नित ब्रन्दावन, रिष महाविष्णु है जोए । वेद हमारो स्वसं है, तीरथ जमुना सोए ॥८१॥
सास्र श्रवण श्री भागवत, बुद्ध जागृत को ज्ञान । कुल मूल हमारो आनन्द है, फल नित्य विहार प्रमान ॥८२॥
दिव्य ब्रह्मपुर धाम है, घर अक्षरातीत निवास । निजानन्द है सम्प्रदा, ए उत्तर प्रस्न प्रकास ॥८३॥
धनी श्री देवचन्द्र जी निजानन्द, तिन प्रगट करी सम्प्रदा ऐह । तिनथें हम यह लखी हैं, हम द्वार पावें अब तेह ॥८४॥
तो या भांत चर्चा बहुत, भई मेला में जान । साख दई सब सास्त्र की, अवगत गति जो प्रमान ॥८५॥
तहां पैतीसा के बरस में, भये निसान धूम्रकेत । खय भई एक मास की, इन समै जगत भयो अचेत ॥८६॥
साके विजयाभिनन्द के, पुकारत सब कलाम । ताको सबै पढ़त हैं, पर भूली खलक तमाम ॥८७॥
जीती फौज सिरे संसार की, कारज कारन विस्तार । तहाँ तमासा देखके, फेर के किया विचार ॥८८॥
दाउद पाण्डे की हवेली में, साथ को छोड़े जब । हरद्वार से होए के, आए के मिले तब ॥८९॥
इन समें खिजमत में, रहता था गरीब दास । खान सामा खिताब दीवान का, कहया कलाम खास ॥९०॥
एह लालदास को, हुआ था हुकम । इसी वास्ते आगे को, रखता था कदम ॥९१॥
(प्रकरण ३७, चौपाई १८१८)
