Kuljam.org

विषय-सूची

श्री बीतक - प्रकरण ३८ | Beetak prakaran 38

फेर श्री राज आए दिल्ली, आए मिले सब साथ । मास चार इत भये, फेर साथ के पकड़े हाथ ॥१॥

इत विचार करके, राखें एक तरफ सरूप दे । लड़ें छड़े होए के, देखें कैसा काम होवे जेह ॥२॥

तब अनूप सहर को, सब साथ को ले चले । तहां एक हवेली लेय के, सब साथ को रखे ॥३॥

इत रहत एक पाठक, अनूप सहर का चौधरी । दो दिन आया दीदार को, तिन सों चरचा करी ॥४॥

सीसा एक गुलाब का, आगे धराया तिन । उपली कछुक पेहेचान से, और न चीना किन ॥५॥

तहां साथ को राख के, फेर आये दिल्‍ली में । उतरे आय साहगंज में, आये बातें करी साथ से ॥६॥

साथ जो दिल्ली का, आये मिला सब धाए । तिन सबको परियान की, बातें करी बनाए ॥७॥

तहां सेती पाती लिखी, बिहारी जी ऊपर । एक सकस चलाया, सारी दे खबर ॥८॥

फेर इहां से चले, आए लाल दरवाजे में । साथ सबे मिल के, परियान किया तिन से ॥९॥

आसाजीत बुलाइया, सुनाए सब कलाम । सिफत जो तिन में, महम्मद अलेहु सलाम ॥१०॥

नबी और नारायण की, कछु सुनाई पहिचान । तब ऐ बात सुनके, खड़ भड़ पड़ी ईमान ॥११॥

हिन्दुओं के तरफ की, कछु न रही ठौर । इनमें तो कछु न रहया, बड़ा होत है जोर ॥१२॥

मैं देखत हों तुमको, बिन सिर के आदमी । कानों तो सुने हते, तुमको देखे इन जिमी ॥१३॥

अमल औरंगजेब का, और सरियत का अमल । तिनसों तुम लड़त हो, इत मोहे न पड़े कल ॥१४॥

तब विचार करके, छोड़ दिया इनको । विचार अपने साथ में, करे आपुस मों ॥१५॥

कौन नजीकी इनका, करें तिनसे मिलाप । कहें हकीकत आपनी, इनें छूट जाए सब ताप ॥१६॥

ऐ विचार करके, जाए मिले सेख सलेमान । तिनसों कहा हमको, मिलाओ सुलतान ॥१७॥

इन मिलाप श्री राज सों, किया था बेर दोए । इनके दिल में कुफर, कीमियां मांगे सोए ॥१८॥

इनको एक फकीर की, बात कही समझाए । बैठा फकीर पहाड़ में, तिनके भेजे हम आए ॥१९॥

तुम्हारे दिल के बीच में, जेता कोई मनोरथ । सो सारे तुम्हारे, पूरे करें अरथ ॥२०॥

एक दीन सब होवहीं, भागे सबरो ब्रोध । आपुस में लड़ मरत हैं, सो मिट जावे क्रोध ॥२१॥

और सब तुम्हारे दुस्मन, आपे होवे जेर । तुम्हारा सिर ऊंचा होवे, जाय लगे सिर मेर ॥२२॥

और जेता कोई कीमियांगर, करने वाले धात । ते कदम तुम्हारे पकड़ें, आधीन हो करें बात ॥२३॥

और डर सुलतान के, रहे न कोई कित । तुमको खुदा करे रसूल का, दीदार होवे इत ॥२४॥

जब ए बात लिख दई, तब डरा सेख सलेमान । तब इत की पातसाही, कौन करे सुलतान ॥२५॥

तब जवाब इनको दिया, इन फकीर की पातसाही । हकें दई दीन की, जाहिर की न दिखाई ॥२६॥

जो कोई होवेगा फकीर, हक ताला की तरफ । सो दुनियां मुरदार की, थूक ना काढ़े हरफ ॥२७॥

ऐह बात सुन के, देहेसत भई दिल में । ऐ बात बड़ी बुजरक, क्या मालूम होए मुझसे ॥२८॥

महामत कहें ए मोमिनों, याद करो हजरत । जो लड़ाई तुम करी, कायम करने क्यामत ॥२९॥

(प्रकरण ३८, चौपाई १८४७)

इसी सन्दर्भ में देखें-