Kuljam.org

विषय-सूची

श्री बीतक - प्रकरण ३९

लाल दरवाजे की हवेली में, श्री राजें किया हुकुम । लाल गोवरधन को कहया, जाए मुल्ला पूछो तुम ॥१॥

क्या कुरान में कहत हैं, कैसी हैं मजकूर । किनको ए ठहरावत, सो मुझ आगे करो जहूर ॥२॥

इन समय काम करन की, उरझ रही सब बात । कैसे कर पहिचानेगा, अपनी असल जात ॥३॥

लाल गोवरधन गए, एक मुल्ला पास मेहेजद । बातें सुनत मुल्ला की, आपुस में भई जिद ॥४॥

मुल्ला के बातन की, लालें भई पहचान । एतो हमारे घर की, तहकीक भया ईमान ॥५॥

गोवरधन के दिल में, डर रहे मुसलमान। पोहोरा औरंगजेब का, जिन कोई सुने कान ॥६॥

तिस वास्ते झगड़ा भया, लाल बातें करें मिने जोस । टूक टूक होवे इन बात पर, दुनियां थी फरामोस ॥७॥

दोऊ राह में लड़के, आये लाल दरवाजे सोय । राज आरोगन को समै, दिन रहया घड़ी दोय ॥८॥

ऊंचे अटारी पर, बैठे हते श्री राज । गोवरधन तहां पहुंच के, कही सुनी चरचा जो आज ॥९॥

इतनी बेर में तित हिं, लालदास आए पहुंचे । बातें सुनी तिन की, कही गोवरधन जे ॥१०॥

वहां की बातें सुनके, कहने लगा जब । ए जो लालदास नें, अरज करी तब सब ॥११॥

हमारा इन चटाई पर, मन होत है और । इहाँ सेती उठ जात हैं, तब चेहेन न रहवे ठौर ॥१२॥

तब भाई गोवरधन को, रीस चढ़ी बनाए । ऐ सब मोकों कहया, तुम जानत नाहीं ताए ॥१३॥

दोउ बातां श्री राज देख के, दिल में किया विचार । इनों की अकल ऊपर, मोहे कैसो इतबार ॥१४॥

इन समै श्री राज को, नूर जोस चढ़ियो जोर । आए जबराइलें जोरा किया, असराफीलें किया सोर ॥१५॥

मोंह आगे बिजलीय के, चमकत लेहेरां दई । तब श्री राज के मुख से, ए बातां पुकार कही ॥१६॥

कारखाना कागद का, ए सौंप्या लालदास । उदयपुर को जावहीं, भीम मुकन्द मोमिन खास ॥१७॥

गोवरधन भट्ट को कहया, सूरत जाओ तुम । अनूप सहर हम जात हैं, एह हुआ हुकम ॥१८॥

दई वस्तां जोस में, सेख बदल को हुकम । कागद लालदास को, मुकन्ददास तारतम ॥१९॥

बुध दई भीम को, गोवरधन को सूरत । मुकुन्द भीम उदयपुर, हम जात अनूपसहर इत ॥२०॥

भागी सारी उरझन, कोई न रहया काम । प्रात को उठ ले चले, अनूप सहर के ठाम ॥२१॥

महिना था आसाढ़ का, बरखत धारा अखण्ड । पोठी ऊपर बैठ के, पहुंचे अनूप सहर तत खिन ॥२२॥

मारग मिने चलते, दई मानिक औखद । पेट छूटा तहां जाए के, कछु न रही हद ॥२३॥

इन समय सरीर को, बड़ी भई कसोट । डर के लालबाई रोई, ले धनी की ओट ॥२४॥

तब आप दिलासा करी, जिन कोई डरो तुम । फिरी न मेरी सुरत, तब तुम्हें खबर करों हुकम ॥२५॥

उस बखत जबराईलें, बड़ा जो किया जोर । उतरे कलाम कादर से, करो खेल में सोर ॥२६॥

तौरेत किताब में, उतरी सनंधे तीस । सब खबर कुरान की, हकें करी बकसीस ॥२७॥

सनंधे लिख तैयार करी, विचार देखे सुकन । ऐह बानी सुनके, पीछा न हटे मोमिन ॥२८॥

इन मजल ऐसा हुआ, सब कारज भये सिध । अपने निज वतन की, आई जागृत बुध ॥२९॥

अब ए बानी सुनके, कोई न फिरे ईमान । जब पहुंचे सकुमार को, टूक टूक होवे सुलतान ॥३०॥

इन बखत पाठक के, कछु दिल में भई सक । देखी अन्दर विचार के, कैसी बात माफक ॥३१॥

पधराए अपने घरों, बिछौने कर साज । बातें राजें सब करीं, बीतक अपनी तहाँज ॥३२॥

तब एह सुन के, बहुत हुआ खुसाल । अरज अपनी करने लगा, माफक अपने हाल ॥३३॥

इहाँ सेती आये के, साथ को दिया दीदार । तुमको सैंया हुकम, जो भेजा परवरदिगार ॥३४॥

हुआ हुकम हक का, सेख बदल ऊपर । जाओ तुम सुलतान पे, देओ खुस खबर ॥३५॥

सेख बदल बिदा हुये, चले तरफ सुलतान । सनंधे सिर पर बांध, ले दिल में ईमान ॥३६॥

पहुंचे दिल्‍ली सहर में, बखत जुमें निमाज । ईदगाह चला गया, मैं पैगाम पहुंचाऊं ताए आज ॥३७॥

तहाँ खलक ठाड़ी रहे, चित्त न काहू एक ठौर । सेख बहुत पुकारिया, देखा दज्जाल का बड़ा जोर ॥३८॥

कोई कहे हिन्दवी मिनें, लिखे एह कलाम । बातां तो बरहक हैं, पर हमें रवा नहीं इस ठाम ॥३९॥

इन भाँत बातें सुनके, फेर आये अपने ठौर । गनीबेग की हवेली में, जाए पहुंचे और ॥४०॥

तहाँ सनंधें बाँचन लगे, बिना एक महम्मद । तब एक सैयद बोलिया, बात जेहेल की लिए जिद ॥४१॥

क्यों कुफर बोलत हो, है एक महम्मद अलेहु सलाम । एते पैगम्बर भये, तिन काहू नाहीं नाम ॥४२॥

तब सेख बदल सों, झगड़ा हुआ इत । उत से पीछे फिरके, घरों आये तित ॥४३॥

दिन दोए चार में, अनूप सहर से आये श्री राज । बुलाया सेख बदल को, पूछा पैगाम का काज ॥४४॥

तब सेख बदल ने, अपनी कही बीतक । मैं तो बहुत पुकारिया, इनों पीठ दई तरफ हक ॥४५॥

कोई कलाम हिन्दवी का, ल्यावत है दिल सक । काहू दिल में कुफर, कोई बात कहे बुजरक ॥४६॥

फेर बैठे विचार को, इन बातां सुनी न कान । लाल गोवरधन मिल के, जाए कहो सेख सलेमान ॥४७॥

तब फेर उत गये, जाए के किया मिलाप । सारी हकीकत कही, जाके सुने मिटे सब ताप ॥४८॥

आज मिलाऊं कल मिलाऊं, यों फिरते मास भये दोए । कबहूं कछु कबहूं कछु, जवाब करत हैं सोए ॥४९॥

कहे पहिले तो इन भेष सों, मिलत नहीं सुलतान । भेष तुम्हारा बदलो, तो सुलतान सुनाऊं कान ॥५०॥

यों करते विचारते, कछु न देखी साख । तब आपस में कहया, अब फिरो इन से आप ॥५१॥

लाल दरवाजा छोड़ के, आए सराए रोहिलाखान । ए कलाम पारसी में करें, तब होवे पहिचान ॥५२॥

तब एक मुल्ला पारसी का, हुकम हुआ दयाराम । बुलाय ल्याओ तिनको, लिखे पारसी में कलाम ॥५३॥

तब लड़के काइम को, बुलाय ल्याया दयाराम । राखा चाकर दे महिना, वास्ते लिखने इन काम ॥५४॥

सेखजी मीराजीय का, लिखया इत संवाद । तिन में सारी हकीकत, लिखी जो बुनियाद ॥५५॥

इनकी जिल्दें बांध के, रूक्के किये तैयार । ठौर ठौर पहुंचाये, जो थे सुलतान के यार ॥५६॥

पुकार करी घर घर, सब देखे मुरदार । राह खुदाइ के वास्ते, कोई न हुआ खबरदार ॥५७॥

उस्ताद सुलतान का, ए जो सेख निजाम । कोई दिन इनके इहां फिरे, ना लायक देखा इसलाम ॥५८॥

एक सौदागर सूरत का, रहे चांदनी चौक में । तिन पाया दीदार राज का, मिलाप था तिन सें ॥५९॥

तिन ने कहया मेरे पास, है दज्जाल नामा । तुमको मैं दिखाऊंगा, दज्जाल की सामा ॥६०॥

सो लेने के वास्ते, लाल जाए बेर एक । वह नित वायदा करे, बातें करे अनेक ॥६१॥

केतेक दिन फिराया, तब भया मुनकर । मेरे तपसीर है हुसैनी, जो बड़ी मातबर ॥६२॥

तब पूछा लालदास नें, उन में क्या खबर । कुरान अरथ पारसी, है जाहिर सब ऊपर ॥६३॥

ए बात लाल ने आए के, आगे करी श्री राज । हुकम हुआ लाल को, ले आओ तुम आज ॥६४॥

लाल फेर उनके घर गये, फिरते भए दिन चार । फेर लालें आए के कहया, याको झूठो लगत विचार ॥६५॥

उस बखत में हाजिर, बैठा था दयाराम । तिनने अरज करी, मुझे कहो ए काम ॥६६॥

तब श्री राजें हुकम किया, तुम ल्याओ हुसैनी तपसीर । बड़ी चाह है हम को, पहुंचे मजल मीर ॥६७॥

तब हुकम श्री राज का, सिर चढ़ाया दयाराम । अपने अस्नाओं रहत थे, तिनसों कहा ए काम ॥६८॥

हमारे अस्नाओं ने, पाती लिखी हम पर । हुसैनी मँगाई है, बहुत निहोरा कर ॥६९॥

तब उनने कहया, मैं करों तुम्हारा काम । तबहीं सुन हाजिर करी, दई हाथ दयाराम ॥७०॥

लिये चालीस रूपया, तिनमें दिए दो फेर । खुसाल हुआ दयाराम, जाए लगा सिर मेर ॥७१॥

वहाँ से लेकर धाया, आये पहुंचा पास श्री राज । ले तपसीर आगे धरी, ऐ हुआ सिध काज ॥७२॥

तपसीर को देख के, श्री राज भये खुसाल । बातें लगे करनें, आगे गुलाम लाल ॥७३॥

इन समय कायम के, तपसीर दई आगे । देख इनके मायनें, हमको सुनाओ ऐ ॥७४॥

प्रथम इन्ना इन्जुलना सूरत इन पढ़ी, जामें तीन तकरार । इसारतें सारी खुलीं, जो लिखीं परवरदिगार ॥७५॥

हम ही थे ब्रज रास में, हम तीसरे आये इत । ऐ तो वही बात है, जो हम को कही तित ॥७६॥

इन्ना आतेना सूरत, पढ़ी मुल्ला ने जब । जमुना ताल पाल की, हकीकत पाई तब ॥७७॥

जब चोट लगी श्री राज को, आया ऐसा हाल । ना रही उठने की ताकत, हुये अत खुसाल ॥७८॥

तीन रोज लग सेज से, उठ ना सके तब । सुने सुकन तपसीर में, कलाम रब्बानी जब ॥७९॥

साथ आगे बैठ के, चरचा करी बनाए । हुई खुसाली साथ में, लई साखें मिलाए ॥८०॥

एह खुसाली अपनी, पहुंचाई सब साथ । एह तो मोमिनों वारसी, जाके हकें पकड़े हाथ ॥८१॥

पाती लिखी उदयपुर को, और साथ सबन । तुम ठौर ठौर पहुंचाइयो, जो कोई साथ सैयन ॥८२॥

सुनियो भीम मुकुन्द जी, उद्धव केसव स्याम । हम पाती पढ़ी महम्मद की, सब पाई हकीकत धाम ॥८३॥

अपने घर की इसारतें, और न समझे कोए । और कोई तो समझें, जो कोई दूसरा होए ॥८४॥

इन भाँत की पातियां, पहुंचाई सब साथ । खुसाली तिनको दीजियो, जो लड़त दज्जाल सों बाथ ॥८५॥

इन समय नवतन पुरी से, आए पहुंचे प्रेमदास । नागजी संगजी सामिल, आये प्रमोधनें की आस ॥८६॥

ए आये दिल्‍ली मिने, सराए हवेली रोहिल्ला खान । एक दावा ले बैठे ईसे का, इनका तिन पर था ईमान ॥८७॥

थे गिरोह यहूदन में, इनों था मसनन्द का काम । अकस राखते दीन से, जो बरहक इसलाम ॥८८॥

रसूल साहिब की बात को, कबहू न सुने कान । खुदा एक महम्मद बरहक, तापर ना ल्यावें ईमान ॥८९॥

ए आये मजलिस मोमिनों की, इहाँ बिना महम्मद और न बात । ए देख ताज्जुब भये, बड़ी चरचा हुई खुदा की जात ॥९०॥

जब रूबरू भये राज सों, तब बातें करी मिने जोस । आप आड़े कछु न देखहीं, इलम था फरामोस ॥९१॥

जब चरचा करी हजूर नें, दई श्री देवचन्द्र जी की पहिचान । श्री महम्मद साहिब का, रोसन किया ईमान ॥९२॥

जो बात कही महम्मद नें, सोई रूह अल्ला कलाम । मिला दिखाये दोनों इनों को, ए हुआ दीन एक इसलाम ॥९३॥

जब ईसा महम्मद मिल गये, कलमा और तारतम । भागा दिल का कुफर, जाग देखी आतम ॥९४॥

कहे सुकन जब राज नें, बड़ा देख्या जोस । तब दीन यहूदन का, सब हुआ फरामोस ॥९५॥

तब अपनी जुबान सों, बातें कही ईमान । हम श्री देवचन्द्र जी को इत देखें, भई हमको पहिचान ॥९६॥

खुदा एक महम्मद बरहक, हमको रही न सक । सुनाई सनंध कलस की, ए तो है माफक ॥९७॥

हम तो तहकीक किया, तुम हो बीच इसलाम । तुम्हारी किताब का, हम लिख पावें कलाम ॥९८॥

हम भी सब साथ को, लिखेंगे सुकन । हम अब लों भूले थे, है इत बात मोमिन ॥९९॥

श्री धनी देवचन्द्र जी को, हम देखा है इत । तुम ईमान ल्याईयो, जो कोई होवे जित ॥१००॥

इन भाँत सब साथ को, पाती लिखी बनाये । सो पाती सब ठौरों को, दई सबों पहुंचाय ॥१०१॥

सेख बदल और नाग जीं, एक ठौर किये जब । संग जी सामिल होय के, ताम खिलाया तब ॥१०२॥

कुफर सारा दिल का, भाग गयी सब सक । एक दीन होए मिले, ल्याये ईमान ऊपर हक ॥१०३॥

इन भाँत बाईस दिन, रहे सोहबत में । प्रेमदास ने देखिया, बात इन किस्से सें ॥१०४॥

कहया प्रेमदास नें, हम सों बातें करते और । रूबरू में देखिया, ईमान ‍ल्याये इस ठौर ॥१०५॥

प्रेमदास रह गया, ए दोऊ चले अपने मुकाम । जिन बात को आये थे, सो कर चले काम ॥१०६॥

जब इत से पीठ दई, तब घेरे सैतान । बसबसा करने लगा, छीन लिया ईमान ॥१०७॥

साथ में जहां मिले, तहां बातें दुदिली करें । सब कोई लगे पूछनें, तुम काहे जात फिरे ॥१०८॥

तिन से कछु बातें करें, कछु लगाय के सक । श्री देवचन्द्र जी बिना, और न कोई हक ॥१०९॥

जब नवतनपुरी पहुंचे, अपने मित्र के पास । तहां जाय के कहया, बिन श्री देवचन्द्र जी न आस ॥११०॥

श्री देवचन्द्र जी को हम देखें, बैठे उन मुकाम । एक दीन करन का, सौंप्या उनको काम ॥१११॥

इतनी बात सुनके, उठ भागा मेहतर । रहों न पास तुम्हारे, झगड़ा हुआ यों कर ॥११२॥

ए सब मिल पीछे दौड़े, फिराये क्योंए न फिरे जे । कदमों लाग करें आजजी, बातें भूल के कही हम ऐ ॥११३॥

वे क्यों ऐे कर माने नही, जाए बैठे इक ठौर । समझाये समझे नही, बात न सुने और ॥११४॥

तीन दिन तहां रहे, बात काहू न सुने कान । बड़ा दुख भया साथ में, सुनके बात ईमान ॥११५॥

ऐ सब ज्यों त्यों करके, ल्याये अपनें घर । बातें जो इसलाम की, यों उठी दिल ऊपर ॥११६॥

फेर ठौर ठौर पाती लिखी, अपनें फिरे की । मत कोई ल्याइयो ईमान, तरफ श्री जी साहिब जी ॥११७॥

ए किस्सा इत का कहया, जो आया बीच दरम्यान । अब कहों ए बीतक, जो लड़ाई सुलतान ॥११८॥

महामत कहे सुनो साथ जी, जो तुम में बीतक । लिखी लोमोफूज में, तुम्हारे ताले हक ॥११९॥

(प्रकरण ३९, चौपाई १९६६)

इसी सन्दर्भ में देखें-