श्री बीतक - प्रकरण ४
श्री देवचन्द्र जी के स्वरूप की पहचान
या समै हरदास जी, एक दिन नीको ठहराय कर । कहया बाल मुकुन्दजी पधरावो, तुम सेवो अपने घर ॥१॥
ता दिन जो देखे सेवा में, समय प्रातः काल के । सरूप तो देखे नहीं, तब लगे तहां ढूंढ़ने ॥२॥
सरूप कहूं न पावहीं, भए हरिदास जी दिलगीर । सिंहासन सेज्या पर, पावे नहीं क्यों ए कर ॥३॥
लगे पूछने घर में, इहां तो कोई आया नाहें । तब जवाब तिनने दिया, इहां किन की ताकत जो आये ॥४॥
हरिदास जी विस्मय भये, सेवा बिहारी जी की कर । बाल मुकुन्द जी को ढूंढ़त फिरत, पस हुए यों कर ॥५॥
इन समें आये पहुंचे, श्री देवचन्द्र जी घर से । यह हकीकत सुन के, दिलगीर हुए मन में ॥६॥
और हरिदास जी सों, लगे बातें करने । यह चिन्ता तुम जिन करो, भई चूक हमसें ॥७॥
तुम तो हम को दे चुके, वस्त आई थी हम पास । एह हमारी भूल है, जो टूटी हमारी आस ॥८॥
हरिदास जी मानें नहीं, प्रसाद न लेऊं लगार । जब मैं दर्सन करों, तब मोहे होय करार ॥९॥
बिहारी जी को आरोगाए, दोउ बाल भोग राज भोग । आरोगने बाल गोपाल को, कर दियो संजोग ॥१०॥
घर में सब लोगों ने, और हरिदास जी नें । करने लगे सब एकादसी, श्री देवचन्द्र जी तिन समें ॥११॥
प्रसाद न लियो घर में, भयो वितीत दिन । इहाँ हरिदास जी बैठे रहे, दुख पाया अति मन ॥१२॥
यों करते मध्य रात, भई वितीत जब । हरिदास जी बैठे हते, कछु आंख मिची तब ॥१३॥
तहां आये बालमुकुन्द जी, साक्षात दियो दर्सन । अहो प्रभुजी कहां गए हते, हम ढूंढत कलपे मन ॥१४॥
कहया हम तो उतहीं बैठे हते, तो तुम क्यों न दियो दीदार । कही तुम मोको पधरावते थे, श्री देवचन्द्र जी के द्वार ॥१५॥
सो तुमको इन सरूप की, भई नहीं पहिचान । मैं इनकी सेवा न सह सकों, ना सह सकों अहसान ॥१६॥
जो दिलगीर होय श्री देवचन्द्र जी, एह बात सुन के । तो वस्तर सेवा दीजियो, तुम मोहे न दीजो इनें ॥१७॥
अब प्रभुजी तुम कहां हो, कही मैं बैठो वाही ठौर । यों करते आंख खुल गई, भड़क उठे यों कर ॥१८॥
जो अन्दर आए के देखहीं, तो बालमुकुन्द बैठे सिंहासन । फरि-फरि चरणों लगे, प्रफुल्लित हुआ मन ॥१९॥
हरिदास जी घर से चले, देऊं खबर श्री देवचन्द्र जी को । भई खुसाली दीदार की, मिले सामे बाजार मों ॥२०॥
हरिदास जी दौड़ उतावले, सीस नमाया चरन । कही हरिदास जी कहा करत हो, हाथों उठाया तिन ॥२१॥
कहया ए श्री देवचन्द्र जी, कहा खबर कहों मैं तुम । कही तुमारे सरूप की, पहिचान नहीं हम ॥२२॥
आज दिन लगे हम सेवते, कबहूं दरस नाहीं साक्षात । सो सरूप बालमुकुन्द जी, मोसों करी विख्यात ॥२३॥
सो तुमारे सरूप की, पहिचान कर दई । तुम इनको जानत नहीं, मोहे ऐसी बात कही ॥२४॥
और मेरी सेवा करन को, इन्हें देवो तुम जिन । जो होय श्री देवचन्द्र जी दिलगीर, तो दीजो वस्तर सेवन ॥२५॥
तब पूछा श्री देवचन्द्र जी, पाए बालमुकुन्द तुम । तब कहया हरिदास जी ने, चलो दर्सन करावें हम ॥२६॥
दोऊ जने बातें करते, खुसाल होय के मन । आये हरिदास जी के घरों, मगन होय रोसन ॥२७॥
दोऊ जने दीदार करके, लिया प्रसाद जो इत । सब घर के लोगों लिया, हुआ प्राप्त बखत ॥२८॥
इन विध भोजनगर में, भई कै भांत बीतक । ताकी एक भांत तुम सों कही, है बात बड़ी बुजरक ॥२९॥
जामा बांके बिहारी जी का, दिया सेवने को । श्री देवचन्द्र जी सिर चढ़ाय के, ल्याए अपने घर मों ॥३०॥
तहां जाय एक ठौर को, बनाई नीके कर । बासन सेज सिंहासन, तहां पधराये वस्तर ॥३१॥
लगे सेवा करने तिनकी, आप अपने अंग सों । चौका पानी रसोई, देह पछाड़े इन मों ॥३२॥
जल भर ल्यावें सिर पर, जो काहू की परछाई परे तिन पर । तो फेर ल्यावें और जल, सेवा करें यों कर ॥३३॥
रसोई करें विवेक सों, सेवा को सब साज । सेवा में चितवन रहे, मोको ए वस्त करनी आज ॥३४॥
चावल मूंग घीऊ खाड, कर जुदा श्री राज के काज । अपने वास्ते उतरती, जुदा बनावें साज ॥३५॥
और रसोई विवेक सों, करें नीके कर । आकार को प्रवाह ज्यों, पालत हैं यों कर ॥३६॥
जब इन भांत सेवा करें, लगे लीलबाई को लोग कहने । तुम ऐसी स्त्री हो घर में, श्री देवचन्द्र जी मेहनत करे हाथों से ॥३७॥
तुम क्यों रसोई न करो, जल क्यों न भर ल्यावो तेह । तुम चौका क्यों न देवत, चाहिए सेवा तुमको येह ॥३८॥
तब इत लीलबाई नें, करी आय के अरज । सब मोकों ताना मारत, करों सेवा अपनी गरज ॥३९॥
तब श्री देवचन्द्र जी ऐं कहया, नाहीं तेरो ए काम । कबहूं तेरो चित दुखायगो, जल भरते इस ठाम ॥४०॥
या और टहल करते दुखाय, तोको नहीं पहिचान । तब सेवा-धरम कहाँ रहयो, ना होय मेरे समान ॥४१॥
देऊं नहीं तिस वास्ते, मैं करों अपने अंग । है मेरो प्रेम सरूप सों, तामें होवे भंग ॥४२॥
सेवा करने न दई, सब करें अपने हाथ । हमेसा चितवन करें, रहें सेवा के साथ ॥४३॥
इन भांत एक दिन, हुआ ध्यान में दरसन । जाने हम ब्रज में गए, द्वार नन्द के रोसन ॥४४॥
जहां जसोदा जी बैठी थी, ऊपर मांची के । देखे दूध उटावते, टहेल करावते एह ॥४५॥
तहां आप श्री देवचन्द्र जी, ठाढे भये जब जाये । कहे आई जी आवो श्री देवचन्द्र जी, मन में महा सुख पाये ॥४६॥
जसोदा जी कहें तुम आरोगो, श्री देवचन्द्र जी इत । तब पूछा श्री देवचन्द्र जी ने, श्री कृष्ण जी हैं कित ॥४७॥
हैं कहां श्री कृष्ण जी, मैं करों दरसन । कही गये बन में खेलने, कहया है उत मेरा मन ॥४८॥
मिठाई घर में से मंगाय के, दई श्री देवचन्द्र जी के हाथ । उहाँइ जाय के आरोगियो, दोऊ मिलके साथ ॥४९॥
तहां आप श्री देवचन्द्र जी, चले तरफ जहां बन । तहां बाल गोपाल खेलते, कहां श्री कृष्ण जी पूछा तिन ॥५०॥
कहा कौन श्री कृष्ण जी तुम कहो, खेले टोले टोले लड़के । कृष्णजी नाम बहुतन का, कहा बेटा नन्द जी का जे ॥५१॥
नन्द के बेटे कृष्ण जी, इहां बहुत रहत । तुम किन को केहेत हो, कहा जसोदा बेटा इत ॥५२॥
बुलाय लिये देवचन्द्र जी, बैठाए अपने पास । बातें लगे करने, मुख मीठे प्रेम लिये खास ॥५३॥
इन समै इत घूंघरी, पकाई भोजन मों । छेड़े दोऊ छटके लै रूमाल, पानी निकालने तिन सों ॥५४॥
श्री देवचन्द्रजी मिठाई, जो ल्याए थे नन्द घर से । तिनको ले आगे धरी, दई लड़कों को बांटने ॥५५॥
कहया श्री कृष्ण जी ए बांट दयो, देवो हमको दो बांटे के । दिये उन लड़कों इन्हें, दोय भाग जो इनके ॥५६॥
और सामा सब के, हिस्से दिये दोय । श्री देवचन्द्र जी आप आरोगे, फेर ध्यान से चौंके सोय ॥५७॥
तब इनका विचार करके, तहकीक किया मन में । हमारा खावन्द एही है, चित्त बांधा इन सरूप से ॥५८॥
आरूगावन लगे इनको, दिल में कर विस्वास । दिल में ए ही उपजी, ब्रजलीला की रही आस ॥५९॥
कोइक दिन इन भांति सों, हुआ है गुजरान । इन भांत कई बिध की, कहा लों कहों पहिचान ॥६०॥
महामति कहे ए साथ जी, ए इत के कहे बयान । श्री देवचन्द्र जी के सरूप की, नेक कहों पहिचान ॥६१॥
(प्रकरण ४, चौपाई २५३)
