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श्री बीतक - प्रकरण ४०

रोहिल्ला खान की सराय में, बैठ किया विचार । हमको अब क्या करना, हुकम परवरदिगार ॥१॥

घरों रजवी खान के, फिरे दिन दस बीस । चरचा बात रसूल की, उम्मेद नहीं जगदीस ॥२॥

सेख निजाम के घरों, फिरत रहे मास एक । बातां को उतारनें, कह दिखाई अनेक ॥३॥

इन बात के वास्ते, कछू बात सुने इसलाम । और आज उनको ए कही, दुनिया तरफ तमाम ॥४॥

सेख बाजिद एक फकीर, सुना ए निगाह रखे इत । दस बेर उनके गये, बात सुने क्यामत ॥५॥

करी सोहबत सागर मल्‍ल सों, घरों गये दस बेर । चरचा सुनाई बीतक, पर हुआ न आगे जेर ॥६॥

पर इनकी सोहबत से, गये बखतावर के घर । तहां जाय चरचा करी, सुनावने के खातर ॥७॥

यों और कई जागा, फिरे घर घर कहने को । पर ईमान बोय बिना, क्या करे तिन सों ॥८॥

तब करके बैठक, करनें लगे विचार । ए पोहरा दज्जाल का, कोई होवे न खबरदार ॥९॥

फरज आपन ऊपर है, पहुंचावने पैगाम । जो कोई ईमान ल्यावहीं, सो दाखिल होए इसलाम ॥१०॥

तिस वास्ते पैगाम को, पहुंचावना जरूर । नलुवा लिख पहुंचाइये, तब ए सुने मजकूर ॥११॥

पास रोहिल्लाखान के, रहे मास चार । चांदनी चौक में आये के, करने लगे विचार ॥१२॥

तहां सेती आए के, रहे हवेली दुलीचन्द के । भया सोर सराबा उतहीं, टरे उन हवेली से ॥१३॥

तब इत दज्जाल ने, गुलबा किया अति जोर । काहूं रहने न देवहीं, बहुत करने लगा सोर ॥१४॥

बैठे जाय एक ठौर, करने लगे परियान । अब कासिद भेजिये, इनको दीजे निसान ॥१५॥

बैठे एकान्त एक ठौर, पांच किये समार । नलुये पाँच बनाए के, हाजिर किये तैयार ॥१६॥

हकीकत कयामत की, और पहिचान इमाम । हजरत ईसा आइया, हकीकत दीन इसलाम ॥१७॥

असराफील जबराईल, उतरे अरस से । और लड़ाई दज्जाल की, सब लिखी उन में ॥१८॥

आजूज माजूज जाहिर, उगा सूर मगरब । दाभा हुई जाहिर, ए सब लिखे सबब ॥१९॥

राह सरातल मुस्तकीम, रसूलें करी सरत । सो सबै आये मिले, फरदा रोज क्यामत ॥२०॥

इन भाँत की हकीकत, ए होए एक दीन इसलाम । इन सेती काफर फिरे, रखे रब्बानी कलाम ॥२१॥

कुरान हदीसों की साहिदी, देके लिखे बनाए । वास्ते फरज उतारने, ए पहुंचाओ जाए ॥२२॥

कानजी को कासिद कर, नलुये दिये हाथ । केतिक और सामिल किये, रहियो इनके साथ ॥२३॥

एक नलुआ सेख इसलाम पर, दूजा रजवी खान । तीसरा सेख निजाम पर, ए किनको होए पहिचान ॥२४॥

चौथा आकिलखान को, पाँचमा सीदी पोलाद । खबर करो तुम इनको, लिखी तुम्हारी बुनियाद ॥२५॥

काजी ने नलुआ लिया, पूछी फकीर की बात । कहाँ फकीर रहत हैं, कौन तुम्हारी जात ॥२६॥

हम कासिद पेटारथू, करें खिजमत अपने अरथ । हम मेहनत तिनकी करें, गाँठ से छोड़के देवें ग्रथ ॥२७॥

पहाड़ से भेजा फकीर नें, तुम्हें पहुंचावने पैगाम । कहया और भी काहू पर, के मुझ ही पर इस ठाम ॥२८॥

कही चार नलुये और हैं, तिनके लिये नाम । तिनके डेरे जात हों, पहुंचावने पैगाम ॥२९॥

तब काजी रजा दई, ले के जाओ तुम । तिनका जवाब ल्याओ, कैसा होत हुकम ॥३०॥

कानजी उहाँ से चले, द्वार आया सेख निजाम । नलुआ पहुंचाया अन्दर, हम आये ले करो काम ॥३१॥

सेख निजाम बुलाय के, पूछी हकीकत । तुमको किनने भेजिया, लिख के दौर कयामत ॥३२॥

तब जवाब दिया कानजीयें, हमको भेजा फकीर । सैयद महम्मद इबन इसलाम, बैठा गोसे एक तीर ॥३३॥

और भी काहू के कागद, के लिखे हमहीं पर । तब जवाब दिया कानजीयें, हैं पांचों ऊपर ॥३४॥

नाम कह दिखाये तिनके, एक दिया काजी इसलाम । अब मैं जात औरों घरों, पहुंचावने पैगाम ॥३५॥

तब सेख निजाम ने, दिया एह जवाब । पहुंचाओ सिताबी तिनको, मिल बिदा करें सिताब ॥३६॥

गया आकिल खान के इहाँ, उन किया इनकार । न मेरा नाम नलुए पर, हुआ न खबरदार ॥३७॥

फेर दिया नलुये को, लिखी लानत जिन । वास्ते बहुत पढ़े के, मोहर लिखी कानन ॥३८॥

गया रजवी खान के, नलुआ दिया हाथ । उनने खबर पूछी तिनकी, केते नलुये तेरे साथ ॥३९॥

तब कान जी भाई ने कहया, पहुंचाये चार पैगाम । रहया एक सीदी पोलाद का, जात हों तिस ठाम ॥४०॥

तब जवाब इननें दिया, पहुंचाय के आओ तुम । हम भी जवाब देएंगे, जैसा होवे हुकम ॥४१॥

वहां सेती चलके, आए सीदी पोलाद के घर । नलुआ दिया हाथ में, सारी कही खबर ॥४२॥

सुनों इनका उत्तर, मैं पाऊं सिताब । तब कहया सीदीयनें, औरों लेओ जवाब ॥४३॥

पाँचों पैगाम पहुंचाए के, आए मिले मोमिन । सारों की खबर के, बीतक कहे वचन ॥४४॥

ए हकीकत लेए के, दौड़े पासे श्री राज । कही सारी बीतक, जो गुजरी है आज ॥४५॥

फेर सवारे पहर में, कान जी फिरा सबन । एक डारे दूसरे पर, जवाब न दिया किन ॥४६॥

यों करते सबन के, फिरे पन्द्रह दिन । बोए ईमान है नहीं, बिना खास मोमिन ॥४७॥

जाए झुका सेख निजाम के इहां, मोहे देयो जवाब । तब जवाब इनने दिया, ए काम नाहीं सिताब ॥४८॥

ए तो इमामत का, दावा ल्‍याये तुम । ए तो काम सुलतान का, क्या जवाब देवें हम ॥४९॥

हम सब मिलके, एक ठौर करें जवाब । इत कै खलक मिलेगी, न होवे काम सिताब ॥५०॥

गया काजी के घरे, किया जवाब तलब । ना होवे काम एक मुझसे, जो मैं जवाब करों अब ॥५१॥

बात बड़ी ल्याये तुम, ए मुकदमा कयामत । मैं पढ़त पढ़त आजिज भया, डारा कागद तित ॥५२॥

हम पांचों इकट्ठे मिलके, देवेंगे उत्तर । तब तुम फकीर को, जाए के देओ खबर ॥५३॥

सीदी पोलाद के घरों, जाए के पहुंचे तित । तलब करी जवाब की, मुझे फकीर न देवे मेहनत ॥५४॥

सीदी ने जवाब दिया, ए काजी मुल्ला का काम । मैं क्या जानों कुरान की, हकीकत दीन इसलाम ॥५५॥

तब जवाब कान जी नें, तुम खबर करो सुलतान । ओ आपहीं जवाब देवेंगे, उन्हें सब पहिचान ॥५६॥

कहया हमारा बुता नही, बात न निकसे मुख । भूल चूक बचन कहें, तो बड़े पावें दुख ॥५७॥

तहां सेती फेर के, गया रजबी खान । तहां जाए जवाब को, पुकारा देओ दीवान ॥५८॥

मैं तुम पर ल्याइया, सादी के बचन । तुम सुन अपनें दिल में, करो खुसाली मन ॥५९॥

तब जवाब इन दिया, क्या सादी करें हम । आज ही कयामत ल्याया, चाहिये मारया तुम ॥६०॥

अजूं हमारे दिल में, रहे दुनियां की उम्मेद । जोरू लड़के घर की, छूट जात सब कैद ॥६१॥

हम कछु कहत हैं, लिख देओ दो कलमें । तो हम जायें फकीर पे, रूजू होवे तिन सें ॥६२॥

एह बात पांचन की, नही अकेले मेरा काम । ऐह बड़ा मुकदमा, काम दीन इसलाम ॥६३॥

इन भांत आजिज होए के, आया पास श्री राज । जवाब कोई न देवहीं, बहुत फिरा इन काज ॥६४॥

महामत कहें सुनो मोमिनों, ए नलुओं की बीतक । अब कहों आगे परियान की, कहों सो हकीकत ॥६५॥

(प्रकरण ४०, चौपाई २०३१)

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