श्री बीतक - प्रकरण ४१
रामचन्द्र वकील के, फिरे कोईक दिन । चरचा सुनाई बहुतक, ना देखा अंकूर मोमिन ॥१॥
उधोव दास गोड़िया, बड़ा भाई गंगा राम । दोए दिन सेवा करी, उत पाया विसराम ॥२॥
सुन्दरी एक सन्यासिन, मिली रेती में आए । दीदार कर पीछे फिरी, और नजरों न आया ताए ॥३॥
मास दोए नलुओं मिने, किया गुजरान इत । पहुंचावनें पैगाम को, दावत जो कयामत ॥४॥
फेर बैठे परियान को, जाए दूर बैठे श्री राज । आपस में मसलत करी, क्या करना है आज ॥५॥
साथ केताइक दिल्लीय का, और केताइक महाजर । मसलत करी बाग में, क्यों ए पावें खबर ॥६॥
एक बात दिल में, लेओ तुम्हारी बीतक । श्री देवचन्द्र जी तुम पर, भेज दिया है हक ॥७॥
और महम्मद साहिब आये, लेकर हक कलाम । सो ल्याये तुम्हारे वास्ते, कोई और न लेवे नाम ॥८॥
ए कलाम तुम बिना, और न काहू खुलत । ए मेहर कादर की, हुई तुमको इत ॥९॥
पैगाम को पहुंचावते, ए क्या करे तुम । जो कदी भेष बदले, तो डर नाहीं हम ॥१०॥
जो कदी मार डारहीं, तो हमें मरनें का नहीं डर । हम जागें अपने धाम में, हमको नहीं फिकर ॥११॥
ए बात सब द्रढ़ करो, दिल के बीच विचार । जैसा जिने उकले, सो तैसा कहो करार ॥१२॥
कोई कहेगा हमको, पूछी नही मसलत । तिस वास्ते मैं कहत हों, तुम जवाब करो इत ॥१३॥
ए तो राज के हुकमें, बैठे हैं आपन । ए तो निश्चे एहज है, हक बुरा न करे मोमिन ॥१४॥
दूसरे अपना अंकूर, ए जो है सकुमार से । सो जोरा क्यों ए न करे, थे एकठे वतन में ॥१५॥
तिस वास्ते पैगाम पहुंचावना, एही किया परियान । सबों बात आपस में, एही लिया दिल मान ॥१६॥
महामत कहें ए मोमिनों, ए बीतक कही हम तुम । आगे जो मजकूर हुआ, सो ऐ बतावें हम ॥१७॥
(प्रकरण ४१, चौपाई २०४८)
