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श्री बीतक - प्रकरण ४२

यों करते संझा समे, उठ आये अपने घर । फेर तहाँ रात को मिलके, बैठे मेहेजद पगथी पर ॥१॥

तहाँ जाए के सनंधे, गावत हैं कलाम । जोस भरे न देखहीं, दुस्मन खलक जो आम ॥२॥

नित ही उत जाए के, गावत हैं बानी । सक दिल में न आवहीं, करें सब अपनी मानी ॥३॥

जोस धनी सिर ऊपर, नजर नही संसार । निसंक चरचा करत हैं, परवाह नहीं लगार ॥४॥

नन्दलाल घड़यालची, ल्याया कबीले समेत ईमान । खिजमत में ठाढ़ा रहे, रहती थी पहिचान ॥५॥

और राजा राम जो, और बेटा सिवराम । दरसन को आवें नित, करें चरचा में आराम ॥६॥

मिल भाइयों मसलत करी, रूक्का लिख सुनावें कान । घड़यालची ले जायेंगे, चोहोड़े दरवाजे गुसलखान ॥७॥

तिन रूक्के में लिखा, जो कोई मुसलमान । तिनको खबर करत हों, तुम ल्याइयो ईमान ॥८॥

रूह अल्ला मिसल गाजियों, आये अरस से उतर । रसूल इनके सामिल, आये अपने वायदे पर ॥९॥

और असराफील आइया, जोस जबराईल आये संग । सो उतरे अरस अजीम से, खुद खसम के अंग ॥१०॥

सुन सावचेत होइयो, जिन करो गफलत । जो कौल तुम सों किया था, सो आया फरदा रोज कयामत ॥११॥

बिन सुने इन रूक्के को, जो बैठे इन दरबार । तिनको लानत खुदाए की, पहुंचे न परवरदिगार ॥१२॥

हम अपने सिर का, उतारत हैं फरज । सो हमको ढूंढ लीजियो, जाको होए गरज ॥१३॥

एह रूक्का लिख के, दिया हाथ नन्द लाल । गोंद लगाए रात को चोहोड़ियों, होए के दिल खुसाल ॥१४॥

तब घड़यालची ने, सिर चढ़ाया हुकम । रात को रूक्का चोहोड़िया, कछु न खाया गम ॥१५॥

जब हो गई फजर, हुआ रूक्का जाहिर । रूक्का पढ़ के पैठहीं, जो आवते थे बाहिर ॥१६॥

यों करते पढ़ते पढ़ते, दिन हुआ पहर एक । बांचत बांचत रूक्के को, कै पढ़ पढ़ गये अनेक ॥१७॥

सोर भया दरबार में, भई खबर सुलतान । मंगाए लिया रूक्के को, तब भई पहिचान ॥१८॥

खिजमत सेख सलेमान की, रूक्का पहुंचावत जब । गुस्सा किया सुलतान ने, सलेमान पर तब ॥१९॥

क्यों ए रूक्का आइया, तें न करी खबर । इन रूक्के से मालूम भई, ए फरियाद तुझ ऊपर ॥२०॥

पहिले तेरे घर में, भटक फिरे हैं जब । तें कानों जब न सुनी, उन रूक्का चोहोड़ा तब ॥२१॥

तोकों मैं जो रख्या था, इसी काम ऊपर । जिन इतमाम को करे, सबकी दे खबर ॥२२॥

दूर करों खिजमत से, है नही कामिल । दोस दे मन सों काढ़िया, इन में नही अकल ॥२३॥

एह खिजमत इन से, तबहीं लई छुड़ाए । बेटा अब्दुल्ला सेख निजाम का, दई खिजमत ताए ॥२४॥

ढंढोरा ए फिराइया, होय फरियाद जो कोए । मैं जाऊं जुम्मे निमाज को, आये हाजिर होवे सोए ॥२५॥

जब निकला जुमे निमाज को, खड़ा अब्दुल्ला आए । रूक्के जो फरियाद के, सब के लेता जाए ॥२६॥

आप खड़ा देखत, भये फरियादु अनेक । तामें लाल निरमलदास, ले गये अपना रूक्का एक ॥२७॥

रूक्का लेते बखत, अपना लिया इन । पढ़ रूक्का फाड़ डारिया, ऐ ना सुनों कानन ॥२८॥

एह रूक्का फार के, ले डारा बीच जेब । एह तो बात मोमिन की, करनी है मोहे गैब ॥२९॥

बहुत पुकारे मोमिन, क्योंए न सुने कान । एह हमारे वास्ते, खड़ा है सुलतान ॥३०॥

रूक्का चोहोड़न वाले हम हैं, ऊपर गुसलखान । गुस्सा हम वास्ते किया, ऊपर सलेमान ॥३१॥

क्यों तुम ऐसा करत हो, डरते नही खुदाए । दिल मोहोर आँख ऊपर, क्यों अकल आवे ताए ॥३२॥

एक दोए तीर लगे, चले घोड़े पीछे घसेट । तब विचार किया मोमिनों, ए बात न सुने नेठ ॥३३॥

एह खबर श्री राज को, लिख के भेजी उत । हम पैगाम पहुंचावनें, कमी करी ना तित ॥३४॥

पर हम इत क्या करें, पोहोरा बड़ा दज्जाल । बात हमारी ना सुनें, सब परे बस दज्जाल के हाल ॥३५॥

जिन भांत हम गए, सब लिख भेजी बीतक । पर हम इनको न छोड़हीं, तुम सिर पर खड़े हो हक ॥३६॥

एक लड़ाई हमारी, अब देखियो श्री राज । हुकम तुम्हारे से करें, पैगाम का हम काज ॥३७॥

अब हम लड़ने जात हैं, तुम रहियो हुसियार । तुम सिर पर हमारे खड़े, समरथ परवरदिगार ॥३८॥

ए क्या करे हमको, हम ग्रहे तुम्हारे कदम । तो इनको हम मारत हैं, कोई हटें न पीछे दम ॥३९॥

एह पाती लिखके, दई भाई कान जी के साथ । कान जी जाए के पहुंचिया, दई पाती हाथ ॥४०॥

श्री राज पाती लिख के, भेजा तुरत जवाब । तुम आकले न होइयो, मैं आवत हों सिताब ॥४१॥

मोसों मिलाप करके, तुम कीजो एह काम । फेर बैठ मसलत करें, एक जागा इन ठाम ॥४२॥

पाती पहुंची आए के, मिल बांची सब साथ । राह देखें श्री राज की, यहाँ लेनी दज्जाल सों बाथ ॥४३॥

यों करते दूसरे दिन, आए पहुंचे श्री राज । चांदनी चौक की हवेली, छत्री के घर इन काज ॥४४॥

रहत लालबाई इनमें, तहां आए कियो मिलाप । साथ बैठ मसलत करी, तब जवाब किए आप ॥४५॥

अब तुम्हें क्या करना, पहुंचावने पैगाम । साथियों जवाब दिया जोस में, हम टूक टूक होवें इन काम ॥४६॥

कोई बात की फिकर, हमारे मन में नाहें । जो डरे इन बात से, एक तरफ हो जाए ॥४७॥

हमको एक हुकम, तुम्हारा दरकार । और बात न जानहीं, बिना तुम परवरदिगार ॥४८॥

हम तो अपने वजूद को करें, कुरबान ऊपर इसलाम । हमको और न सूझहीं, बिना करे एह काम ॥४९॥

जोस इनों का देखके, श्री राज भए खुसाल । तब दिलासा दई बड़ी, देख मोमिनों हाल ॥५०॥

इनों को देखे आसिक, ऊपर दीन इसलाम । एह बकसीस हक की, नाहीं और का काम ॥५१॥

बातें करें जोस में, एक पे एक सरस । हुए मगन दीन में, करते हैं हंस हंस ॥५२॥

रसोई कर श्री राज को, अरूगाया इत । स्याम बाई राम राए, कदमों लागे इन बखत ॥५३॥

कोई ल्यावत मिठाई को, कोई और और साज । सब खुसाल होए के, अरूगावत हैं श्री राज ॥५४॥

इत खुसाल होए के, रजा दई श्री राज । जाए पधारो एकान्त, अब देखो हमारा काज ॥५५॥

महामत कहें ऐ मोमिनों, सुनियों एह बीतक । अब आगे तुमको कहों, जो हुआ हुकम हक ॥५६॥

(प्रकरण ४२, चौपाई २१०४)

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