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श्री बीतक - प्रकरण ४३

साथ सबे मिल बैठ के, लगे करने परियान । अब हमको क्या करना, ए क्यों ल्यावे ईमान ॥१॥

बिना आपा दिए, और ना लिया जाए । एही दिल में विचारिया, और नही उपाए ॥२॥

काएरों के दिल में, बड़ा जो पैठा डर । दिल में मुनाफकी थी, बनाए बातें करें ऊपर ॥३॥

एक आसिक इन भांत के, आगे धरे कदम । पीछे खड़े रहने वाले, सौंपी अपनी आतम ॥४॥

एक आसिक इन भांत के, तन मन दिया वार । कुरबानी एह सुनते, ऊपर परवरदिगार ॥५॥

एक लखमन इनमें, और सेख बदल । सिताब करें पहुंचावने, इनको न परे कल ॥६॥

और मुल्ला काइम, चाकर पैसों का । ‍इनको उपली पहिचान, ए था नानिया फिरका ॥७॥

और भीम भाई रहें, सूरत के महाजर । छोड़ कबीला संग रहे, थे फिदा इसलाम पर ॥८॥

भाई सोम जी खंभात से, आए मिले थे इत । घर इनके खंभात में, है कुरबान ऊपर बखत ॥९॥

नागजी सूरत से, चले छोड़ कबीला खास । इनको धाम धनी बिना, और न थी दिल आस ॥१०॥

खिमाई बुन्देलखण्ड से, आया ले ईमान । खिजमत करी तन धन सों, पूरी भई पहिचान ॥११॥

दयाराम दिल्ली मिनें, था ईमान लिए जोस । सेवा खिजमत में रहे, कबहूं ना थी फरामोस ॥१२॥

चिन्तामन ठठे मिने, ल्‍याए थे ईमान । खिजमत करी तन धन सों, पूरी भई पहिचान ॥१३॥

चंचल बड़े ईमान सों, रहे खिजमत में हुसियार । आस कबीला छोड़ के, मिला परवरदिगार ॥१४॥

रहे दुकान अपनी, एह जो गंगा राम । ईमान से खिजमत करे, रहें सेवा के काम ॥१५॥

बनारसी उगाही करें, ताजा ल्याया ईमान । आया ये खिजमत में, कर धनी की पहिचान ॥१६॥

और साथ बहुत है, कोई ईमान कोई मुनाफक । बैठे ए परियान को, पहुंचावने पैगाम हक ॥१७॥

आपस में मसलत करी, जाए जुमें मेहेजद । तहाँ जाए सनंधे पढ़िए, सिफत जो महम्मद ॥१८॥

तब पुकार आपस में पड़े, सुनेगा सुलतान । तब हमकों बुलावेगा, तब पैगाम सुनावें कान ॥१९॥

यह मसलत करके, जाए खड़े मेहेजद में । गावत सनंधे जोस में, आसिक होनें सें ॥२०॥

इमाम जो मेहेजद का, तिनने सुनी पुकार । उतर आया ऊपर से, सुनी सिफत परवरदिगार ॥२१॥

नाम सुनत इमाम का, बहुत हुआ खुसाल । मोमिनों मुख देख के, जोस भरे लिए हाल ॥२२॥

देखे तारा दीन के, नजर करी आसमान । रहमत रहमत करके, हुई हक सुभान ॥२३॥

मैं जाऊं सुलतान पे, लेके अपने साथ । बात तुम्हारी मैं कहों, ले चला पकड़ के हाथ ॥२४॥

अन्दर जाए के ये कही, आया पैगाम इमाम । मैं ल्याया लोग तिनके, तुम आइयो एह काम ॥२५॥

मोहोल में से सुनके, निकल आया सुलतान । हुआ ठाढ़ा चबूतरे पर, हाथ आसा एक सुने कान ॥२६॥

मोमिन तले चबूतरे, खड़े जाए निकट । जो लिखा लोमोफूज में, और भई खट पट ॥२७॥

तब पूछा सुलतान ने, इसारत सों आए । तब बोले इत मोमिन, कलमा जुबान चलाए ॥२८॥

फेर इसारत करी सुलतान ने, क्या मतलब है तुम । तब इनने जवाब दिया, दीन इसलाम के आसिक हम ॥२९॥

कछु मतलब अपना कहो, कछु मांगो मुझ से । कहया एक बात हम मांगत, रूबरू बातें करें तुम से ॥३०॥

हमारी बातों मिने, आवे न कोई दरम्यान । पूछो सुनो तुम हमसे, और न सुनावें कान ॥३१॥

फेर मोमिनों से पूछिया, कछु और कहो सबब । तुम्हें तो कह सुनाया, हमें नाहीं मुरदार का मतलब ॥३२॥

आसा लेके चूमियां, तीन बेर सुलतान । तब मोमिन बोले जोस में, हम चौड़ा रूक्का सुनाया कान ॥३३॥

पांच नलुए पाँचन पर, भेजे तुम खातर । एक काजी सेख निजाम पर, और रजवी खान पर ॥३४॥

चौथा सीदी पोलाद पर, ना लिया आकिल खान । सो सब तुम्हारे वास्ते, सुनो तुम सुल्तान ॥३५॥

इत खड़े सेख सलेमान, कांपे आगे खड़ा सुलतान । जिन ए मेरी बात को, अब सुनावें कान ॥३६॥

तब पूछा सुलतान नें, है तुम पे किताब । तब इन यारों कहया, हम मंगावे सिताब ॥३७॥

फेर सुलतान नें कहया, कछु मांगत हो तुम । कहया मांगें दीन महम्मदी, और न चाहें हम ॥३८॥

मोमिन बोले अपने जोस में, डर दिल भया सुलतान । और दूर खड़े सब कांपत, सुन सखत कलाम दरम्यान ॥३९॥

इन में दस तन एक खिलके, दो तन मुसलमान । तब इसारत ए करी, घर पहुंचाओ पोलाद खान ॥४०॥

तब मोमिन दुदले भए, आया गुरजबरदार । तिनने कहया कोतवाल को, सुनो एह विचार ॥४१॥

तब से आज दिन लों, ऐसा सखत न बोल्या कोए । सुलतान के मुंह पर, ऐसा मजाल न काहू होए ॥४२॥

इनों बातें करते करते, कोई न आया दृष्ट । इनकी बातां सुनते, काँपत सारी सृष्टि ॥४३॥

ओ तो कह पीछा फिरा, इसारत भई सीदी पोलाद । तुम इनकी बातां सुनियो, पूछ देखो बुनियाद ॥४४॥

इनों को नीके राखियो, खाने पीने की खिजमत । दिलगीर होने न पावहीं, मैं सौंपे तुमको इत ॥४५॥

इन समै दिल्ली मिने, घर घर पड़ी खड़ भड़ । जिनके घर के संग थे, तिने भया बड़ा डर ॥४६॥

दयाराम के घर में, बड़ा जो हुआ सोर । दयाराम के बदले, हम पहुंचावें और ॥४७॥

खाने पीने की बात जो, पुछाई कोतवाल इनों से । मोमिनों मन बिचारिया, करें परियान आपस में ॥४८॥

दस तन को लेए के, किए दो तन बराबर । संझा के समय मिनें, तब जाहिर हुई खबर ॥४९॥

एह खबर सुनी काजीए नें, दिन दूसरे सेख इसलाम । तब बुलाए अदालत में, पूछी बात तमाम ॥५०॥

काफरों नें सुलतान को, सक ल्याए बीच ईमान । तुमको ऐसा न चाहिए, जो रूबरू बातां सुनो कान ॥५१॥

क्या जाने किसी फन्‍द पर, भेजे होए दुस्‍मन । तुम तिनसों बातें क्यों करो, रूबरू अपने तन ॥५२॥

पूछाओ बात गुलाम सों, वह कहेगा आए तुम । जब मालूम होएगा, तब देखेंगे हम ॥५३॥

जो साहजहां के अमल में, कोई ऐसा ल्यावे तोफान । तो तबहीं मारे गर्दन, और बात न सुने कान ॥५४॥

इनको तो रहे उम्मेद, देखने को इमाम । तिस वास्ते चुगली न सुनी, बात रद्द करी तमाम ॥५५॥

रूबरू बात करने का, मान लिया सुकन । पाजी का पाजी भेज के, हकीकत पूछी मोमिन ॥५६॥

तब इन बात सों, हुए मोमिन हुसियार । श्री राज के ठौर को, किया न खबरदार ॥५७॥

तब सेख इसलाम सों, जब हुआ मजकूर । तब तिनों से कही, देओ जवाब कर सहूर ॥५८॥

हमारे पैगम्बर नें, क्यों ए फुरमाया तुम । हदीसा कुरान में यों कहया, जो दीजे कसाला गुम ॥५९॥

जो खुदाए और रसूल पर, ‍ल्याया होए ईमान । तापर कसाला पहुंचत, सुनो कलमा कान ॥६०॥

सुनके काजी रोइया, हमारे पैगम्बर कहया नाम । तब खलास करके, लगाए नेक काम ॥६१॥

ना हम काहू का धन लिया, ना कछु किया छिनार । चोरी भी हम ना करी, तो तुम ऐसा किया क्यों खार ॥६२॥

हम न सोहबत करें सुलतान की, न जाएं उनके घर । हम रहेंगे तुम पे, सुनो तुम खबर ॥६३॥

इन्ना इन्जुल्ना सूरत, पूछे तिनके माएनें । बताए दिए तिन को, राजी हुआ जान पने ॥६४॥

तब उनने सुलतान सों, कराई ए अरज । इनों की खिजमत मैं करों, सुनो मेरी गरज ॥६५॥

तबहीं हुकुम हुआ, ले जाओ अपने पास । इनों की खिजमत कीजियो, दिल से छूटी आस ॥६६॥

उनने इसी बखत में कहया, मंगाए मलीदे देवो इन । खिजमत करो इनकी, ना दिलगीर होए आपन ॥६७॥

ले गया अपनें घरों, रहनें को दई ठौर । ऊपर चौकी रहे सुलतान की, लोग बातां करें और ॥६८॥

दिन दूसरे बुलाए के, किया काजी मजकूर । तहां बातां लगा पूछने, सब कहने लगे जहूर ॥६९॥

भाई काजी के घर गए, जोस जोर हुआ बदल को । तिनका जहूर देखके, भागा अपनें घरमों ॥७०॥

फेर दिन तीसरे काजीएं, बुलाए अपने पास । दई किताब एक हदीस की, जिनमें मजकूर खास ॥७१॥

तब काजी कहने लगा, ए किताब बनाई तुम । तुम्हारी हकीकत सब लिखी, ए जो पढ़त हैं हम ॥७२॥

तब जवाब मोमिनों दिया, ए हमसे ना होए । तुम तो स्याने बहुत हो, क्यों न बिचारो सोए ॥७३॥

हम उर्दू बाजार से, ल्‍याए हदिया दे । ते बैठे हैं जाहिर, जाए पूछो उनसे ॥७४॥

तब काजी न बोलिया, पूछने लगा और बात । एक पहिले दिन का किस्सा, कर देओ विख्यात ॥७५॥

खिलवत अन्दर बैठ के, सुनी सनंधे दोए । बिना एक महम्मद की, नेक कहों दोजक की सोए ॥७६॥

तब राजी होएके, कहे फेर फेर गाओ सोए । खड़ा दारोगा बेतल माल का, सो नागर जात का होए ॥७७॥

तिनको प्यार करके, कहया सुनो ए कान । देखो तुम्हारे खिलके में, कैसा ल्‍याए ईमान ॥७८॥

ओ भागा इन भांत सों, जाने पैठों जिमी में । मों ऊपर जुलम भया, कहा कहों इन सें ॥७९॥

बड़ी दिलगिरी करके, भागा अपने ठौर । छोड़ दिया काजीए नें, बड़ा जो हुआ सोर ॥८०॥

अब लगा बातें पूछने, क्यों कहिए कयामत । दसहीं अग्यारहीं बारहीं लों, लिखी किन सरत ॥८१॥

तब जवाब मोमिनों दिया, ए बात बरहक । मिने दसहीं अग्यारहीं बारमी, है लिखी इसारतें हक ॥८२॥

तेरहीं में तहकीक, सब माइनें साबित । ए हादी से पाइए, खोल दे हकीकत ॥८३॥

तब एक दूसरे कों, सामें लगे देखन । ए तो बड़ा मुकदमा, बीच गिरोह मोमिन ॥८४॥

सवाल एक सक्सें किया, तुमको एते दिन बीच दीन । क्यों न करी निमाज़ को, ल्‍याए थे आकीन ॥८५॥

तब जवाब मोमिनों दिया, हमारी निमाज़ कजा न होए । जो मतलब दुनिया वास्ते, काम किया होए सोए ॥८६॥

तब निमाज़ कजा होवे, जो हम पकड़े मुरदार । हम वास्ते दीन इसलाम के, काम करें परवरदिगार ॥८७॥

तब हमारी निमाज़ को, कबहूं ना होए नुकसान । बैठे उठे चले बातें करें, सो सब निमाज़ ही जान ॥८८॥

तब कहया एक दूसरे सों, देओ इनको जवाब । मोंह वाए सारे रहे, मोंगे रहे विचार किताब ॥८९॥

फेर तीसरे दिन को, बुलाए पूछी बात । सुनाओ मोहे सनंधे, हम पावें अपनी जात ॥९०॥

लखमन भीम बैठ के, सुनाई एक सनंध । इमाम के मिलाप की, पर देखें ना हिरदे अंध ॥९१॥

मिलाप हुआ मेंहदी सों, तब कहया महामती नाम । अब मैं हुई जाहिर, देखा वतन श्री धाम ॥९२॥

एह बात सुनके, कहया अब रखो किताब । तीन बेर फेर फेर के, पूछा इनके बाब ॥९३॥

मिलाप भया इमाम सों, एह बात बरहक । हम तो उमेदवार हैं, तिन में नाहीं सक ॥९४॥

पर अब बात तुम छिपाओ, जिन करो जाहिर पहिचान । जब जाहिर होएंगे, तब हम कदम ग्रहें ले ईमान ॥९५॥

मोमिन तो हैं गरीब, बकरी जेता बल । पढ़े बाघ ज्यों बोलहीं, ए सीधे निरमल ॥९६॥

महामत कहे ऐ मोमिनों, ए काजी के घर की बीतक बात । अब कहों हादीए की, जिन खबर सुनी विख्यात ॥९७॥

(प्रकरण ४३, चौपाई २२०१)

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