श्री बीतक - प्रकरण ४४
मुलाकात सुलतान की, सुनी श्री राज नें जब । कान जी पहुंचा उसी दिन, बहुत गुस्से हुए जब ॥१॥
भेजे इनों तिनको, दिया कसाला जोर । अब लिए कहां जात हैं, मारों इस ही सोर ॥२॥
मैं भेजे मोमिन को, दे अपना पैगाम । तो गुना बैठा इनों पर, कोई न बचावे इन काम ॥३॥
जैसा मारना पैगम्बर, तैसा तिनके दोस्त । जाहिर होसी जहान में, इनों ऊपर अफसोस ॥४॥
सबों की लानत इनों पर, लिखी अल्ला कलाम । महम्मद से मुनकर हुए, इनों छोड़ा दीन इसलाम ॥५॥
पर इत ए क्या करें, जो लिखी लोमोफूज । तिसी माफक होत हैं, और न आवे बूझ ॥६॥
पहिले सिपारे मिने, पाने बासठ में बयान । वरक तपसीर का चौदमां, तहां लिखी ए पहिचान ॥७॥
आयत- मा यवदुल्ल जीन कफरू । (सिपारा १, सूरत २, आयत १०५)
मायने- खुदाए न दोस्त तिनका, के जो हैं काफर । जिनने ढांप्या हक को, किया परदा सब ऊपर ॥८॥
आयत- मिन् अहलिल् किताबि व लल् मुशरिकीन । (सिपारा १, सूरत २, आयत १०५)
मायने- ए जो एहेल किताब है, बीच गिरो जहूदन । ना मुसरक कहिए तिनको, खुदाए भेजे तुम पर इन ॥९॥
आयत- अैंयुनज्जल अलैकुम मिन्खैरिम्भिर्रब्बिकुम । (सिपारा १, सूरत २, आयत १०५)
मायने- भेजे उन जहूदन को, ऊपर पैगाम इसलाम । बड़ी नेकी ए जानियो, पावे राह खलक तमाम ॥१०॥
इन सेती नजीक, होवे परवरदिगार । ए वही मुराद महम्मद की, ए हुज्जत कुरान उस्तवार ॥११॥
जाए जमा सब चीजों का, ए जो रबानी कलाम । जहूद तिनके दुस्मन, बिन एहेल किताब तमाम ॥१२॥
करें जहूद लड़ाई मुझ सों, दूजे सरियत मुसलमान । मैं पाई सिफत महम्मद की, अब छोड़ों नही फिरकान ॥१३॥
एह झगड़ा दीन का, मसनन्द पैगम्बर । बाजे इसलाम की नकल करें, देवें ता ऊपर ॥१४॥
और मुसरिकों के दिल में, खाइस थी कछु और । पैगम्बर की वारसी, बलीद मुगीर के पहुंचे ठौर ॥१५॥
आयत- वल्लाहु यख्तस्सु बिरहमतिह मैंयशाअु । (सिपारा १, सूरत २, आयत १०५)
मायने- देवे खुदा खासतर, वही अपनी पैगम्बरी । जिन किसी को चाहे, तिन ऊपर उतरी ॥१६॥
आयत- वल्लाहु जुल्फ जलिल अजीमि । (सिपारा १, सूरत २, आयत १०५)
मायने- खुदा बुजरक साहेब, चाहे जिस दे फजीलत । दे पैगम्बरी तिन को, भांत करामात अजमत ॥१७॥
बुजरकी जो इसकी, न आवे बीच सुमार । मेहरबानगी उसकी, जादां गिनती पार ॥१८॥
आयत- मा नन्सख मिन् आयतिन् औ नुनसिहा नअति बिखैरिम्मिनहा औ मिसलिहा अलम तऽलम् । (सिपारा १, सूरत २, आयत १०६)
मायने- जिनको मैं रद करों, ले माएने कुरान से । ऊपर माफक मसलत, होसी खलकों में ॥१९॥
और माफक जमाने उसके, भुलावना करे उनको । निकाले इनों के दिल से, फरामोस होवे इन मों ॥२०॥
ल्याऊं बेहतर उससे, मनसूक जो आइतें । तिनका दृष्टान्त देत हों, तुम सुनियो चित दे ॥२१॥
एक गाजी मानिन्द, साथ दस तन के । तिन दसों को रद्द करके, किए दो तन बराबर ए ॥२२॥
मैं ल्याऊं मानिन्द उनके, और करूं मैं रद्द । वास्ते नफे मोमिन के, माफक सवाब इनके कद्द ॥२३॥
साथ रिवायत मसलत के, ए फिरना किबले का । बेतल मुकद्दस से, तरफ काबे के हुआ ॥२४॥
ना जानत लोग सरियत के, खिताब मुनकरों का रद्द । ए मुनकरी करी पैगम्बर से, तो हुए स्याह मुंह जरद ॥२५॥
बीच रद्द करनें जहूदों के, काफर लड़ाई करते । होवे इन बात से पसेमान, खुदा परवाह नही इनके ॥२६॥
ए है हिकमत इलाही, करी पातसाह मसलत । जो गाफिल हुकुम पैगाम से, सो रद्द बीच कयामत ॥२७॥
फुरमाया खुदाए नें, ए थे भूलन वाले । तो ए हुए मुनकर, तैयार हुए लड़ने के ॥२८॥
नही रखते हो मालूम, अब जानोगे तुम । जब खराब होओगे, हक के हुकुम ॥२९॥
आयत- अन्नल्लाह अला कुल्लि शैअिन कदीरून् । (सिपारा १, सूरत २, आयत १०६)
मायने- नेस्त करने ऊपर, इनों के ताईं खुदाए । है सब चीजों पर साबती, कादर है इप्तदाए ॥३०॥
चाहे ताको रद्द करे, करे चाहे नही पैदाए । है सत्ता सब ऊपर, जो चाहे सो करे खुदाए ॥३१॥
आयत- अलम् तऽलम् अन्नल्लाह लह मुल्कुस्समा वाति वल् अर्जि । (सिपारा १, सूरत २, आयत १०६)
मायने- साथ मोमिनों के तहकीक, है बेसक खुदाए । सब लायकी तिनको, ए लिखा इप्तदाए ॥३२॥
पातसाही जिमी आसमान की, है उनको सजावार । जैसा चाहे तैसा करे, कोई न बरजन हार ॥३३॥
आयत- व मा लकुम् मिन् दूनिल्लाहि मिंव्वलीयिंव्व ला नसीरिन् । (सिपारा १, सूरत २, आयत १०७)
मायने- छूट खुदाए तुमको, कोई न दोस्त होए । नफा पहुंचावे दीन में, ढूंढ़ा पाइये न कोए ॥३४॥
महामत कहें ऐ मोमिनों, ए कुरान की साख । ए तुमारी बीतक, कै भांतों लिखी लाख ॥३५॥
(प्रकरण ४४, चौपाई २२३६)
