श्री बीतक - प्रकरण ४५
लैल-तुल-कद्र
ऐसी साहेदियां कई, हैं बीच अल्लाह कलाम । सब बातें एही लिखी, अब सब पढ़ेंगे इसलाम ॥१॥
ए जो किस्से कुरान के, अलफ लाम मीम से लेकर । सो जहां लो खतम हुआ, सिपारे आम लो एही खबर ॥२॥
छत्तीसमी सूरत लों, कुल अऊज बिरब्बनास । जहाँ कुरान खतम हुआ, सब किस्से मोमिनों के खास ॥३॥
ए साहिदी इन्ना इन्जुलना, लिखी बीच इन सूरत । रसूल साहिब बातां करते, आगे असहाबों के इत ॥४॥
एक गाजी बनी असराईल नें, लोहा बांधा महिनें हजार । बीच राह खुदाए के, तरफ परवरदिगार ॥५॥
तब यार ताज्जुब भये, या रसूल अलेहु सलाम । हम छोटी उमर से, क्यों पहुंचे इसलाम ॥६॥
एह सकस कौन था, जिनका एह मरातब । तब जवाब रसूलें दिया, जबराईल एह सूरत लाया तब ॥७॥
आयत- अिन्ना अन्जलनाहु फी लैलतिल कदरि (१) व मा अद्राक मा लैल तुल कदरि (२) लैल तुल कदरि खैरूम मिन् अल्फि शहरिन् (३) तनज्जलुल- मलाअिकतु वर्रूहु फीहा बिअजनि रब्बिहिम् मिन् कुल्लि अम्रिन् (४) सलामुन हिय हत्ता मतलअिल फजरि (५) (कुरान, आम सिपारा ३०, सूरत ३६)
मायने- मैं उतारे बीच रात के, करो तुम विचार । किए साथ लैल तुल कदर में, ब्रज रास में विहार ॥८॥
फेर तीसरे लैल तुल कदर कही, सो तीसरा तकरार । हजार महिने से बेहतर, बांधे इने हथियार ॥९॥
हजार महिने के तेरासी बरस, भए महिना ऊपर चार । इन तें कहे बेहेतर, ताको मोमिन करो बिचार ॥१०॥
इनों लोहा बांधिया, एक सौ बीस बरस । दो नाजी गिरोह नाजल भई, आई उतर अजीम अरस ॥११॥
एक गिरोह मलायक नूर से, आई रूहें अरस अजीम । तामें सिरदार तीनों सूरत, कही अलिफ लाम मीम ॥१२॥
नव सै नब्बे नव मास से, रूह अल्ला जनम का नाम । तहाँ से एक सौ बीस बरस लों, लड़ाई करी तमाम ॥१३॥
इन लड़ाई के बीच में, मोमिन मुतकै दरम्यान । लड़ाई करी दज्जाल सों, लेकर दृढ़ ईमान ॥१४॥
तिन लड़ाई के किस्से कुरान में, लिखके भेजे हक । सो खोलें अपने आप ही, या तीन सूरत रसूल बुजरक ॥१५॥
रसूल मुहम्मद रूह अल्ला, और मेंहदी इमाम । ए चारों एकै तन हैं, ताको नाम इसलाम ॥१६॥
इन सेती जुदा पड़े, सोई है मुसरक । जो कोई इनों से लड़े, सोई दज्जाल बेसक ॥१७॥
उतरी गिरोह अरस से, इनों के रब हुकुम । कुल आमर इसलाम की, दई हक सुभान इन कुम ॥१८॥
जहाँ लों इनकी आमर, सो अखण्ड होए हैयात । सो लैल मेट फजर करें, सो पहुंचे असल जात ॥१९॥
इन लैल को सब कोई, ढूंढ़त चौदह तबक । सो किने न पाई आज लों, सो मोमिन खोलें मेहर हक ॥२०॥
सबों पहुंचाए कदमों, खोलें भिस्त के द्वार । सब दौड़ी खलक टिड्डी ज्यों, तिनों पाया परवरदिगार ॥२१॥
एही सिफत मोमिनों की, सो आवत नही जुबान । कह कह के केता कहूं, नहीं ताकत सुनने कान ॥२२॥
देख अपनी आँख सों, सब पुकारेगी आम । उठा परदा मुँह मुसाफ से, सबों खोले अल्ला कलाम ॥२३॥
जुध किया दज्जाल ने, जाहिर हुआ सोए । तुमसों मैं केता कहों, अब सब में जाहिर होए ॥२४॥
महामत कहे ऐ मोमिनों, नेक साहिदी दई तुम । अब तुमको बीतक कहों, तुम याद करो मिल कुम ॥२५॥
(प्रकरण ४५, चौपाई २२६१)
