श्री बीतक - प्रकरण ४६
अब तुम सुनियो मोमिनों, कहों जो बीतक तुम । लड़ाई करी दज्जाल सों, जमा एक ठौर थे हम ॥१॥
जब सरे तोरे को, हम ले गए पैगाम । तब ढांका जिन गिरोह नें, मरातबा इमाम ॥२॥
खुदा लानत है जिनको, तापर फिरस्ते फेरे लानत । सब मोमिनों की लानत, हुई बखत कयामत ॥३॥
सब आम लानत देवहीं, जिन इस इसलाम । हुई ख्वारी सब में, पुकारत खलक तमाम ॥४॥
लिखी सिपारे दूसरे, सयकूल जाको नाम । दज्जाल बैठा दिल पर, भानी राह इसलाम ॥५॥
सब खलक राह पावती, जो ए फेरत ना पैगाम । दीदार होता दुनी को, पढ़ों भान दिया वह काम ॥६॥
कानों तो बहरे कहे, भई आंखों ऊपर मोहोर । दीदे दिल अंधे कहे, तो सुन्या न एता सोर ॥७॥
मोमिन फरज उतारिया, पहुंचावते पैगाम । हुआ मसरक मगरब जाहिर, सब सुन्या खलक आम ॥८॥
तो भी ए ना देखहीं, दज्जाल में नाहीं विचार । के हमसे क्या गया अरू क्या रहया, ए न हुए खबरदार ॥९॥
बेत अल्ला पुकारही, सो भी सुने न कान । वसीयत नामें चार आए, ताकी भी न करें पहिचान ॥१०॥
वास्ते मतलब दुनी के, छोड़ दिया इसलाम । पैगम्बर को पीठ दई, रहे बीच दुनी के काम ॥११॥
मोमिनों ऊपर कसाला, किया इनों ने जोर । उन लड़ाई के बखत में, किया दज्जाले सोर ॥१२॥
तिस बखत हादीए ने, लिख भेजी पाती उत । सुनियो सो हकीकत, नेक कहों मैं इत ॥१३॥
जब थे कोतवाल के हवाले, तब लिख भेजे खास कलाम । वास्ते दिलासा मोमिनों, जिन दलगीर होवे इन काम ॥१४॥
ऐ पैगमर हक का, तुमे भेजे ऊपर इसलाम । तो इनों मारा पैगाम को, तो हुई लानत तमाम ॥१५॥
अब ए होत सरमिंदे, गरम होत दोजक । तुम पर मेहर हादीए की, है नजीक तुमारे हक ॥१६॥
तुम बैठे नजीक हक के, तुमें पलक न करें दूर । तुमारे मूल सरूप सों, जो हमेसा था मजकूर ॥१७॥
तिस वास्ते तुमको, अजमावत हैं इत । दिखाए बलाए कसाले, ए मुकदमा कयामत ॥१८॥
जो लड़ाई तुम करी, सो होसी रोसन चौदह तबक । मौत दज्जाल की इन में, सो तुमहीं भानी सब सक ॥१९॥
ए भूले तुमको देख के, ले मायने ऊपर के । अबलीस रान्या इन से, ले ऊपर के अरथे ॥२०॥
सूरत देखी आदम की, बीच निसबत थी हक । तासों रहया गाफिल, हुई लानत ऊपर सक ॥२१॥
सो अबलीस सबों दिल पर, करत पातसाही । तो इलहाम फेरा हक का, दुस्मनी से आई ॥२२॥
जान बूझ आपको, बुरा न चाहे कोए । पर ए काम अबलीस के, मारी राह इसलाम की सोए ॥२३॥
लिख्या लोमोफूज में, जो सेजदा आदम पर । सो अबलीसे ना किया, आप को बड़ा जान्या यों कर ॥२४॥
सेजदा सब जिमी पर, किया ऊपर खुदाए । सो सारे सेजदे रद्द हुए, तोख लानत गले हुआ ताए ॥२५॥
देखो कौन आदम कौन अबलीस, सब जिमी सेजदा किया तित । बची न दो अंगुल जिमी, सो कहां जिमी है इत ॥२६॥
ए विचार देखो दिल से, कौन आदम बिना रसूल । सेजदा ना किया किननें, किन नें भान्या एह सूल ॥२७॥
महामत कहे ऐ मोमिनों, यह बीतक सरियत । हुए स्याह मुंह सरमिंदे, हुआ दौर कयामत ॥२८॥
(प्रकरण ४६, चौपाई २२८९)
