श्री बीतक - प्रकरण ४७
आगे आपने पत्री लिखी सो शुरू
अब कहो मैं मजल की, जो हुई लड़ाई सरियत । भया कसाला मोमिनों पर, साबित करने क्यामत ॥१॥
तब पाती लिखी हादीए नें, करने खातिर जमा मोमिन । सिखापन सब विध की, सुनियो दिल रोसन ॥२॥
ए पाती दिल्ली मिने, थे कैद में हम । तिस वखत ले आइया, कान जी बदल हुकुम ॥३॥
लड़ाई के बखत में, उलटी भई फते । तब दिलासा सैयन को, पाती लिखी एह ॥४॥
अपने हाथे दस्तखत, लिखे मिने कलाम । तिनकी नकल कहत हों, सुनियों मोमिन इसलाम ॥५॥
मेरे प्राण के प्रीतम, साथ मेरे सिरदार । आतम के आधार हो, जीव के जीवन उस्तवार ॥६॥
मेरे प्रेम भीने श्री साथ जी, मेरे सांचे सूर धीर । पांव भर दिखावत रूहों को, तुम बैठे हो हक के तीर ॥७॥
जिन लज्जा वैराट बांधिया, तिन लज्जा दिया सिर भान । सब साथ का सिर ऊंचा किया, सो हुई तुमें पहिचान ॥८॥
आपोपा निसंक डारिया, मेरे साथ सब सोभा जोग । एक दूजे से सिरोमन, आगे कदम धरे इन भोग ॥९॥
साथ समस्त भाई लखमन, भाई भीम नागजी दोए । चिंतामन दयाराम, ए चारों कहे सोए ॥१०॥
चंचल गंगाराम जो, बनारसी जो सोम । और भाई खिमाई, ए दसों दाखिल बीच कोम ॥११॥
और भाई अनन्त राम, तुम सांचे सूर धीर । लालबाई स्यामबाई रामराए, तुम रहत हो तीर ॥१२॥
तथा साथ समस्त सूर धीर, और जो लड़ने वाले इन समे । और जो कोई आसा करे, ए कहया तिन सें ॥१३॥
वे सब श्री राज के चरण तले, रहियो आरोग तुम । सुख समाधान आनन्द मंगल की, ए पाती लिखी हम ॥१४॥
दृष्टि तुम पर श्री राज की, हूजो सदा सनकूल । लिखी वे जो मजलें, सो साथ सब का मूल ॥१५॥
इन्द्रावती की वासना, मैं लिखे प्रणाम कोटान कोट । अविधारियो तिन को, लीजो धनी की ओट ॥१६॥
ए श्री राज की दया से, मिल भेला होयेगा साथ । तब सुख समाधान आनन्द होए, धनी ऐं पकड़े हाथ ॥१७॥
तुम्हारे सुख समाधान आनन्द की, पाती को चाह जे । तुमारी हकीकत सब, कही भाई बदले ॥१८॥
ए जो मूल से कही, सो भई सब मालूम । बड़ा जुध किया दज्जालें, तैसा लिखा रसूलें वास्ते तुम ॥१९॥
तैसा ही ए जुध भया, और भी होएगा इत । लिखे माफक होएगा, ए जानो मुकदमा कयामत ॥२०॥
और आखर को तुमारा, ऊपर होएगा बोल । रसूलें भी यों लिख्या, कुरान हदीसों कौल ॥२१॥
हकीकत ऐ समझियो, आपन माया सों हुए बेजार । सिताबी काम क्यों न होत है, सब मिल क्यों न होत तैयार ॥२२॥
पर भाई एह काम, बोहोत बड़ा तुम जान । जो दिन जिन भांत लिखा है, सो तेती होए पहिचान ॥२३॥
तुम सूर धीर पना किया, सो तुम जिन जानों किया हम । ए हकें सोभा दई तुमको, ए होए न बिना हुकम ॥२४॥
ए काम बहुत बड़ा हुआ, अजू भास्या न तुमारे मन । तुमको हलका लगत है, है बात बड़ी मोमिन ॥२५॥
एते दिन इन जहान में, बोहोत डरते लेते नाम । हमको गरदन मारेगा, लेते नाम इमाम ॥२६॥
आपन छिप छिप रल झलते, फिरते थे सब ठौर । अब तुम जाहिर भए, लसकर महम्मदी करो सोर ॥२७॥
अब तुम इन जैसे होए के, पैठे इन अन्दर । थाना मेंहदी का थापिया, बैठे इनके मंदिर ॥२८॥
जब जाहिर तुम करी, अपना जो लसकर । गाम गाम सहर सहर, थाने थाने जाहिर होवे इन पर ॥२९॥
अब तुमारो तेज, दिन दिन बढ़ता जाए । बढ़ती बढ़ती रोसनी, सब खलकों को पहुंचाए ॥३०॥
और दज्जाल की कला, दिन दिन पल पल । घटती घटती घटहीं, उड़ जासी ख्वाब अकल ॥३१॥
दृष्ट दज्जाल की बाहिर, तुम को दई दृष्ट अंदर । तुम ऊपर उतरा असराफील, सब्दों इन ऊपर ॥३२॥
तुम जुध करते रहियो, तुमको लोचन दिये अनन्त । और दज्जाल की एक आँख, आखर इनको अन्त ॥३३॥
और एक समझियो, तुम दज्जाल सें । जुध किया भली भाँत सो, सो सब हुआ हुकमें ॥३४॥
दज्जाल की लड़ाई में, ज्यों पहिली सुअर की चोट । त्यों लड़ाई इन सों, आखर धनी की ओट ॥३५॥
सो चोट पहिले बचाइए, पीछे घाव मारो पीठ पर । मरोर न सके कांध को, लड़ ना सके क्यों ए कर ॥३६॥
तिस वास्ते ए यों कहया, सब जानवर के कांध में संध । इनके एकै नली गले मिने, हक तरफ है अंध ॥३७॥
एह बात तुम समझियो, बचाइए सामी चोट । सोतो तुम बचाए लई, अब होए तुमारे कदमों लोट पोट ॥३८॥
दाभतुल अरज का, मजकूर लिखा अलेहु सलाम । तहां छाती लिखी सेर की, सींग पहाड़ी बैल इस ठाम ॥३९॥
और पीठ लिखी गीदड़ की, तुम लड़ना तिन से । ए सूरत सब ब्रह्मांड की, तिस वास्ते लिख्या तुमें ॥४०॥
तिस वास्ते तुम इनसों, छले करना जुध । तिस वास्ते ऐसा लिखा, बस न होए बिना बुध ॥४१॥
पहिले इनके रूचता, तुम बोलियो जुबान । इनके होए इन्हें बस करो, रूचता ही करो बयान ॥४२॥
इनके गुलाम होए के, तुम करियो उत काम । ए थोड़ी इसारत लिखी, वास्ते दीन इसलाम ॥४३॥
पीछे तो तुम बुधवान हो, खिजमत कै भांत दिखाइयो रंग । बचन चोखा कहियो, हम रहे तुमारे संग ॥४४॥
जो खैरात पातसाही, लेते हैं फकीर । हम गुजराने तिन पर, तुम हमारे मुरब्बी मीर ॥४५॥
तिस वास्ते तुमारे कदम, छोड़े ना दम हम । तुमको कछू देने कहे, तो मांगियो हवेली तुम ॥४६॥
खाने को पेट माफक, और मुल्ला पढ़ावने कलाम । और कागद बेतलमाल से, होए रसूल अलेहुसलाम ॥४७॥
सो तुम इनसों मांगियो, हमको दे तालीम । हमको तरबियत करो, जो कलाम अरस अजीम ॥४८॥
जो तुमको न देवहीं, अपनें जान पने । पर तुम खिजमत न छोड़ियो, ज्यों चाह होए इने ॥४९॥
इनका रूचता नाचियो, रिझाइयो भली भांत । इतनी अरज कीजियो, बात कहें एकान्त ॥५०॥
कोई लड़काई बुध सों, राखियो नही सोहबत । भारी कर बुलाइयो, जब तुमें पूछें इत ॥५१॥
ज्यों बुलाओ अपने लड़के को, एह जवाब करो तुम । जो सवाब तुम लेत हो, तो अरज सुनावे हम ॥५२॥
जब कहें के कहो तुम, तब काजी हजरत । तिनसे तुम यों ही कहो, बात सुनो हमारी एकान्त ॥५३॥
जो कोई आवे हमारा, ताए सुनावें सनंधें कुरान । ओ आकीन ल्यावे रसूल पर, जिनको होए पहिचान ॥५४॥
जिन भांत हमको, आकीन दिया श्री मेहराज । त्यों हम रसूल दिखाए के, यों करें इसलाम का काज ॥५५॥
हमसों मुलाकात करे, खाए पिए हम में । साफ दिल होए रसूल पर, होए आकीदा इसलाम से ॥५६॥
तब कलमा कहे मुख से, मांगे नही तुम से । आस तुमारी ना करें, ना डर दिखाओ उने ॥५७॥
और जो तुम जाहिरी, खिलाने लगो गोस्त उन्हें । तो ढिग ना आवे तुमारे, बड़ा दोस होवे इनसें ॥५८॥
एक ठौर लेके, जागा होने देओ तुम । जब होवे उने पहिचान, तब फुरमाया करें सब कुम ॥५९॥
तब रसूल ऊपर आकीन, ल्यावेंगे सब कोए । तब फुरमाया क्यों ना करें, आवे हुकम तले सब सोए ॥६०॥
हम पेहले मिलाप किया, सेख सलेमान से । तब भी हम ए ही कहया, पर ओ बात ना सुने ॥६१॥
हम हाथ सेख सलेमान के, ए बात कहलाई सुलतान । रखो हमारे भेष को, तब सब खलक सुनें कान ॥६२॥
तो हम बोहोत खलक को, समझावें कलाम । तब कलमा कहे रसूल का, ए सब खलक तमाम ॥६३॥
पीछे हलके हलके सब कोई, कोई न फेरे फरमान । कबूल करेंगे तहकीक, तब इनों होए पहिचान ॥६४॥
पर तब सेख सलेमान नें, सुनाई नहीं सुलतान । अब पातसाह को सुनाए के, जो आवे इनें पेहेचान ॥६५॥
पीछे तुम निकलोगे, हटे ना कोई पीछे । सब दौड़ेंगे आपै से, पैठने इसलाम में ॥६६॥
जो फुरमाया रसूल का, सिर चढ़ावते तब । हमारा साथ बोहोत है, आवे दौड़ के सब ॥६७॥
श्री मेहराजें तिन को, दिया रसूल पर ईमान । पर हम पर कसाला पड़ा, ताथे हटे न ल्यावें पहिचान ॥६८॥
खुद को पूछ के, काजी मनावें तुमारा मन । तुम जानो त्यों समझाओ, ज्यों दाखिल होवे इन ॥६९॥
तिन पर जोर जुलम न करें, न पकड़े कलमें को । हदीसां देखे होवे, कलमा कहने मों ॥७०॥
कोई पकड़ काहू की ना करे, ठौर ठौर समझावें सेर । तिनको कुरान से, सब करे हम जेर ॥७१॥
ठौर ल्यावें सबन को, तब आवें श्री मेहराज । तब आवे वह फकीर, जहां खड़े तुम आज ॥७२॥
ए भी वही इसलाम है, हम खड़े उन पर सब । तुम चाहत दीन महम्मद का, बड़ी करत तलब ॥७३॥
चाहिये कूवत हक सुभान की, फकीर करत जो काम । सो तो सब हिकमत से, रास होवे इन ठाम ॥७४॥
जोर से कीजे मुसलमान, तो साफ न होए दिल उन । राजी न होवे इन पर, तो क्यों पावे कदम मोमिन ॥७५॥
तिस वास्ते एती तुम, जब कह के बुलाओ लड़के । तब समझाओ तिन को, पीछे बुध माफक करियो ऐ ॥७६॥
और बोहोत कह के, मता न जानो तुम । थोड़ा थोड़ा कहियो, फेर लिख कर भेजें हम ॥७७॥
पर एक बात बड़ी हुई, जो करे तुमारा विस्वास । अपना भी भेष राख के, काम करने की थी आस ॥७८॥
और हिन्दू के भेस से, होए नही ए काम । इन भेस सों मजलिस, परतीत न करे इसलाम ॥७९॥
ना इनें आवे परतीत, ना मजलिस बैठे । सो तो होने का नहीं, ना इन्हें विस्वास जेठे ॥८०॥
तिस वास्ते तुम इन के, होए के सेवक । एक मित्र पना करो इनों सों, तब ए पहिचानेंगे हक ॥८१॥
तुम होवोगे मुरीद उनके, सिध होवे सब काम । पर ए आस्ते आस्ते होवहीं, दाखिल इन इसलाम ॥८२॥
जब एती बात को, कबूल करे मुख से । तुम बुलाइयो लड़के, भेले रहियो इन में ॥८३॥
तुम हिन्दुओं के भेस से, जिन करो सरम । पहिलेई तुम सिर भान्या सरम का, तुम जानत एह मरम ॥८४॥
कोई तुमको मिले, ताए चोखा दीजो जवाब । देखो सब सास्त्रों को, क्या लिखा इन के बाब ॥८५॥
तीन काण्ड वेद वेदान्त के, वल्लभाचारज के मत । संकराचारज नें क्या कहया, क्या कहया गीता में इत ॥८६॥
अदित पुरान भागवत में, जैसा लिखा कलाम । तिन ऊपर तुम चलो, बीच दीन इसलाम ॥८७॥
तोलो मत सबन की, और अलेह सलाम । ज्यादा कम है किन की, सब मिल बैठे इन ठाम ॥८८॥
नबी नारायण की, सनंध मारियो मोंहों पर । तब होवेंगे सरमिंदे, तुम करो चरचा यों कर ॥८९॥
ए तो सब में रसमें, लड़त हैं अहंकार । जब फुरमान के मायने, जाहिर खोले परवरदिगार ॥९०॥
तब सब सरमिंदे होएंगे, रहे न काहू को गुमान । जो बसबसा छाती पर, करत है सैतान ॥९१॥
पकड़ बैठे अन्धेर को, और बढ़ता गुमान । सो सबे गल जाएंगे, और मारेगा सैतान ॥९२॥
तब सिर नीचा करके, आवेंगे भेड़ो न्यांत । अब सब जमा होत हैं, पर इन उल्टी ग्रही सब बात ॥९३॥
दरवाजा इसलाम का, कुंजी गंज खुदाए । सो हकें मेहर कर, दई तुमको पहुंचाए ॥९४॥
तुम सिर ऊंचो देखियो, जिन नीचा देखो तुम । जो तुम पर एक दोस बदले, तो दावा लेते कुम ॥९५॥
गोविन्द भेड़ा तुम जानत, ताको बल न चले लगार । एक पाच बरस को बालक, ऐ ताए न सके मार ॥९६॥
तुम साथी सिरोमन, एक दूजे थे सिरदार । गोविन्द भेड़ा तुमें क्या करे, हकें पहिले किए खबरदार ॥९७॥
अब तुम तो जने बार हो, और भागे तुम सों । सो अब ही आन मिलत है, सब एक होए तुम में ॥९८॥
अब तो तुम बार हो, तुम मिलसी बारे हजार । और ताबे तुमारे होएंगे, तुमहीं हो सिरदार ॥९९॥
तुम अपने सुकन को, अब जाहिर करो तुम । तामें तुमारा आवेस, इस्क जाहिर होए बीच कुम ॥१००॥
गाम गाम देस देस, हिन्दू मुसलमान । कदम तुमारे बन्दहीं, करके पहिचान ॥१०१॥
अब तुम तुमारी नजर को, जिन करो तुम और । जो कदी तुमें दिल में, आवे नही एह ठौर ॥१०२॥
तो हम और ठौर जाए के, मारें मोरचा फेर । लड़ाई करे दज्जाल सों, फेर आवें दूसरी बेर ॥१०३॥
एह विचार तो करें, जो तुमें उल्टे होए । जेते कोई मुसलमान, सब चरन बन्देंगे सोए ॥१०४॥
तुमको सब कोई धन धन, करेगा संसार । जो बानी इस्क देखेंगे, एह तरफ परवरदिगार ॥१०५॥
जो जोस तुमारा देखहीं, तो मारे बिना मरे । जोलों तुमारी बात को, सुलतान चितसों ना धरे ॥१०६॥
सो भी इस वास्ते, सुलतान न दिया कान । एक तो नजर ऊपर की, दूजी बातून की ना पहिचान ॥१०७॥
और इनके दिल में, हुआ है चौकस । जो हम पर दगा करनें, आए मेटन मेरा जस ॥१०८॥
और तीसरा एह, जो जाहिर होत इमाम । तब सरा तोरा दोऊ उठे, तोको न पकड़े काम ॥१०९॥
और बाहिर के अरथ में, मेंहदी ईसा दज्जाल । पकड़ेंगे वजूद को, मिट जासी सब हाल ॥११०॥
वे लड़ेंगे तलवार सों, बड़ा जुध होए दारून । सत्तर हजार काफरों को, मारेंगे मोमिन ॥१११॥
लोहू सब वैराट में, होए जाएगा सब । हाथियों के खरिहान, ए जुध होवे जब ॥११२॥
ना दाना पानी रहेगा, ना कछु रहेगा घास । तिस वास्ते इनको अरथ उपलो, जानत नाहीं खास ॥११३॥
और जो कयामत की, बड़ी जानी दहसत । करामात मेरे सरूप पर, मुझे आदमी देखे इत ॥११४॥
जैसे और आदमी, मोहे देखे तिन माफक । तो क्यों कर आवे ईमान, भागे क्यों कर सक ॥११५॥
जब तुमारे सुकन, अब फेर करो पुकार । तुमको इस ही वास्ते, किए बाहिर खबरदार ॥११६॥
अब तुम छिपे ना रहो, बड़ें उमराव होवें आधीन । सो तुम सों तालीम लेइंगे, जिन चिन्ता करो बीच दीन ॥११७॥
और कहूं नजर जिन करो, ना बैठक कीजो बन्ध । तुमारी बात छिपी ना रहे, बड़े ठौर मिल हुए अन्ध ॥११८॥
जैसे काम पर गए हो, सो तैसा ही दिखाइयो बल । ना तो सक आवेगा इनको, वही राखियो कल ॥११९॥
मैं तुमारे सिर पर, खड़ा हों एक पाए । और दिस हिन्दुअन की, नीके राखियो बनाए ॥१२०॥
जो तुमारे बल सों, उत मेरा जोरा होए । और बल मेरे से, ए तुम को माने सोए ॥१२१॥
सब भला होएगा, तुम जिन होओ दिलगीर । जो मोरचा तुम लिया, सो हकें दिया कर धीर ॥१२२॥
जरा तुम मन में, दगदगा ल्याओ जिन । ए लड़ाई है बचनों की, सो करनी ले आकीन ॥१२३॥
अब वस्त प्रकासहीं, अपनें ही बल से । पर एह बात जो, ना होए सिताबी से ॥१२४॥
माया छल रूप है, ताको छल ही से जीताए । आगे भगवान के, बल बोहोत कहलाए ॥१२५॥
तो भी असुरन सों, जीते हैं छल से । हर जी ब्यास सों जुध किया, सो तुम जानत हो दिल में ॥१२६॥
एक बचन हर जी कहे, मैं दस बेर लागों चरन । जब लाग आयो, तब उठाए कियो मरन ॥१२७॥
तब फेर तिन नें, पकड़े मेरे कदम । तिस वास्ते तुम बारहों, सब सरे सौंप्या तुम ॥१२८॥
जैसा बाजा बजे, तैसा ही कीजो निरत । पर बड़ी एह बात हैं, हिल मिल एक रस होना इत ॥१२९॥
पीछे तुमको सब, आप ही खुल जाए । आस्ते आस्ते होएगा, आप ही हक बताए ॥१३०॥
पहिले ए सुचित कर, सुनने बैठे जब । सो उनके हिरदे, बचन लगे तब ॥१३१॥
तब उनें दया उपजे, जब वह घाएल होए । तब चित दे इनों सुने, और तुम पर अनेक आबे सोए ॥१३२॥
तिनको तुम बचन कहो, तब मिट जाय अन्तराए । जाको होवे प्रकास, सो आपे ही जग जाए ॥१३३॥
तुम आकले होए ना उरझियो, सब काम दुरस्ती से होए । आकले काम सैतान के, ठंडे हक से होवे सोए ॥१३४॥
भाई बदल कानजी, भेजे हैं तुम पास । तुम परियान पक्का कीजियो, कानजी पास राखियो खास ॥१३५॥
जो होए तुमारी आज्ञा, तो हम पड़ें बाहिर । जो सकड़ाई में रखोगे, तो हम रहें जाहिर ॥१३६॥
पर हम उरझे रहेंगे, उपराला तुमें न सकें कर । आपना ना पाल सकें, तब काम होवे क्यों कर ॥१३७॥
जो तुम ए मोरचा, सिर ले ढाया । सखत दिल करके, तुमने पसारा किया ॥१३८॥
जैसे चित तुमारे, मेहेजद गए थे जब । फेर उस ही चितसों, सरीखी करो अब ॥१३९॥
और मोरचे की तलास, मैं भेजों तुमारे पास । या भेजों खुद पे, वे आए करें बात ॥१४०॥
ओ फकीर महम्मद, और उनके आवे कलाम । पीछे तें जैसी तुम लिखो, तिन ऊपर चले हमारा काम ॥१४१॥
जो मैं ठौर उहाँ करों, तो तुमारा उपराला होए । तुमको कहने को होए, तुमको मिलने चाहे सोए ॥१४२॥
जिस वास्ते हुई इनायत, सो ल्यावते थे तुम पे । पर तुम पीछे फिरे, इसलाम पर खड़े ऐ ॥१४३॥
और तुम भी इसलाम पर, ए पे तुम करो क्या । जो दिन रसूलें फुरमाया, सो ढील बीच देख्या ॥१४४॥
तो इनों ने अब, पीठ दई तुमें । अब होए रसूल का हुकम, हम जाए पास उनें ॥१४५॥
भी हक सुभान ने जिनको, सोभा देने वाले हैं और । हमको तहां खेंच के, पहुंचावे उनके ठौर ॥१४६॥
इन भांत का तुम भी, जनम का चाह किया । ऐसा जान हम तुम पर, एह मता दिल लिया ॥१४७॥
सांची सोई होवहीं, जो हक के दिल में होए । जो हमारा सोर सराबा सुने, तो आँख उनकी भी खुले सोए ॥१४८॥
और तुमको कहने को, होवे इसकी ठौर । तिस वास्ते विचार के, सिताब पत्री लिखियो और ॥१४९॥
आज इस ठौर में, हमारा नही फिरनें का दिन । पर क्या करें हक को, एही गमता है मन ॥१५०॥
तो हमारा क्या चलत, भया तहकीक ऐ । महामत कहे ऐ मोमिनों, और कहो हकीकत जें ॥१५१॥
(प्रकरण ४७, चौपाई २४४०)
