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श्री बीतक - प्रकरण ४८

आगे छोटी पत्री वोही में पुरजी

ऐ समाचार सुनियो, हम सूरत और सिद्ध पुर । और उदय पुर मेरते, लिखे आये हम पर ॥१॥

साथ भाई बदल के, लिख कर कहे बचन । पाती भी लिखी इत, विध करत हों रोसन ॥२॥

हम सकुमार बाई की, बात का किया विचार । ये तो साहिबी बोहोत बड़ी, घूना घून नाहीं सुमार ॥३॥

धुर लगे मजलिस, कर ना सके कोए । और अपनी बात को, क्यों समझे संदेसे सोए ॥४॥

जो संदेसा देए के, पीछे फिरिए घर । जोलो घूटन घूटन सों बांध के, सुनावे ना इन पर ॥५॥

एह बात तो तब होए, तिस वास्ते लिख्या तुम । ज्यों ब्राह्मण गायत्री सूद्र को, कहे सुनावे नाहीं हम ॥६॥

त्यों कुरान का मजकूर, हिन्दुओं न सुनावें कान । न उनकी बात आप सुने, तो क्यों कर होए पहिचान ॥७॥

तिस वास्ते आपन को, जात भेस उपले । सब गोविन्द भेड़े की तुमको, पहिचान जात भेख के ॥८॥

सो तो सास्त्र वेदान्त, साध पंथ पैड़ों में । सब कोई उड़ावे इनको, सब है चरचा इन में ॥९॥

कुरान देखे पीछे, बात महम्मद अलेहु सलाम । सब कड़ी हमारे घर की, है हमेसा दीन इसलाम ॥१०॥

तो हम जात भेख का, क्यों ना भानें सिर । संकुच करों किस वास्ते, ए भेख बदला यों कर ॥११॥

ऐसा जान हम बारह जने, पैठे बीच दरबार । सो हमको सकुमार ने, कहया मजलिसे यों कर ॥१२॥

धन धन कहे सब हमको, पीछे उनके मन में । हमारा भासा अवगुन, क्यों हिन्दू मुसलमान ऐसे ॥१३॥

किन ने भेजे आए हैं, कछू दगा है इन मन । ऐसा जान के साथ को, किए कोतवाल हवाले मोमिन ॥१४॥

काजीएं कहया कोतवाल को, जो सांच झूठ देखो तुम । ए कौन है कहां से आए, तुम चरचा कहो हम ॥१५॥

बहुत बातें हमसों करी, तिस पीछे कहया सुलतान । जो ए झूठे नही दगा नही, है मोमिन खास ईमान ॥१६॥

तब चौकी बैठाई थी, ताको दिए उठाए । हवेली का हुकम हुआ, इनों दिए बैठाए ॥१७॥

विकार इनके मन में, आया था सो गया । अब हम रहे हैं, काम सुचत का भया ॥१८॥

जिन सनंधे समझेगा, त्यों समझावें हम । अब हमारे काजी सों, मिलाप कर दिया तुम ॥१९॥

कोतवाल सों भी भया है, कागद सब सुलताने । मंगाये अपने पास, जमा किये अपने ॥२०॥

अब ए उच्चार करेगा, जेती बात जाहिर । सो समझावते खलक में, पड़ेगी बाहिर ॥२१॥

और बात की हम सों, जब करेंगे तलब । तब हम तुमको लिखेंगे, तुम एकान्त बैठो अब ॥२२॥

अब तो हम जाहिर, लसगर है इमाम । थाना थिर कर बैठे, ऐते दिन छाना करते काम ॥२३॥

सुलतान की जान में, होए बैठे जाहिर । अब तो हमको लखे, लख किए बाहिर ॥२४॥

तिस वास्ते हम भी, एक ही तरफ होयेंगे । तुमको दिल्ली के परवाने, खप होए तो भेजेंगे ॥२५॥

जब लों इन चरचा का, लगेगा बेसक । ऐसे कागद और दिलासा, लिख भेजें हुकम हक ॥२६॥

योंकर इन साथ को, ना उपजे विकार । गम दिल में ना होवहीं, रहे सनमुख परवरदिगार ॥२७॥

तुम भी पाती उनको, लिख भेजो निसंक कर । सिरे तुम सब साथ के, सामें हुए यों कर ॥२८॥

और बड़े मोहोरें मोहबड़के, आए लगे तुम । तिस वास्ते सब साथ को, पाव भरे हक हुकम ॥२९॥

अपना आपा निसंक, तुम डारयो सब साथ । तिस वास्ते लाहा ल्‍योगे तुम, पर हकें पकड़े हाथ ॥३०॥

दज्जाल के घाव तुमको, मोहों सिर पर लगे । आपन जुध कहते हते, सो तुम जुध किए ए ॥३१॥

औरों को कहने की पाती का, ए जो हुआ अब जोए । तुमारे कहने का, एह करने का होए ॥३२॥

सो तो तुम किया, अब खबर राखियो तुम । इन मोरचे खबर, एह लिखते हैं हम ॥३३॥

तुम भेला जो कोई मिले, तिनकी कीजो तलास । जेती वस्त तुम पास है, जैसे धनी की है आस ॥३४॥

जैसे तुम आप हो, तैसा फुरमाया धाम । तैसे भारी हूजियो, तैसे कीजो काम ॥३५॥

जैसा कलामों में है, तैसा ही भरयो पाए । एते दिन तुम मिने, आकार पकड़ बैठाए ॥३६॥

तिस वास्ते मेरा, चला जात मुलाज । अब मरजादा चलियो, राखियो मेरी लाज ॥३७॥

अब तुम एक दूजे से, भारी हूजियो तुम । अपने गुन बस कीजियो, बड़े मोहरे को लगे तुम ॥३८॥

तिस वास्ते नया जो आवेगा, तुमारी वानी चाल देख के । तिस वास्ते भारी होइयो, चाल भारी दिखाइयो ए॥३९॥

हो तुम जान सिरोमन, जो तुम साथ समस्त । तुम बुधवान विचष्यन, तुम पे बड़ी है वस्त ॥४०॥

तुम बड़ी बुध के खावन्द, क्या बहुत लिखिए तुम । अजान को लिखिएत हैं, तिस वास्ते बेर बेर कहा लिखें हम ॥४१॥

चार दिना आपन को, है पत्री से मिलाप । आकार मिलाप ना होवहीं, तिस वास्ते जानो आप ॥४२॥

दोए सुकन तिस वास्ते, चांप के लिखे कलाम । हमको चार दिना जाना पड़े, वास्ते इसहीं काम ॥४३॥

सो भी कारज कारन, जान परत आगे । नातो हमारा जाना न होए, सो जानो तुम ए ॥४४॥

तुम पाती लिखियो, सब साथ ऊपर । और नवतनपुरी, तथा खंभालिए पर ॥४५॥

तथा पोरबन्दर, तथा मंडई ठठे । तथा सूरत खंभात, तथा अहमदाबाद के ॥४६॥

और भरूच सिद्धपुर, तथा उदयपुर मेरते । सब साथ ऊपर, पाती लिखते रहियो ऐ ॥४७॥

बोहोत खुसाल होए के, वस्त का दिखाइयो बोझ । महम्मद ईसा इमाम, बड़ा बोझ दिखाइयो खोज ॥४८॥

सब को वस्त दिखाए के, खण्डनी लिखियो तुम । गल गलते रोते जिन लिखो, कहो चोखा लिखत हैं हम ॥४९॥

जो कोई तुमको, उत देवे दुख । तिसका सिर हम भान के, उत देवें सुख ॥५०॥

अथवा कोई साथ में, उलटा होए देवे कसोट । सो तुम हमको लिखियो, ताए बांध मंगाये करें चोट ॥५१॥

हम जो भेख बदल के, पैठे बीच दरबार । सों उलटों सीधा करनें, तरफ परवर दिगार ॥५२॥

मुसलमान सों हम तो डरें, जो श्री देवचन्द्र जी परखी न होए । खोजी रई बाई बासना परखी, सब साथ जानत हैं सोए ॥५३॥

जात भेस जो तुम रख्या, ताको श्री देवचन्द्र जी भान्‍या सिर । सो ना सकते जाहिर कर, अब समझे फिरके बहत्तर ॥५४॥

तो हम राज की आज्ञा से, जाहिर किए चौदे तबक । विकार सारी विस्व का, मेट दई सब सक ॥५५॥

ऐसी पाती लिख के, उठाए खड़े करो । चार बचन जिन भांत के, तैसे तहां धरो ॥५६॥

तैसे ही तिन ऊपर, लिख के भेजो तुम । जिनको जैसा घटता, ताको पाती लिखो सब कुंम ॥५७॥

तैसी बिहारी जी को, और नागजी अखई । नवतनपुरी भेजियो, जवाब आवत क्यों कर सही ॥५८॥

देखें बिहारी जी क्या लिखते, ए जवाब लेओ सिताब । ए पत्रियां लिख के, दुरूस्‍त करो अब किताब ॥५९॥

अब तो तुम केसरी सिंह हो, ऊपर पहिरी पाखर । काहू मुलाहजा जिन करो, कासिद को भेजो आखर ॥६०॥

कासिद तहां लों भेजियो, उनके दिल की ल्याओ खबर । कोई तुम से आप छिपावहीं, सो मालूम होवे इन पर ॥६१॥

जो जैसा तैसी तिनों, लिखियों तुम कलाम । ज्यों आगे अगिन के, मोम पिघलत तमाम ॥६२॥

और दयाराम के भाइयों नें, आगे आए दरबार । बातें इन भांते करी, ताए हम रूपैया देवें चार हजार ॥६३॥

जो इनको मार डारहीं, ऐसी बात सुनाई कान । हमारी सरम जाएगी, जो होएगा मुसलमान ॥६४॥

तिस वास्ते इहां इनको, गोविन्द भेड़े की निसबत । मार डारत भाई को, पैसे दे के इत ॥६५॥

वा‍स्ते अपनी सरम के, सब में एही स्वारथ । गोविन्द भेड़े इन भांत के, ए नजर में राखियों अरथ ॥६६॥

ऐसो होए स्वारथी, गोविन्द भेड़ा चौदे तबक । एह बचन दृष्टान्त वास्ते, लिखा बेसक ॥६७॥

तुम जान सिरोमन हो, भूलोगे न तुम । सब बात का बोझ जो, उठाए के लीजो कुंम ॥६८॥

तुम साथ मिने सिरदार, छाती काढ़ के कहे सुकन । वेद बन्ध की मरजाद, ताका सिर भाना मोमिन ॥६९॥

लोक मरजादा छोड़ के, मोरचा ढहाए मिने पैठे । तिन साथ में से, रहियो एक जागा के ॥७०॥

तुम जुदे इनसे जिन पड़ो, नातो चेहरा होए तुमे । पीछे कहोगे ना कहया, तुम समझो इन से ॥७१॥

जब लाग देखूंगा, तब मैं लेऊं बुलाए । या बुलाओ मुझको, बैठो साथ मिलाए ॥७२॥

बिना मसलत, जिन करो कोई काम । सब परियाने कीजियो, देख अपना धाम ॥७३॥

हम तुमारी पाती का, करेंगे विचार । जब तुम जवाब लिखोगे, तब हम चलें बाहर ॥७४॥

हंस खेल हरख के, बांधोगे कमर । तुम लीजो बोझ उठाए के, रहो दिल दृढ़ कर ॥७५॥

जो कदी आकार से, मैं जुदा रहों दो दिन । अन्तर गत दृष्टान्त, हुआ इलहाम रोसन ॥७६॥

तिस वास्ते भीम भाई की, खबर पूछियो उदयपुर । अजूं भी न समझया, तिनका कहा करों क्यों कर ॥७७॥

तिनसे क्या समझेंगा, नींद अन्तर हैं जोर । ए राज के हुकमें भई, ताए क्यों ए ना सकें मरोर ॥७८॥

तिस वास्ते एह भोम, है हांसी का ठौर । कोई न होवे जागृत, बिना हुकम कोई और ॥७९॥

अनेक भांत के मोहजल, नये नये उठत तरंग । इन में जो सावचेत, कोइक है धनी का अंग ॥८०॥

मेरे तांई तो इन समें, लिया है मोल तुम । तिस वास्ते तुमारी आतम से, मेरी होए न जुदी आतम ॥८१॥

ए निश्चे सत जानियो, मुतफे कुंन अलेह । आपोपा जरूर संभारना, बोझ आया सिर पर ऐह ॥८२॥

इहां की हकीकत, भाई सेख बदल कहेंगे । ताको सही जानियो, सुनियो कानों से ॥८३॥

सेख बदल आए पीछे, हमको बड़ो भयो सुख । हम तुमको मिलेंगे, तब हंस के भाने दुख ॥८४॥

हमको बड़ा हरख है, सब सुख में रहियो कुंम । दिन जागनी के आए नजीक, स्याबास लालबाई तुम ॥८५॥

तुम सूर धीर पना किया, आगे धरे कदम । अब सेख बदल आये सुख, पावे तुमारी आतम ॥८६॥

सुख समाधान आनन्द की, रहो लिखते पाती । सब साथ को परणाम, लालबाई को कहती ॥८७॥

महामत कहे ऐ मोमिनों, ए पाती की हकीकत । अब मुकदमा कहों, फरदा रोज कयामत ॥८८॥

(प्रकरण ४८, चौपाई २५२८)

इसी सन्दर्भ में देखें-