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विषय-सूची

श्री बीतक - प्रकरण ४९

अब दिल्‍ली छोड़ उदेपुर आए

कामा पहाड़ी से होए, आए बीच आमेर । दिन एक दोए रह के, पीछे आए सांगानेर ॥१॥

थे मुकुन्ददास उदयपुर, उहां से आए सांगानेर । तहां चरचा करने लगे, सुना सोर लड़ाई का जोर ॥२॥

तब उहां से चले, आए पोहोंचे आमेर । उहां श्री जी साहिब जी की खबर सुनी, फेर आए सांगानेर ॥३॥

तहां राह बीच में, सेख बदल मिले । तिनसों मिल चल के, आए पेंडे मवासियों के ॥४॥

तिनों ताके मारनें, थे पैसे बीच कम्मर । डर लगा बोहोतक, भागे उतथें फेर कर ॥५॥

तहां से आए पुर में, तहां एक दुकान पर । श्री जी साहिब जी बैठे देखे, एक खाट ऊपर ॥६॥

छबील दास आगे खड़ा, और मलूकचन्द नाम । दोऊ दुखी पड़े हते, छुदा जोर थी इस ठाम ॥७॥

घर में कछु न पाइए, जो मंगावे बाजार से । पहिचाने सेख बदल नें, कदमों लागे इन समें ॥८॥

मुकुन्द दास आए मिले, थे बसनी रूपैये सौ चार । मोल मंगाए बाजार से, चला कार वेहेवार ॥९॥

थे पैसे सेख की गिरह में, रूपैया सौ तीन । उन आए आगे रखे, लगे बातें करने आकीन ॥१०॥

किया परियान रात को, मुकुन्ददास मिल के । मुकुन्ददास के मन में, खेद हुआ दिल से ॥११॥

श्री जी साहिब जी के दिल की, लगे बातें पूछन । देखें कैसी मसलत करत हैं, हुआ कसाला ऊपर मोमिन ॥१२॥

तब श्री जी साहिब जीएं कहया, अब ना छोड़ों इनें । और इलाज कर मारहों, जड़ उखाड़ों बुनियाद पने ॥१३॥

जोर देखी हिम्मत, श्री जी साहिब जी के मन में । अब कहां को जाएंगे, विचार कहो हम सें ॥१४॥

इत जरगा पंथी बोहोत हैं, तहां आदमी मिले लाख । धनी बाबे का पंथ है, ए अपनी पूरे साख ॥१५॥

ए बात सुनके, मुकुन्ददास पर हुआ हुकम । तू देख बातें करके, उत बुलाओ हम ॥१६॥

मुकुन्द दास मलूक चन्द, चले उहाँ से जब । भील दौड़े तिन पर, भाग के छूटे तब ॥१७॥

मुकुन्द दास विचार के, आया उदयपुर गया लाधू । मसानी के इहां, करी श्री जी साहिब जी की फिकर ॥१ ८॥

उनसों जाए बातां करी, श्री जी साहिब जी के मिलाप । कबूल करी उननें, बुलाए ल्‍याओ तुम आप ॥१९॥

इन समें बनमाली दास, आए खंभात से । संग राम बाई गोदावरी, आए पहुंची इन समे ॥२०॥

मुलाकात करी इनों ने, तन मन दिया धन । मेला मोमिनों का हो चला, खुसाल हुआ मन ॥२१॥

श्री बाई जी और साथ, रहें आगरे में । मुकुन्ददास आए पोहोंचे, पाई खबर उनसे ॥२२॥

लाधू मसानी आइया, बीच दीन इसलाम । तिनने बुलाए तब, दई जगा रहने की ठाम ॥२३॥

तब श्री बाई जी को बुलाए, आप चले उदयपुर । साथ सब संग चले, पीछे दज्जालें किया सोर ॥२४॥

लाधू भाई के आए, उतरे उनके घर में । आदर भाव उन किया, हुई सेवा भली उनसे ॥२५॥

फेर लाधू मसानी के इहां, मुकुन्ददास दई खबर । उनसों मुलाकात करी, उन दिल में भई असर ॥२६॥

तब उन हवेली दई, उतरे उन ठौर । तहां चरचा होने लगी, रही बात न हक बिन और ॥२७॥

नया मंडान होए चला, साथ आवत बीच इसलाम । हुई वेद कतेब की चरचा, इत पाया विसराम ॥२८॥

इत चरचा होने लगी, जहां तहां हुई खबर । सब दीदार को आवत, चरचा सुनने पर ॥२९॥

अपने साथ के लोग जो, ताके चित भए सनमुख । दीदार श्री जी साहिब जी के, बड़ो जो पायो सुख ॥३०॥

दोए राजपूत हवेली मिने, तिन उत बैठे सुनी बान । तिनों को तारतम की, कछुक भई पहिचान ॥३१॥

इन समें नूर महम्मद सों, होए गई मुलाकात । गला चरचा सुन के, नीके सुनी बात ॥३२॥

इत एक सैयद बारात से, सुनी चरचा दीन इसलाम । ईमान ल्याया इन समें, देख मोमिनों काम ॥३३॥

और भीखू सोनी आइया, और राधा रूकमन । और सुन्दर सोना, आई कदमों मोमिन ॥३४॥

इहां मयाराम वास देव, और सुकदेव देरासरी । ए आए साथ में, श्री राज की मेहर उतरी ॥३५॥

इत जगीसा अमोला, इत आया केतेक साथ । चरचा उच्छव करत हैं, जाके धनीएं पकड़े हाथ ॥३६॥

यों मास चार भए, जो साथ लड़े संग सुलतान । तिनों ने अरज करी, लिखी ए पहिचान ॥३७॥

ए सरियत सों हम लड़े, देख आए नैनों निदान । बिना सोंटे इन पर, ए क्योंए न ल्यावें ईमान ॥३८॥

ए नीके हम देखिया, इनको नही ईमान । तो पैगाम को फेरिया, सुन्या न हुकम सुभान ॥३९॥

अब हम राह देखत हैं, जो हमको आवे हुकम । तिन माफक हम करें, जैसा लिख भेजो तुम ॥४०॥

तब पाती लिखी उन पर, उठके आइयो तुम । इन पर सोंटा होएगा, कादर के हुकम ॥४१॥

पाती सेख बदल ल्याइया, दिल्‍ली बीच मोमिन । सुनके सुख पाइया, दिल हुआ रोसन ॥४२॥

जाए सेख इसलाम पे, हमको रजा देओ तुम । हम जावेंगे अपने ठौर, हमको करो हुकम ॥४३॥

तब काजी ने कहया, मैं रजा कराऊं सुलतान । तुम परसों आइयो, आम खास सुनाऊं कान ॥४४॥

तब एक दिन बीच डार के, ले चला हजूर । सुलतान सामे ठाढ़े किए, आप हजूर किया मजकूर ॥४५॥

ए बिदा होत हैं, जात अपनी ठौर को । ए वही लोग हैं, जिन लड़ाई करी सरे मों ॥४६॥

तब काजी ने कहया, एही मोमिन उस दिन । तुमसों जिन मजकूर किया, ल्याए ईमान मोमिन ॥४७॥

देख्या सामें सुलतान ने, तीन बेर फेर फेर । सिर नवाए देखिया, दे खुदा इनों खेर ॥४८॥

एक सौ रूपैया खरच, देने का किया हुकम । सिताबी ले दौड़िया, लेओ मोमिनों तुम ॥४९॥

जब रजा दई सुलतान ने, तब राजी हुए मोमिन । बिदा होए के चले, रहे एक दूसरे दिन ॥५०॥

आए पोहोंचे उदयपुर, मुलाकात करी श्री राज । भेख बदल सामिल भए, भए इसलाम के काज ॥५१॥

एक लखमन भीम भाई, स्याम दास खिमाई । सामलदास गरीबदास, और संग लालबाई ॥५२॥

स्यामबाई राम राए, ए आए पोहोंचे कदम । मिलते ही सुख पाइया, इनों सौंपी आतम ॥५३॥

इन समें उदयपुर में, बड़ो भया चरचा को पूर । दरसन राज के होवहीं, बड़ा रोसन हुआ जहूर ॥५४॥

साथ आहेड़ का आइया, और मोटी बाई । मसकरी राज सों करें, खुसखबरी राज सों पाई ॥५५॥

रांणे ने ए बात सुनी, अपनी मजलिस में । नित्य लोग आए कहें, अस्तुत निंदा सुनें ॥५६॥

कोई कहे बड़े साध हैं, इनके अनन्त लोचन । कोई कहे ए ठग हैं, इनों भेख धरा मोमिन ॥५७॥

कोई कहे मुसलमान हैं, भेजे हैं सुलतान । तुमको मुसलमान करनें, कहे वचन बिन पहिचान ॥५८॥

कोई कहे कुरान पढ़त हैं, कोई कहें वेद कतेब । इन भांत राणे आगे, बातां बतावें ऐब ॥५९॥

राणें पंडित भेज दिए, जाए के देखो तुम । उहां कैसी चरचा होत है, सुनाओ सारी हम ॥६०॥

वे तो आए पेटारथू, इनों नाहीं काम आतम । देखी तो चरचा बड़ी, क्या जवाब देओ तुम ॥६१॥

और चालीस प्रस्न भागवत के, पन्द्रह वेदान्त के सुनाए कान । इन प्रस्नों की हमको, कर देओ पहिचान ॥६२॥

जवाब न आवे उनको, दिया न जाए उत्तर । तब सब मिलके विचारहीं, करने लगे फिकर ॥६३॥

ए तो बुरे वैरागी, हमारा भानेंगे रूजगार । इनकी निंदा कीजिए, तुम सब मिल होवो खबरदार ॥६४॥

इनका बड़का ब्रह्मा, जब गर्भ अस्तुत करी । फेर परीक्षा आया देखनें, भूल बड़ी दिल धरी ॥६५॥

गर्भ में पहिचानिया, भूल गया बाहिर । सो भूल आज लों, सब में भई जाहिर ॥६६॥

दूसरे ऋषेस्वर, करते थे जगन । अन्न मांग्या तिन पे, वे रहे कर्म में मगन ॥६७॥

पहिचाना इनकी स्त्रियों ने, भई सोभा तिन । आज लों ब्रह्माण्ड में, चरचा होत आगे मोमिन ॥६८॥

भृगु बड़का इनका, लात मारी छाती भगवान । ए तिनकी नसल, होए असल माफक पहिचान ॥६९॥

इनों जाए राणें आगे, लगे निंदा करने । ए वैरागी किसी न काम के, कबहूं न देखिए इने ॥७०॥

और दूसरे अंकूर, तैसी आवत बुध । तिस वास्ते राणें को, कछु न भई सुध ॥७१॥

यों करते एक दिन, राणा चला ताल पर । श्री जी साहिब जी तहां चले, श्री बाई जी रहे साथ खातर ॥७२॥

तहां जाए एक हवेली में, डेरा किया तित । लोग आवे चरचा को, हुआ आनन्द बड़ा इत ॥७३॥

इन समें अवगुन साथ के, ताको लेने लगे हिसाब । सब साथ पर खण्डनी, जोर हुई इनके बाब ॥७४॥

भेख बदलाये सबन के, श्रवनी पहिनाई कानन । और साज सब फकीरी, सो दिया हाथ मोमिन ॥७५॥

रोए धोए राजी भये, नाच कूद हुए खुसाल । काढ़े अपने अवगुन, ले जबराईल संग हाल ॥७६॥

इन समें दया राम, चंचल गंगाराम । और बनारसी आइया, सो आए पहुंचे इस ठाम ॥७७॥

सूरत से मोहन चतुर्भुज, आए लगे कदम । और साथी आए केतेक, तिनों सौंपी आतम ॥७८॥

इन समें पठान सौदागर, इनायत खान नाम । दूसरा मुराद खान, अबदुलनवी उस ठाम ॥७९॥

और अलादाद खान, और यार खान । इलयास खान नवाबकर, और मिहीन को भई पहिचान ॥८०॥

उसमान हसन खान, और अहमद खान । ए आए दीदार को, अव्वलखाँ को भई पहिचान ॥८१॥

दीदार पाया राह में, थे घोड़े पर असवार । आगे जलेब में चले, वैरागी थे खबरदार ॥८२॥

अव्वल खान पूछिया, जो है महम्मद नूर । मोको खबर तुम देओ, इन वैरागी का मजकूर ॥८३॥

जो तूं छिपावेगा मुझको, तो होऊंगा दावनगीर । ए कौन है कहां से आइया, ए कैसा फकीर ॥८४॥

तब नूर महम्मदें कहया, हैं सामिल दीन इसलाम । है कलमा कुरान इन पे, कमर बांधी दीन के काम ॥८५॥

ए तो हकुल आकीन था, सुनते इ ल्याया ईमान । आया उत दीदार को, कर दई अपनी पहिचान ॥८६॥

चाबुक अपने हाथ लेए के, मारत अपनें अंग । तब मने किया राज नें, आए बैठो हमारे संग ॥८७॥

उहाँ पट का काम चले, लिखावें बैठे राज । मुकुन्द दास दारोगा रहे, बैठा था इन काज ॥८८॥

आए पठान मिल के, करने को दीदार । होने लगी चरचा, सवाल किया परवरदिगार ॥८९॥

हमारे तुम कहो, कलमा रसूल का । तो हम होवें तुमारे, एता चाहता था ॥९०॥

जबराईल इन समें, श्री जी को बैठा जोस । मेरे महम्मद बीच में, कौन आवे बड़ा अफसोस ॥९१॥

अव्वलखान की रूह पर, आए जबराइलें किया जोर । जोस देख काफर डरे, करने लगे सोर ॥९२॥

तब उठ खड़े रहे, बिदा मांगी सबन । घरों जाए सोर किया, लगे निंदा करने मोमिन ॥९३॥

एक दिन किरंतन में, राणा आया करन दीदार । मोंह छिपाए ठाढ़ा रहया, देखा रासलीला बिहार ॥९४॥

इतना ही था अंकूर, तेता लिया फल । आज्ञा थी तोलों रहया, भई तेती आतम निरमल ॥९५॥

इनों के दिल में सक रहे, ल्याया ईमान अब्बल खान । तिनसों मसकरी करें, भई इनको पूरी पहिचान ॥९६॥

इन समें अमरा जी, वह पहिले ल्याया ईमान । रामसिंह गंगा के घर में रहे, कछु इनको भई पहिचान ॥९७॥

और भोगी दास जो, ए आया करन दीदार । मीठी लगी चरचा, पहिचाना परवरदिगार ॥९८॥

महामति कहे ऐ मोमिनों, ए तलाब करो याद । फेर कहों उदयपुर की, जो बीतक बुनियाद ॥९९॥

(प्रकरण ४९, चौपाई २६२७)

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