श्री बीतक - प्रकरण ५
अब इहां से आये, बीच हलार देस । तहां नौतन पुरी मिने, बहुत जमा भये खेस ॥१॥
इत माँ बाप आये रहे, उत वल्लभी मार्ग रहे जोर । तिन सेती रबद रहे, वे करने लगे सोर ॥२॥
स्याम जी के देवल में, कथा कहे कान जी भट । निस्टा ले सुनने लगे, होय बल्लभियों से खटपट ॥३॥
जलपान को तब करें, जब आहार देवें आतम । तब आहार आकार को, देवे न करे कम ॥४॥
जो कदी एक दोय स्लोक, आगे बाँचे होय तिन । तो फेर पुस्तक मंगाय के, वे ही सुने वचन ॥५॥
ऐसा जान के वह भट्ट, तोलों न खोलें पुस्तक । जोलों श्री देवचन्द्र जी ना आवहीं, और बात न करें बुजरक ॥६॥
रहे श्रोता सहर के चौधरी, और बड़े साहूकार । सो मार्ग बल्लभी मिने, होत खटपट हमेसा बेहवार ॥७॥
एक दिवस भट्ट को पूछिया, तुमारा क्या इनसे रूजगार । जब लग ए नहीं आवत, तोलों करो नहीं उच्चार ॥८॥
तब कहया कान जी भट्ट ने, मुझे न काहू की आस । मैं आगे बांचत स्याम जी के, सुने श्री देवचन्द्र जी खास ॥९॥
मोहे प्राप्त कहिये तो तुम से, होय क्या इन गरीब से । पर तुम कबहूं मोहे पूछत, आगे पीछे स्लोक कहों मैं ॥१०॥
मैं एक स्लोक आगे कहों, कब हूं ए पास न होय । तो घरों जाय फेर पूछत, पुस्तक छोड़ावत सोय ॥११॥
तिस वास्ते इन आये से, मैं करत उच्चार । मैं काहू की आसा न करों, मेरे चाहिए न कार वेहवार ॥१२॥
तब सब ही मोंगे रहे, बोलत नाहीं कोय । कथा सुन घरों पीछे फिरे, रोस जो मन में होय ॥१३॥
छिद्र को ढूंढ़त रहे, रहे बाहिर दृस्ट अहंकार । मार्ग को पावे नहीं, रहे रब्द को तैयार ॥१४॥
और श्री देवचन्द्र जी को प्रन रहे, ना होय द्वादसी को भागवत । ता दिन आप उपवास करें, आज आहार न पायो आतम इत ॥१५॥
ए तो भांडा आहार का, क्योंकर देऊं आकार । श्री भागवत सुने नेष्टाबंध, रहे याही को विचार ॥१६॥
यह बात उन लोगों ने, सुनी अपने कान । ए आहार एकादसी को करे, बारस उपवास रहे जान ॥१७॥
एह निंदा लेय के, करने लगे विचार । अब दाव हमारा आइया, ए कैसा धर्म वेहेवार ॥१८॥
आए सभा में मिल के, पूछी कानजी भट्ट से । ऐसा उपदेस तुम दिया, जो प्रसाद ले एकादसी में ॥१९॥
करे बारस को उपवास, यह कौन सास्त्रों बताइ । यों श्री देवचन्द्र जी करत हैं, सो हम सों कहो समझाइ ॥२०॥
तब कान जी भट्ट ने, इन भांत दिया उत्तर । जो वे करें सो समझ के, फेर पूछ के देऊं खबर ॥२१॥
यों करते श्री देवचन्द्र जी, आये बिराजे सभा में । कान जी भट्टें पूछिया, यों श्री देवचन्द्र जी सें ॥२२॥
करत बारस को उपवास, एकादसी को करत आहार । मैं तो एह मानी नही, श्री देवचन्द्र जी करन हार ॥२३॥
तब श्री देवचन्द्र जी उत्तर दियो, एही भांत हम करत । तब सबों ने कहया अर्थ कहो, हम समझत नाहीं इत ॥२४॥
पर इतना हम समझत हैं, जो श्री भागवत दरखत । ताकी एक डारी को, कोई बिरला पहुंचत ॥२५॥
पर तुम पात पात की रग में, है दरखत विस्तार । तहां तुम सब में फिरवले, ऐसो औरन को नही विचार ॥२६॥
कहया ए तो तुम कहत हो, सास्त्रों के वचन । ताको सांच जान के, लेत हैं समझाए मन ॥२७॥
तब श्री देवचन्द्र जी ने कही, हम लिया ऐसा पन । है भागवत आहार आतम को, जोलों सुनने न पावे मन ॥२८॥
सो भागवत द्वादसी को, तुम नाहीं बांचत । मैं तब आकार को, आहार न देवत ॥२९॥
और एकादसी को लेत प्रसाद, ताको भेद इतना जानत । कोट एकादसी एक सीत के, तुल्य न आवत ॥३०॥
श्री पारब्रह्म लीला रस का, यह जो ग्रन्थ श्री भागवत । तिनको सुन के स्वर्ग का, ए सब साधन करत ॥३१॥
तब कान जी भट्टें कहया, देवो इनका उत्तर । जवाब न आया काहू को, धन धन कहया यों कर ॥३२॥
इन भांत चरचा मिने, रहत है एक रस । नीर नयनों झरत है, जो वाणी सुने सरस ॥३३॥
यों चौदह वर्ष नेष्टा बंध, बचन ग्रहे सब सार । या उपरान्त कृपा भई, ताको कहों विचार ॥३४॥
महामति कहें ए साथ जी, ए नौतनपुरी की हकीकत । और भी आगे की कहों, भई जो बीतक इत ॥३५॥
(प्रकरण ५, चौपाई २८८)
