श्री बीतक - प्रकरण ५०
उदयपुर
फेर उहां से आये उदयपुर, उतरे हवेली में । साथ सब आये मिल्या, सुख पाया मिलाप से ॥१॥
इन समें गोवरधन भट्ट, सूरत से आया । धोली बाई साथ थी, तिन को संग ल्याया ॥२॥
ए दोऊ आए कदमों लगे, साथ सों किया मिलाप । बातें सुनी इत उत की, लगे चर्चा करनें आप ॥३॥
इन समें पातसाह ने, करी मुहीम राणे पर । आये अजमेर से भेजिया, मथुरिया इन पर ॥४॥
आओ मेरे दीन में, ल्याओ तुम ईमान । पांच परगने देऊं तुमें, जो होवे मुसलमान ॥५॥
गरीब दास पुरोहित को, आग्या करी तिन । सो ले गया राजसिंह पे, कही कानों लाग कानन ॥६॥
सुनते ही रीस करी, तुझे ना छोड़ता मैं । पर क्या करों पुरोहित भया, अब भाग जा इत से ॥७॥
देओ धक्के इन दूत को, जो ऐसी बात सुनावे कान । दलगीर हुआ दिल में, मन में बड़ा गुमान ॥८॥
ओ तो दूत फिर गया, इत खड़ भड़ पड़ी जोर । इन समें दज्जाल नें, किया जो बड़ा सोर ॥९॥
तब श्री जी साहिब जी कहलाइया, हम रदबदल करें इत । दौर नजीक पहुंचिया, बखत रोज कयामत ॥१०॥
तुम कछू ना बोलियो, रद बदल करें हम । इन राह से दीन की, ए आवें तले हुकम ॥११॥
ए बात राणें सुनी, हम ऐसे नही पात्र । जो रदबदल करें दीन की, ऐसे नहीं हमारे गात्र ॥१२॥
हम से बोझ पातसाहों का, क्यों कर उठाया जाए । हम सुनत बात डरत हैं, ए हमसे न होए उपाए ॥१३॥
तब हजूर दज्जाल था, सो निंदा करने लगा जोर । हम आगे ही तुझ से कही, वे करने लगे सोर ॥१४॥
निकाल छोड़ो इन को, कोई कहे लूट लेओ तुम । सब राणा सुनत है, पर कछू न किया हुकम ॥१५॥
राणा भीमसेन पासे था, इन सुनी बातें कान । इन ठौर वैरागी लूट लेओगे, तो हम होवें बदनाम ॥१६॥
भेज दिया कोतवाल को, तुम बिदा होओ चार दिन । सब सुख समाधान होवहीं, फेर आइयो साधुजन ॥१७॥
लसकर चारों तरफों, दज्जालें फैलाया चोफेर । पावे न कोई निकसनें, बड़ा जो किया सोर ॥१८॥
श्री जी साहिब जी ने बिचारिया, हुआ हमको हुकम । ए आज्ञा है राज की, इहां से उठो तुम ॥१९॥
ऐह सामा सूत हम संग, निबहे नहीं लगार । इतही बांट दीजिये, ऐसा किया विचार ॥२०॥
फेर कोतवाल आइया, ल्याया हुकम दूसरी बेर । रानें रजा दई तुमको, यों कर कहया फेर ॥२१॥
अब इत रहने का, धरम न रहया लगार । हमारा जो अखत्यार, है हाथ परवरदिगार ॥२२॥
एही हमको काढ़त, छुड़ाए दियो ए ठौर । जहां खेंचे तहां जायेंगे, अब ढूंढों ठौर और ॥२३॥
इन समें महा सिंह, करने आया दीदार । पहिनाया सिरोपाव इनको, अब तुम हूजो खबरदार ॥२४॥
हम तो बिदा होत हैं, तुमारे मुलक से । तुम बैठ ना सकोगे, बैरान होओ इनमें ॥२५॥
और जेते उमराउ, और जेते पासवान । और साथ आपना, जाको थी पहिचान ॥२६॥
तिन सबों को सिरोपाव, घरों दिए पोहोंचाए । निरगुन भेख पेहेरन का, मोमिनों दिया बताए ॥२७॥
पहने चीरक बस्तर, सब सरगुन दिया डार । हुए चलने को तैयार, छोड़ा कार वेहेवार ॥२८॥
बासन बस्तर सरगुन, बख्स दिया सबन । तूंबा कूबड़ी गोदड़ी, ए भेख पहना मोमिन ॥२९॥
अब कहूं साथ उदयपुर का, जिन सौंपी आतम । आए दीन इसलाम में, सिर चढ़ाया हुकम ॥३०॥
एक तो लाधू मसानी, और अमरा जी नाम । और आया देवजी, हर सुन्दर आया इसलाम ॥३१॥
और भाई मंगलजी, और आया गिरधर । गेहेला मना हिम्मत, ए आये मुहब्बत पर ॥३२॥
आए केसवदास बेनीदास, और आए सोभा भीमा । और भोगी बीर जी आये, इनों भास्या सुख जमा ॥३३॥
और आये प्रेमदास जगन्नाथ, और पीछे आए लखमीदास । और सोनी नारायण, ले धाम धनी की आस ॥३४॥
और साथ समस्त में, एक भाई वासुदेव । इनकी माता सहुद्रा, पलेवास में पाया भेव ॥३५॥
मोटी बाई कुंजा बाई, कमला बाई नाम । और खुसाली कही, ए आए इस ठाम ॥३६॥
और आई लाल बाई, और आई नागर । और भूरो भतू, तजी माया राज खातर ॥३७॥
केसर और भानाबाई, और गंगाबाई गंगी । और आई लाड़बाई, ल्याई दीन में अपने संगी ॥३८॥
कृष्णा बाई लाल बाई, और सोना फूला नाम । जीवी और देवबाई, ए दाखिल इसलाम ॥३९॥
सहू और गंगाबाई, और जगू बाई तारू । बछू बाई फूलबाई, किया राजें उपरारू ॥४०॥
भोगन और मथुरी, आई गोरी और मनू । पीठ दई दुनियां को, नीके जानो सुपनू ॥४१॥
अमेखी और दानी खेती, और मनी बेरानी नाम । नानी बाई गोमा बाई, ए पीछे आई इसलाम ॥४२॥
गोमा और वीर बाई, और नाथी लखी । भाग बाई तारा बाई, खेली ब्रज रास में सखी ॥४३॥
अनदू और मनी बाई, पूर बाई और गंग । भाना बाई अमृत बाई, सुख पावे राज के संग ॥४४॥
अमृत दे करमा बाई, और चीमा सहोदरी । और कान बाई मना दे, मेहर राज की उतरी ॥४५॥
चीमा बाई सजनी, और दीपा बाई नाम । और साथ समस्त सब, उदेयपुर के ठाम ॥४६॥
यामें कोई आगे कोई पीछे, आए बीच इसलाम । कोई तो समझन के पख, कोई दीदार के विश्राम ॥४७॥
जब सुलतान चढ़ा राणे पर, तब भागा सारा देस । तब उहां से निकलने पड़ा, जुदे पड़े दरवेस ॥४८॥
उहां सेती चल के, आए रामपुर के गाम । पासे पुरा दुधलाई, पूरनदास के ठाम ॥४९॥
महामत कहें ऐ मोमनों, ए उदेयपुर की बीतक । अब कहों मन्दसोर की, जो बीतक हुकम हक ॥५०॥
(प्रकरण ५०, चौपाई २६७७)
