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श्री बीतक - प्रकरण ५१

मन्दसोर की बीतक

अब कहों मन्दसोर की, आये उदेयपुर से चल । जब नौरंग चढ़ा राने पर, हुआ मुलक चल विचल ॥१॥

सम्बत्‌ सत्रह सै छत्तीसा, लगा सैंतीसा जब । मन्दसोर के बीच में, आए पोहोंचे तब ॥२॥

इन समें फकीरी का, भेख धरा अनूप । सोभा छब सरूप की, वारों कोटक रूप ॥३॥

गोटा सोभे सिर पर, ऊपर कनढपी । दोए पुरत लोइ धागे भरी, ए पेहेनत हैं टोपी ॥४॥

अति सुन्दर तिलक बन्‍यो, दोए रेखा बीच बिन्द । गोपी चन्दन सुपेत का, मुख सोभित मानों चन्द ॥५॥

जे श्रवनी सोभे कानों मिने, दोए बाले कंचन के । अत राजत छब प्यार की, लगा प्यार फकीरी से ॥६॥

पेहेनी कण्ठी तुलसी की, और बड़ी माला चार । अति सोभित अंग मेखली, लोइ धागे भरी सुमार ॥७॥

और गोदड़ी ओढ़न की, हाथों लई बनाए । सेली सुमरनी मुत्तका, अंग सोभित हैं ताए ॥८॥

उपरनी धोती अंगोछा, पहरे और बांधें कम्मर । एह छबि ब्रह्मांड में, सोभा सब ऊपर ॥९॥

एक पात्र तूंबे का, और तूंबा कम्मर । साज सबे झोली मिने, राखत कांध ऊपर ॥१०॥

पेहेनी पांव में पनहीं, चलत चटकनी चाल । संग केतेक मोमिन, चलत होत खुसाल ॥११॥

सबों ने भेख पेहेन्या, देख अपनें साहिब । चाह खेल देखन की, हुई बड़ी खुसाली तब ॥१२॥

श्री बाई जी भेख बनाइया, सोभित हैं निरगुन । साज फकीरी राखत, जंग दज्जाल से करें मोमिन ॥१३॥

राह बीच राम पुरा, तहां निकट चारन का गाम । तहां उठाई हवेली, लगे ईंटें पारने के काम ॥१४॥

बनाए ठाढ़ी हवेली करी, सरूप रहें तिन में । पूरनमल चारन, वह गाम था उनसे ॥१५॥

रही उनकी माता खिजमत में, करे उपली पेहेचान । इनके सरूप देख के, उपला था ईमान ॥१६॥

जब दज्जाल नें जोरा किया, दिल बैठा बेरीसाल । वह भाई राजा का था, हुआ दज्जाल का हाल ॥१७॥

बुरी नजर करी साथ पर, लूट लेऊं फकीरन । तब चारन के घरों गए, फरियाद करी मोमिन ॥१८॥

तब चारन की माता ने, बांधी जोर कम्पर । इन वैरागियों सामी देखे, मारों तिनें खर ॥१९॥

या तों मैं मरों तिन पर, हत्या देऊं उन । इनसे बुरा क्यों देखे, मेरे घर आए साधुजन ॥२०॥

तब स्याह मोंह ले पीछे फिरे, उत से बेरीसाल । चला न कछुये तिन का, बुरा हुआ हवाल ॥२१॥

वह हवेली छोड़ के, आए मन्दसोर । तहां आए के बैठे, हरपरसाद घरों ठौर ॥२२॥

तहां पातसाही लसगर, रहे मन्दसोर के गिरदवाए । गावत सनंधे तहां बैठ के, कोई कोई सुनने को आए ॥२३॥

इत सुनने को आवत, पठान दौलत खान । सुन सनंधे घायल भया, भला ल्याया ईमान ॥२४॥

और सेरखान कोहटी, सुनी सनंधे कान । संग केतेक पठान, तबहीं ल्याए ईमान ॥२५॥

बिना एक महम्मद की, सनंध पढ़ी जब । दौलत खान पठान को, जोस आया तब ॥२६॥

बिना एक महम्मद है, और न काढ़े बोल । फेर फेर एही कहे, एही काढ़त मुख कौल ॥२७॥

किरपाराम इत आइया, तहां पाती ले पुकार । उदेयपुर का साथ पहाड़ों मिने, हुआ विलाप करन हार ॥२८॥

विलाप इनका सुन के, दिल में हुआ दरद । मुंह दरगाह बीच करके, पुकार करी महम्मद ॥२९॥

पांच किरंतन करके, फेर दाखिल किए कलाम । तबहीं पोहोंची हक को, हुई मेहर ऊपर इसलाम ॥३०॥

इन समें इबराइम, करने आया दीदार । सोहोबतें राजी भया, फेर आया दूसरी बार ॥३१॥

तब लाल की सोहोबत सें, बातें हुईं इस ठाम । एक किस्सा कुरान का, करो हमारा काम ॥३२॥

तब उनने उतराइया, सूरत एक कुरान । तिनमें केतिक आयतें, श्री जी यें सुनी कान ॥३३॥

सुनते ही सुख उपज्या, यामें बात हमारी सब । जो उतरावे तुम को, तो बड़ा काम होवे अब ॥३४॥

तब उनसों बातें करी, कहे मैं उतराऊं कलाम । कछुक लोभ दिखाया, राजी हुआ इस ठाम ॥३५॥

प्रात को आए खड़ा हुआ, सुरू हुआ सिपारा सोलमा । दो जुज उतराए दिए हाथ में, बड़ी राज को हुई तमा ॥३६॥

इत एक मजिल भई, बड़ी खुसाली दिल । बीतक अपनी बांच के, होत दिल निरमल ॥३७॥

एक ठौर रात को बंगले, उतारत हैं कुरान । लाल इबराइम बैठत, राज पासे पौढ़े सुने कान ॥३८॥

उतरावते एक सुकन, पढ़ा इबराईम नें । ए तो कोई रावसी, कलम मारी उननें ॥३९॥

तब श्री जी ऐ कहया, फेरके पढ़ो सुकन । ए तुम क्या कहया, फेर हमें सुनाओ कानन ॥४०॥

तब कहया इबराइम नें, जो सुनी मुसलमान । महम्मद की उम्मत के, अरजी न पहुंचे कान ॥४१॥

कोई पोहोंच ना सके, मरातबा मोमिन । तुम हरफ न फिराओ इनका, जैसा लिखा होए सुकन ॥४२॥

और वाही सुकन को, समझत नाहीं तुम । कोई क्या जाने उन क्या लिख्या, सो समझत नाहीं हम ॥४३॥

लगता एक चबूतरा, तहां पढ़नें बैठे श्री राज । बीतक देख राजी हुये, भए पूरन मनोरथ काज ॥४४॥

अब अपनी बात के, सब बिध भए कारज । अब तुमें करना कछु ना पड़े, रही न कोई गरज ॥४५॥

अब ए सब साथ को, लिखो खुस खबर । मेहर भई श्री राज की, सो लिखी तुम ऊपर ॥४६॥

लिखने बैठे संझा को, सो जहां लों अरूण उदे । इबराइम जाए अपने घरों, लाल दातुन पानी करे ॥४७॥

यों करते उतरे, सिपारे जो चार । सोलह सत्रह अठारह उन्नीस, ताको करनें लगे विचार ॥४८॥

फेर सिपारा तीसमा, जाकी छत्तीसमी सूरत । सो लिया उतार के, फेर लगे अलफ लाम मीम से इत ॥४९॥

फेर दूसरो तीसरो, लगे चौथो उतारन । पांचमा सुरू हुआ, उतार चले मोमिन ॥५०॥

तब इबराइम के दिल में, आए बैठा दज्जाल । लेऊं तपसीर छीन के, तो मन को करों खुसाल ॥५१॥

तब लगा खरखसा करने, बीच बैठावे साहिद । मोमिन गरीब देख के, देवे डर सरियत हद ॥५२॥

मांगने लगा तपसीर को, मैं ले जाऊं अपनें घर । तब लालें पेहेचानियां, दज्जाल की नजर ॥५३॥

फितुवा उठावनें कों, करता है ए काम । मैं तपसीर इनको क्यों देऊं, ए फिरा दीन इसलाम ॥५४॥

तब श्री जीएं जानिया, उनके मन की बात । तब जवाब चोखा दिया, करी तोफान की विख्यात ॥५५॥

मोमिन दिल दलगीर भए, ए बात सुनी कान । अब क्या करना इनसे, भई न इन्हें पहेचान ॥५६॥

ए बात सुनी पठान नें, दौड़ के आया कदम । देखे श्री जी साहिब जी को दलगीर, उन सौंपी थी आतम ॥५७॥

सो काहे भए आप दलगीर, सो बात सुनाई कान । इबराइम उठाया फितना, जो गरीब लोग ईमान ॥५८॥

सुन सुकन मुहब्बत खान, बोहोत हुआ गुस्से । सिर भानों इबराइम का, मन्दसोर के बीच में ॥५९॥

इहां से उठ धाइया, गया इबराइम के घर । कुतका लिया कांध पे, जाए सवाल किया जोरू पर ॥६०॥

कहां गया इबराइम, दई गाल जुबान । तब वह मुनकर भई, गए निकाह सुनावनें कान ॥६१॥

ए चला गया तहां ही, जाए के किया सोर । इबराइम निकल आया, क्यों एता मुझ पर जोर ॥६२॥

मैं तो तुम्हारा गुलाम, करों फुरमाया सोए । तें क्यों दुख दिया हादीय को, ऐसा झूठ तुझसे होए ॥६३॥

तें मेरे आगे कहया, ए मेरे मुरब्बी । मैं गुलाम इनका, अब तें क्यों फेरी अपनी सबी ॥६४॥

मार डारूं तुझको, द्वा रसूल की ना छोड़ों क्यों ए कर । तब लगा उनके कदमों, आगे गीदड़ हुआ इन पर ॥६५॥

जाए कदमों लाग उनके, जाए राजी कर मोमिन । नातो तुझे ना छोड़हों, हुए दलगीर दिल रोसन ॥६६॥

प्रात समें उठ के, इबराइम आया धाए । आए श्री जी के कदमों लगा, सिर ना उठाया जाए ॥६७॥

तब नूर मुहम्मद बोलिया, उठ खड़ा हो मुरदार । मारों कटारी पेट में, इतही हो जाए सुमार ॥६८॥

पर क्या करों डरता हूं हादी से, इनका हुकम नाहे । एती बेअदबी करके, फेर जीवता उठ के जाए ॥६९॥

कहया मैं तुम्हारा गुलाम, मुझसे भई भूल । अब तुम माफ करो, मैं तुमसे किया न सूल ॥७०॥

मैं ग्रहे तुम्हारे कदम, सो मैं ना छोड़ों कब । सब मोमिनों के कदमों लगा, वाको माफ किया तब ॥७१॥

तब उनके भाई नें, पांचमा सिपारा । वह लिखावनें लगा, हुआ जो पूरा ॥७२॥

इन समें दज्जाल नें, सोर किया जोर । रहे साथी सब जुदे जुदे, काहू चित ना हुआ मरोर ॥७३॥

छिप रहे जुदे जुदे, आवे दीदार को एक बेर । झोरी भर के ल्यावहीं, टुकड़े मांगे फेर ॥७४॥

श्री राज आरोगत हेतसों, ए किनकी झोरी के । सो बतावत अपने, ए ल्याया मैं ॥७५॥

राजी होवें तिन पर, बातें हंस हंस करें बनाए । मैं अजमावत तुम को, इन मजलों पहुंचाए ॥७६॥

मोमिन राजी होए के, बातां करें खुस दिल । ए दिन हम कब पावहीं, रहे एक दूजे हिलमिल ॥७७॥

तुम सिर भाना दज्जाल का, कुटम्ब कबीला आस । रहे बोहोत बल सूरत में, संग जोस जबराईल खास ॥७८॥

श्री बाई जी नें इन समें, सेवा करी मोमिन । दिल बनाए आगे धरें, हमेसा दिल रोसन ॥७९॥

एक दूजे को सेवहीं, हर भांत कर चित । हेत करें मिनों मिनें, कहूं सक न पैठत ॥८०॥

नान्हा भाई चलया, मन्दसोर के में । ताले माफक ए रहया, उतने ही सुख सें ॥८१॥

मुकुन्द दास को उत थें, भेजे भावसिंह पास । तुम जाए उनकी खबर लेओ, है जीवता कछु आस ॥८२॥

जो हमको उत बुलावहीं, तो हम आवें उत । तहां जाए के लिखियो, जैसा देखो तित ॥८३॥

मुकुन्द दास जाए पोहोंचे, भावसिंह सों किया मिलाप । चरचा उनसों रस पड़ी, उन कबूल किया आप ॥८४॥

तब उहाँ से कासद, भेज दिया सिताब । मन्दसोर आए पोहोंचिया, पाती ले किताब ॥८५॥

उनमें भली भांत के, लिखे थे सुकन । पढ़ के आप राजी भए, सब साथ मोमिन ॥८६॥

अब मन्दसोर से, चलने का किया उपाय । साथ हुए सब तैयार, खबर सबों पोहोंचाए ॥८७॥

सब साथ भेले भए, हुए चलनें को हुसियार । आठ महीने इत रहे, हुआ हुकम परवरदिगार ॥८८॥

महामत कहे ऐ मोमिनों, ए मन्दसोर की बीतक । अब इहां से आगे चले, सो कहों हुकम हक ॥८९॥

(प्रकरण ५१, चौपाई २७६६)

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