श्री बीतक - प्रकरण ५२
उज्जैन की बीतक
इहां से आए सीतामऊ, तहां से नोलाई । तहां से आए उज्जैन, अठाईस मजलें भई ॥१॥
भादों सुदी छठ को, रहे धनबाई के घर । भाई भगवान चौधरी, ईमान ल्याया इन पर ॥२॥
इनों ने उच्छव किया, बाबू जी है नाम । नान जी बेटा तिनका, राज पधारे मेडी ठाम ॥३॥
बूला बेटा भगवान का, कान जी भाई मन । दामोदर दास धनबाई के, ल्याए ईमान मोमिन ॥४॥
लालजी इत आइया, बूला बेटा इनका । और कान जी दूसरा, बेनी भाई आया इनका ॥५॥
लालजीएं उच्छव किया, पधराये श्री राज । मोहन के घर उच्छव, पूरे मनोरथ काज ॥६॥
ए जोसी राम आइया, आया धन जी इस ठाम । श्री राज पधारे इनके घर, भए पूरन मनोरथ काम ॥७॥
कान जी के घरों, दई रसोई इन । हाव भाव बोहोत किया, बिना अंकूर न होए मोमिन ॥८॥
जीवली के घरों, पधारे श्री राज । रसोई भली भाँत सों, करी श्री राज के काज ॥९॥
ऊका धन जी के घरों, करी रसोई भली भाँत । श्री राज को पधराए के, रसोई अरूगाई कर खांत ॥१०॥
बाल बाई रसोई करके, श्री राज पधराए घरों । दरसन किया बुलाये के, मन में हरख धरों ॥११॥
भूदर फूल बाई नें, राज पधराए इन । राम बाई के घरों, किए पूरे मनोरथ मन ॥१२॥
कान जी के घरों, पधराए कर हेत । मुरली आनन्द स्याम जी, उनने बुलाए तित ॥१३॥
पधारे मोहन के घरों, और साहूकारों के । भले भाव सों पधराए, साहूकारों के नए नए ॥१४॥
फेर तेईसमें दिन इहां से, नोलाई आन पोहोंचे । एक दिन तहां रह के, पोहोंचे नुनेरे ॥१५॥
तहां एक दिन रह के, पोहोंचे बुढ़ानपुर में । तहां एक दिन रह के, चले मजल इत सें ॥१६॥
तहां से आए औरंगाबाद, भावसिंह के घर । तहां की बीतक कहों, जिन भांत इन पर ॥१७॥
महामत कहें ऐ मोमिनों, ए मन्दसोर से बीतक । आगे औरंगाबाद की, बात बड़ी बुजरक ॥१८॥
(प्रकरण ५२, चौपाई २७८४)
