श्री बीतक - प्रकरण ५३
राणा के मुलक से, आए रामपुरे के ठौर । दूधलाई डेरा किया, तहां किया दज्जाले सोर ॥१॥
तब वहां से मुकुन्ददास को, और केसवदास । खिमाई और वल्लभ, भेजे भावसिंह पास ॥२॥
गये भावसिंह के उत, केसव वल्लभ बैठे दुकान । खिमाई भाई संग रहें, मुकुन्द दास निरगुन जान ॥३॥
केतेक महीने फिरे, भेख राख्यो निरगुन । वेदान्त को पख खोजिया, रहे बीच निरगुन ॥४॥
जब लगे मुरकने, तब दिल में किया विचार । मैं फिरा काहे जाऊं, जनाऊं जित बेहेवार ॥५॥
भीख मांगे दोऊ सरूप, ताके लिये बस्तर । थेलिया रेसमी बनाए के, प्रसाद थैली करी तत्पर ॥६॥
प्रस्न भागवत वेदान्त के, ले डारे थैली में । एक प्रसाद की थैली कर, किया मिलाप तिन सें ॥७॥
महन्त राम दास रहे, तिन देखे बीच बाजार । मिलाप मुकुन्द दास को, पहुंचाया नाले पार ॥८॥
जो औरंगाबाद रहेगा, तो हम मारेंगे फेर । जो बदराह करे भावसिंह को, तो हम मारें दूसरी बेर ॥९॥
यों करके जब छोड़िया, तब मुकुन्द दास कियो विचार । दज्जाल मिलने न देवहीं, मैं होऊं खबरदार ॥१०॥
एक देहुरा देवी का, मैं बैठूं तिन में । उत भावसिंह आवत, पाती देऊं हाथ सें ॥११॥
ऐसा विचार करके, जाय छिप के बैठे उत । जब भावसिंह आइया, पाती प्रसाद दिया तित ॥१२॥
भावसिंह सिर चढ़ाए के, लई थैली उस बखत । भीतर जाए के बुलाए, मुकुन्द दास को तित ॥१३॥
पूछी हकीकत राज की, कहां हैं स्वामी कृष्ण दास । तुमको क्यों कर भेजिया, कहो अपनी दिल आस ॥१४॥
खोल पाती पढ़ने लगा, मिने प्रस्न भागवत । और लिखे वेदान्त के, विचार होने लगा तित ॥१५॥
तहां दज्जाल बैठा था, राम दास महन्त । तिन ईरषा के वचन कहे, सरूप बे बिराजत ॥१६॥
ए दोए कृष्ण बतावत, जो कहू न सास्त्रों में । इनका मुख न देखिए, चरचा कैसी इनसे ॥१७॥
तब भावसिंह बोलिया, ऐसी काहे कहो तुम । एतो भला बतावत है, निज सरूप बतावत हम ॥१८॥
भावसिंहे जानिया, ए दज्जाल हराम खोर । ए हैं इनके दुसमन, तो करत हैं सोर ॥१९॥
ठौर देओ मुकुन्द दास को, हमारी हवेली पास । तब रामदास बोलिया, इनकी सेवा की मुझे आस ॥२०॥
उतारें हम अपने घरों, तब मुकुन्द दास कहे वचन । इन सेवा हमारी भली करी, पीठ दिखाई इन ॥२१॥
देख पीठ भावसिंह को, बड़ा जो हुआ दुख । धक्का दे उठाया दज्जाल, बुरी गारी दई मुख ॥२२॥
जो मेरे इहां आवत, ताकी ऐसी सेवा करत । निकसो हमारे डेरा से, जाओ देस में तित ॥२३॥
मुकुन्द दास की निसां करी, प्रस्न पूछे पण्डितन । करो इनका जवाब, होए दिल रोसन ॥२४॥
आया ना जवाब उनों को, निन्दा लगे करनें । भावसिंहे बरजिया, आवत ना जवाब तुम्हें ॥२५॥
कहया मुकुन्द दास नें, पंडित पूछें जो प्रस्न । मैं ताको उत्तर देऊं, इनका मनाऊं मन ॥२६॥
मैं पूछों जो इनको, ए ताको दें बताए । जो हारे दोऊ मिने, सो पनही बांध के फिराए ॥२७॥
प्रस्न असी पंडितन लिखे, तेईस मुकुन्द दास । पन्द्रह दिन मोहलत दई, क्यों ए होए विस्वास ॥२८॥
पंडित रोज पावत, रूपैया दस बीस । जब उत्तर देओगे प्रस्न का, तब हम करें बगसीस ॥२९॥
मुकुन्ददास ने उसी दिन, प्रस्न खोल किए साफ । देओ उत्तर हमारे प्रस्न का, करो भावसिंह इन्साफ ॥३०॥
उत्तर तो आवे नही, तब रात को किया विचार । चल आए मुकुन्द दास पे, कहे हम पर होत है मार ॥३१॥
जो स्वामी जीयें यों ही कहया, के रोटी भानों पंडितन । तो हमारा क्या चारा, सन्तोष पकड़ें मन ॥३२॥
ना तो हमारा छुटकारा करो, हम हारे दस बेर । तब मुकुन्ददास नें कहया, हम कहेंगे फेर ॥३३॥
तब कहया भावसिंह को, क्या ए उत्तर दें प्रस्न । ए तो लीला अखण्ड की, इनका ना पोहोंचे मन ॥३४॥
तब आधा रोज छेकिया, आधे का हुआ हुकम । प्रात को मिल के कहया, ए काम किया तुमारा हम ॥३५॥
दिन दूसरे तीसरे, नीके दिए कान । तारतम नीके सुनिया, होए गई पहिचान ॥३६॥
बुलाओ श्री जी साहिबजीय को, असवारी लेओ तुम । लेओ हथिनी बूंदीय से, और घोड़ा देत हैं हम ॥३७॥
एक हवेली बूंदी में, रहनें को लिख दई । तहां श्री बाई जी को राखियो, इन भांत सिखापन दई ॥३८॥
मुकुन्द दास बिदा होए के, लई असवारी साथ । तहां से पोहोंचे मन्दसोर, खरची दई थी हाथ ॥३९॥
आए मिले मन्दसोर में, ले चले श्री जी को । आए पोहोंचे औरंगाबाद, भई मुलाकात हवेली मों ॥४०॥
भावसिंह आए के, लगा दोऊ कदम । देख दीदार इन समें, कृत कृत जानी आतम ॥४१॥
लगा सेवा करनें, उच्छव रसोई जब । दई जागा हवेली अपनी, भई सेवा इनकी तब ॥४२॥
सुन नरसैयां के सब्द कीर्तन, तित हुआ मगन । आप लगा नाचने, ज्यों करें मोमिन ॥४३॥
भगत भाव जोर रहे, सेवे परमेस्वर । सक कछु न आवहीं, भगत भाव ऊपर ॥४४॥
तिन अपने अंदर, पधरावत श्री राज । रास लीला के किरंतन, राजी होवे इन काज ॥४५॥
जब बात कही कुरान की, तब इन किया विचार । ए साहिदी क्यों पावहीं, इनका करो करार ॥४६॥
ए मुसलमान चार हैं, मेरे चाकर इत । तिनको तुम समझाओ, मुकदमा कयामत ॥४७॥
तब मैं औरंगजेब सों, बांध के कमर । लड़ों वास्ते दीन के, सिर सोंप्या इन बात पर ॥४८॥
तब श्री जी साहिब जी ऐं कहया, सोंपो हमको मुसलमान । तिनको हम समझावहीं, वे ल्यावे ईमान ॥४९॥
वे कहें तुमको तहकीक, तुम्हारा इसलाम । कुरान तरफ तुम्हारे, तुम कम्मर बांधो दीन के काम ॥५०॥
ए बात मानी भावसिंह ने, मेरे मन बरहक । तुम इन पर मेहनत करो, ए बात बड़ी बुजरक ॥५१॥
ए तहकीक कर उठे, होने लगी चरचा तिन से । नित आवें दोए बखत, रहे इन काम में ॥५२॥
इन समें भट्ट भवानी, था उदेयपुर का मिलाप । सो इत आए मिल्या, थीं भवानी प्रसन्न आप ॥५३॥
बुधगीता बुध स्तोत्र, ए ल्याया दखिण से । इन समें मुजरा किया, सुख पाया इन में ॥५४॥
नित चरचा में बांचन, आवे करन दीदार । कछुक पेहेचान तारतम, दई धनी निरधार ॥५५॥
इन समें अव्वल खान, करने आया दीदार । था उदेयपुर का मिलाप, इन पेहेचाने परवरदिगार ॥५६॥
जहान महम्मद मिहीन खाँ, ए तिनको सुनाई कान । तिनको बुलाए ल्याइया, और करने लगे पेहेचान ॥५७॥
मिहीन को ईमान आइया, ए ताबे हुआ तब । दज्जाल सों लड़ने लगा, चाही लेने सोभा अब ॥५८॥
कहार बानों में पठान, चली चरचा तिन में । सनंधें सुनी जहान महम्मदें, क्यों ए पेहेचान होए इनसें ॥५९॥
एक जहान महम्मद को, असलू अंकूर ईमान । था आप तमाम तपसीर, पढों में आरबी खान ॥६०॥
देता तालीम सबन को, जेते रहें पठान । किन किन सुनी हकीकत, कहे बुरा भला अनुमान ॥६१॥
भवानी भट्ट डेढ़ पहर लों, कथा कह होऐ फारग । तब श्री राज आरोग के, पौंढे सेज बुजरक ॥६२॥
जब दिन पीछला, घड़ी रहत है सात । तब श्री राज उठत हैं, करें साथ सों बात ॥६३॥
चरचा होए अत बड़ी, हुआ सिनगार का बखत । संझा को आरती होवहीं, सब साथ खड़ा देखत ॥६४॥
एक तरफ लाल दास, दूजी भवानी भट्ट । चरचा कुरान भागवत की, होत है लट पट ॥६५॥
श्री राज करत हैं मायनें, सुनने वाला साथ । कोई सवाल करत हैं, कोई बानी लेवें हाथ ॥६६॥
अब्बलखां ले आइया, जहान महम्मद को । चरचा सुनी मास दोए लों, घायल भया तिन मों ॥६७॥
पर था अरध पक्का, सुनी लीला फिरी सुरत । लाल उत्तम सुनाई, लड़ाई भई उन बखत ॥६८॥
जात रहया घर को, कबहूं ना लेऊं जल । मैं दो मास मेहनत करी, भई ना रूह निरमल ॥६९॥
उत्तमदास अरज करी, बुलाए ल्याऊं महम्मद जहान । बरजा श्री जी साहिब जी ऐं, इनने सुनी चरचा कान ॥७०॥
सो दुचती होए गई, रहि ना सके घर में । प्रात को उठ दौड़ेगा, करने लगे दिल सें ॥७१॥
दिन दूसरे आइया, श्री जी साहिब जी के पास । मुझे क्यों न समझावत, मुझे है कदमों की आस ॥७२॥
तब श्री जी साहिब जीयें कहया, एक आठ दिन देओ चित । सो भी एक पहर, देख कैसा होवे इत ॥७३॥
आया चरचा सुनने, सवाल किया एक इत । मुरदे क्यों कर उठेंगे, बखत रोज कयामत ॥७४॥
दिया जवाब श्री जी साहिब जी ने, काढ़ दिखाया बीच फिरकान । दुनी करी किन वास्ते, सो कर दई पेहेचान ॥७५॥
इसक रबद के वास्ते, उतर आए मोमिन । नूर जलालें मांगिया, देखों इस्क रूहन ॥७६॥
तिस वास्ते दिखाइया, दो तकरार दो बेर । प्रात को ए तीसरा, रचा इण्ड जो फेर ॥७७॥
रास लीला खेल के, आए बरारब स्याम । सो कागद कलाम अल्लाह का, ल्याया महम्मद अलेहु सलाम ॥७८॥
करी सरत दसहीं ग्यारहीं, हम आवेंगे फेर । जो रूहें थी ब्रज रास में, सो आवें दूजी बेर ॥७९॥
तब काजी होए के, हिसाब लेवें हक । सिफायत जो मोमिन की, करें महम्मद बुजरक ॥८०॥
अकलें भई लोक में, सब होवे एक दीन । चौदह तबकों मिनें, सब ल्यावें आकीन ॥८१॥
अक्षर अक्षरातीत बिन, रहे न कोई और । नूर और नूरतजल्ला, जाहिर होवे सब ठौर ॥८२॥
जब नींद उड़ी नूरजलाल की, उठ बैठे अक्षर । तब धाम को याद करें, चित चुभे योंकर ॥८३॥
मोमिन मिलावे को, जब ए करें याद । तब आठों भिस्त की, उठ बैठी बुनियाद ॥८४॥
जो ईमान ल्याए के, सोवे बीच कबर । सो चुभे नूर के चित में, भूले नही क्यों ए कर ॥८५॥
यों उठेंगे मुरदे, कबरों से कयामत । तिन समें की रामत, करी महम्मद इत ॥८६॥
ए दरवाजा खोलते, जोस आया जोर । तब दज्जाल कांपया, करनें लगा सोर ॥८७॥
ल्याया दिन तीसरे, जहान महम्मद ईमान । हकीकत मारफत की, होए गई पेहेचान ॥८८॥
आवत जहान महम्मद, और अव्वल खान । और मिहीन आवहीं, बैठे चरचा में नित्यान ॥८९॥
और मुसलमान आवहीं, सब चरचा सुने । तामें जहान महम्मद को, जोस आवे इन समें ॥९०॥
श्री राज पकड़े इनको, सिर पर धरे हाथ । दिलासा बड़ी करे, तूं है हमारा साथ ॥९१॥
फेर सावधान होवहीं, जब सुने नाम लाहूत । तब फेर गिरे जोस में, याद करे कयामत ॥९२॥
यों चरचा रात को होवहीं, जब रहे पीछली घड़ी चार । तब साथ की बिदा होए, फेर करे विचार ॥९३॥
तब श्री राज आरोग के, हिंडोले खाट पोढ़त । पीछे साथी इन समें, रास की रामतें गावत ॥९४॥
यों करते भोर होवहीं, लीला भई मास चार । नित्याने उच्छव कीर्तन, हुआ साथ अंग करार ॥९५॥
पठान फते महम्मद, ए बात सुनी कान । कहया जहान महम्मद को, कर दे वैरागी की पेहचान ॥९६॥
चालीस हदीसें लिख दई, जो इनके करे मायने । तो तहकीक जानियो, होवे खाविंद जमाने ॥९७॥
ल्याया हदीसें जहान महम्मद, कही आगे श्री जी साहिब । तूं ही कर इनके मायनें, किल्ली रूह अल्ला की पावे जब ॥९८॥
जब इनने तलब करी, किल्ली अल्ला कलाम । तब जहान महम्मद को, भई पेहेचान इसलाम ॥९९॥
तब सब खुल गई, हकीकत मारफत द्वार । नजर भई बका मिने, किया दीदार परवरदिगार ॥१००॥
तब गया फते महम्मद पे, एक पूछत तुमें सवाल । जो इनका दे जवाब, होवे तेरा मुझ पर भाल ॥१०१॥
खुदाए की सूरत का, मुझे दे उत्तर । फरमाया फरमान हदीसों, कर मेरी जमा खातर ॥१०२॥
रूयेतरवी फिल लैलतुलम्याराज, ए कलाम बरहक । के दिल तुमारे सक है, देओ जवाब माफक ॥१०३॥
तब फते महम्मद कहया, इनमें ना कछु सक । जाहिर कर हम ना सकें, सरा जाहिर परस्त बुजरक ॥१०४॥
सो हमको मारत, तिन वास्ते कहयो न जाए । हदीसों भए मायने, अब तुमारा क्या बसाए ॥१०५॥
तब फते महम्मदें फेर कहया, जोलो पातसाह न आवे बीच दीन । तोलों आगा हम क्यों करें, पहले क्यों ल्यावे आकीन ॥१०६॥
तब जहान महम्मदें कहया, तुमारा ईमान ऊपर सुलतान । ऐसा तुम क्यों कहों, जब देखो हक पेहेचान ॥१०७॥
ए खटपट भई आपस में, तब इनने छोड़ दिए पठान । तुम मने करो जहान महम्मद, उत जावें नही निदान ॥१०८॥
मिल पठानो मनें किया, जहान महम्मद को सबन । तूं क्यों वैरागी के कदमों लगे, तें क्या जान्या मोमिन ॥१०९॥
लड़ाई होने लगी, सुनी श्री जी साहिब जी नें बात । तब बरजा जहान महम्मद को, जिन तुम जिद करनें जात ॥११०॥
एतो अमल दज्जाल, सो तो जाहिलों का बाप । इनसों छले छूटिए, तुम जिन जोरा करो आप ॥१११॥
तब जहान महम्मदे कहया, मोहे दज्जाल लगा बरजन । मैं तिनका कहया क्यों करूं, ईमान खतरा होवे मोमिन ॥११२॥
मैं तो साहिब देखिया, जाहिर अपने नैन । तहां खतरा होत है, ए मुखथे कहो न बेन ॥११३॥
पठानो परियान किया, जहान महम्मद डारे मार । इन हमारे दीन से, छोड़ दिया वेहेवार ॥११४॥
पहले तो बैरागी से, करे लड़ाई जोर । आपुस में सब मिल के, करने लगे सोर ॥११५॥
तब रात को मिलके, आए जने दस बार । श्री जी साहेब जी बैठे हते, आगे हुसेनी बचे उस्तवार ॥११६॥
इत बैठी मजलस, भर के बाजू दोए । मोमिनों आगे किताबें, रेहलों पर धरी सोए ॥११७॥
दोऊ बाजू दीवी पीतल की, है बड़ी जोत रोसन । चरचा आपुस में करें, श्री जी संग मोमिन ॥११८॥
देख दज्जाल मजलस, करने लगा सोर । ए भगत जी क्या है, हम करें लड़ाई जोर ॥११९॥
तुम टीका माला पेहेनत, और क्यों पढ़त कुरान । एह रवा है नही, जो तुम कहो सुनों कान ॥१२०॥
तब श्री जीयें कहया, हम बरजत हैं तुम । खुदाए और रसूल की मुहब्बत, बांधत आपस में हम ॥१२१॥
तिनको तुम ढाँपत हो, ए तुम्हें किन फुरमाए । तब जहान महम्मद बोलिया, तुम्हें किने ए बताए ॥१२२॥
मैं तो तुम्हारा उस्ताद, तुम लेते तालीम । अब बातें करने लगे, बड़े होत अजीम ॥१२३॥
यों करते जोस मिहीन को, जबराईल हुआ जोर । आया जोस गाजी खान को, दज्जाल डरा देख सोर ॥१२४॥
आया जोस अव्वल खान को, और जहान महम्मद । यारो उठो जिमी फिरी, इत उड़ गई सब हद ॥१२५॥
ए भगत जी हम जात हैं, हमको कीजे माफ । हमतो अब जात हैं, हमारे दिल हुए साफ ॥१२६॥
उठ भागे यों कह के, जाए सिपाह में किया सोर । यारो बड़ा जादूगर, हमारा कछू न चल्या जोर ॥१२७॥
इन समें भावसिंह का, वाका हुआ जब । तब जोर किया दज्जाल नें, सोर बड़ा हुआ तब ॥१२८॥
फते महम्मद ने तिन समें, किया चाकरों को हुकम । ढूंढ काढ़ो बैरागी, दे कैद में हम ॥१२९॥
श्री जी साहिब जी उनके पुरे, रहें जाए हवेली पास । उत मुल्ला के घर, करते न काहू विस्वास ॥१३०॥
लगे कुरान उतारने, लोभ दिखाया तिन । ओतो राजी भया, बैठे लालदास चरन ॥१३१॥
तीन दिन तहाँ रहे, ए ढूंढ़े सहर में ठौर । भवानी भट्ट मिला, किया तिन पर जोर ॥१३२॥
बरयाए के भाग के छूटा, ए जो भट भवानी । हमें दिखाओ बैरागी, हम ढूंढ़ थके अपनी ॥१३३॥
तब भड़कल दरवाजे, लोकों दिया जवाब । वेरागी तो जात रहे, तुम जिन भटको इन बाब ॥१३४॥
जहान महम्मद आइया, फतू अल्ला के घर । तहां वेरागी देख के, पूछी श्री जी की खबर ॥१३५॥
श्री जी साहिब जी बैठे हैं, इस हवेली में । ए तो ठौर दज्जाल की, तुम डरत नही इनसें ॥१३६॥
इनके आदमी तुमको, ढूंढत फिरत सब ठौर । ए मुहल्ला फतू अल्ला का, ए लड़ेगा तुमसे जोर ॥१३७॥
सिताब निकलो यहां से, मोहे दिखाओ श्री जी साहिब । साथ ल्याए कदमों, हकीकत कही तब ॥१३८॥
जब तक लगा दिन डूबने, श्री जी साहिब जी भेले लालदास । तपसीर लिखते मुल्ला के, छोड़ी तिनकी आस ॥१३९॥
बुलाए ल्याए चरन दास को, तपसीर छोड़ी तिन ठौर । सात कोस चले गये, भया भावसिंह लसकर भोर ॥१४०॥
तहां से राह चल के, मिला राह में भीमसेन । तिनको ल्याए बुढ़ान पुर, कही बीतक सब ऐन ॥१४१॥
मैं आया तुम्हारे दीदार को, कोईक दिन रहया कदम । तिनसे सवाल लिखाए कुरान के, ले जाओ मलूकचन्द तुम ॥१४२॥
भेजे औरंगाबाद, फतू अल्ला पर । एक हिदायतुला काजी पर, एक दीवान खातर ॥१४३॥
तीन जिल्दें तीनों पर, और लिखी हकीकत । रूक्का दलेल खान पर, दई हकीकत कयामत ॥१४४॥
वीरजी पठवायो औरंगाबाद, सेखबदल लाल खान । इनें आकोट से बिदा किए, क्योंए होए पहिचान ॥१४५॥
महामत कहें ऐ मोमिनों, ए औरंगाबाद की बीतक । अब आकोट की कहों, जो बीतक है बुजरक ॥१४६॥
(प्रकरण ५३, चौपाई २९३०)
