श्री बीतक - प्रकरण ५४ | Beetak prakaran 54
शुक्राना - आकोट
अब तुम सुनियो साथ जी, सुकराना करो याद । एक बातून तुम ऊपर, दिखाऊं तुमें बुनियाद ॥१॥
इन जिमी में आज लों, वेद कतेबों करी खोज । पर ठौर अक्षर न पाइया, त्रिगुन थके खोज ले बोझ ॥२॥
और जो कोई खोजत, ले तिनके सुकन । जिनों नेत नेत पुकारिया, खबर नही त्रिगुन ॥३॥
जो तिन की खोज से, मकसूद न होवे इन । सो सारे जाहिर कर, बैठाए इत मोमिन ॥४॥
अक्षर अक्षरातीत की, काहू नही पहिचान । सो कर पकर बताइया, दृढ़ कर दिया ईमान ॥५॥
दे गुन पख इन्द्री साहिदी, और सास्त्रों के वचन । और भाखा सब साधों की, सिफत करे मोमिन ॥६॥
जो नहीं अक्षर जागृत में, धाम अंदर की सुध । सो सैयों को दई, जागृत हृदय बुध ॥७॥
तिन बुध संग तारतम, सब कही हकीकत धाम । सो वतन सैयन का, जाहिर किया इस ठाम ॥८॥
धाम अन्दर की बीतक, संग मूल सरूप बिहार । जो बात मूल सरूप के चित्त में, ताको सैयां खबरदार ॥९॥
जो अक्षर पावे नही, सो त्रिगुन पास क्यों होए । सो सुपन के जीवों को, सब ठौर बताया सोए ॥१०॥
ए मेहर मोमिनों पर, सबों पाई इनों सोहोबत । एह समें हकें किया, फरदा रोज कयामत ॥११॥
इन भांत मेहर मोमिनों पर, कै अलेखे अपार । सो इन जुबां केती कहों, दिए बातून खोल के द्वार ॥१२॥
अग्यारे सौ साल का, लिख भेजा अल्ला कलाम । खोज करी सब सृष्ट नें, पाया न काहू निजधाम ॥१३॥
सो आमर इसलाम की, सब हाथ दई मोमिन । खुली हकीकत मारफत, सब तले इनके इजन ॥१४॥
जो आए इनके हुकम तले, सो आए बीच इसलाम । सो सब उसका हो चुका, जिन खुले रब्बानी कलाम ॥१५॥
एह तो बातून की, मेहर है ऊपर रूहन । और ऊपर मेहर वजूद के, सो जाहिर देखो मोमिन ॥१६॥
पहले मूल बृज मिने, तित पड़े बिघन । सो सारे दफे हुए, हुए संसार में धन धन ॥१७॥
आज लों ब्रह्मांड में, सब बन्दे बृज रेंन । पावत नही ब्रह्मादिक, तित थे मोमिन बीच चेंन ॥१८॥
फेर आए बीच रास के, कहया दूसरा दिन । ना ताकत सुनने त्रिगुन को, तहां खेले मोमिन ॥१९॥
सब कोई वांछे तिनको, पावे नही खबर । अटकले अखण्ड की, पावे न कोई फजर ॥२०॥
रास रात ढूंढन की, अटकल करें अनेक । हाथ कछू न आवही, बिन मोमिन न पावे एक ॥२१॥
रास लीला खेल के, आए बरारब स्याम । सो वास्ते मोमिन के, पूरे किए मनोरथ काम ॥२२॥
एह दिन तीसरा, कहया माजजे देखाए अनेक । अग्यारे सै बरस आगे कहया, कोई अरथ न पावे हरफ एक ॥२३॥
दिन चौथे मिने, धरा रसूलें कदम । तिन पांउ सूझ ना किया, जागें न कोई आतम ॥२४॥
ए हकीकत रूहअल्ला की, सौ बरस रखी छिपाए । धरा कदम दूसरा, दई रूहों को पोहोंचाए ॥२५॥
एह दिन पांचमा, इमाम की इमामत । सो दरवाजा जाहिर किया, फरदा रोज कयामत ॥२६॥
ए चीन्हों सूरत रसूल की, वास्ते काम किए मोमिन । कै लोकों दिखाए माजजे, तोहे न पतीजे मन ॥२७॥
अब छठा दिन जुम्मे का, तहां मोमिन जमा भए । ए सब होत तिन वास्ते, सुकन जबराईलें कहे ॥२८॥
ए माजजे मोमिन देखहीं, सब पांचों दिन के । होय वारस बेटे बाप के, सब मता आया इन पे ॥२९॥
सो जाहिर करत हैं, करनें को पहिचान । पहिले मोमिन ईमान ल्याए, पीछे सब खलक सुने कान ॥३०॥
महम्मद के माजजे, सो जाने इसलाम । बातून मोमिन जानहीं, और जाहिर खलक आम ॥३१॥
कई काफरों गुलबा किया, मानें नहीं पैगाम । तिन सबों के सिर भान के, ल्याया जाहिर इसलाम ॥३२॥
जो मिल्या जिन भांत सों, तिन सों मिले तिन विध । अन्दर मेहर जाहेर कहर, ए भई महम्मद की सिध ॥३३॥
नबी की नबूबत, बैठे जानी ना किन । तो ए लड़ने को सामें खड़े, आकीन न आया जिन ॥३४॥
जब बोए आई इसलाम की, वोही आए बीच दीन । तिनकी नसल जो बढ़ी, ताए बढ़ता गया आकीन ॥३५॥
बढ़ते बढ़ते बढ़या, आम आए बीच दीन । तेही महम्मद के वास्ते, लड़े काफरों से ले आकीन ॥३६॥
अग्यारे सैं साल लों, बढ़ा दीन इसलाम । किया था वायदा तिन सों, हक फेर आवेंगे तिन ठाम ॥३७॥
मेरी तीन सूरत को, पेहेचानियो अब तुम । बसरी मलकी हकी, तुमें दिखावें हम ॥३८॥
ए पोहोंचे नजदीक खुदाए के, तित काहू की ना गम । न फिरस्ते नजीकी न मुरसद, ल्याइयो ईमान तुम ॥३९॥
गिरोह रब्बानी उतरे, हम आवें तिन वास्ते । तुम उम्मेदवार तिनके, तुम पेहेचानियो मुझे ॥४०॥
ए कलाम रब्बानी उतरे, सो वास्ते मोमिन । तिन कौल कोई न ले सके, बिना मेरे दिल रोसन ॥४१॥
इन बात से जानियो, एही मोमिन सके पहिचान । जिनकी असल अरस में, हकें दिया ईमान ॥४२॥
और कोई न समझे, पहिले न आवे ईमान । बिना अंकूर क्या करें, आवे नही पहिचान ॥४३॥
हकीकत मारफत के, खोल दिए दरबार । देखत अचरज पावहीं, पोहोंचे न परवरदिगार ॥४४॥
सातों निसान कयामत के, लिखे बीच बातून । मोमिन देखें जाहिर, हुए जिनके दिल रोसन ॥४५॥
हजरत ईसा आइया, ल्याया किल्ली गंज कलाम । पहिचान भई मोमिन को, आए बीच इसलाम ॥४६॥
आया दसमी सदी मिने, बातून हुई जाहिर । रहे बरस चौहत्तर, चीन्हे न कोई बाहिर ॥४७॥
कई माजजे तिन के, हुए बीच जिमीन । इलम लुदंनी ल्याइया, पड़ा न काहू चीन ॥४८॥
सोर किया दज्जाल नें, नाजल के बखत । एह मोकों मारेगा, बखत फरदा रोज कयामत ॥४९॥
पेहेना जामा दूसरा, आए बैठे बीच इमाम । तब दज्जाल ने जानिया, इनें मेरे मारनें का काम ॥५०॥
तब इनके सामने, लड़ने हुआ तैयार । मोमिन मोसों छुड़ाए के, पोहोंचावे परवरदिगार ॥५१॥
मेरा जोरा इन से, चलत नही लगार । तिस वास्ते छोड़ हों, चार फौज करों तैयार ॥५२॥
एक बेईमान औरत, और बाजे बजावन हार । तीसरे पढ़नें वाले इलम के, चौथे जादूगर होसियार ॥५३॥
जहां कहूं पावे मोमिन, खैंचे अपनी तरफ । जिनमें ईमान असल का, सो सुने न एक हरफ ॥५४॥
लगा सूर फूंकने, असराफील करना ए । सन एक हजार नब्बे, सुन सैंया दौड़ के आए ॥५५॥
काफरों के दिल बैठ के, बड़ा जो किया सोर । मोमिन उतरे अरस से, ताको चित्त न हुआ मरोर ॥५६॥
खेस कबीला कुटुम्ब, सब दज्जाल को लसगर । तिन में से छुड़ाए के, पहुंचाए अपने घर ॥५७॥
निगहबानी जबराईलें, करी ऊपर रूहन । साफ रखे सबों अंगों, दिल रहे हमेसा रोसन ॥५८॥
जब याद करने फजर को, लगा पोहोंचावने पैगाम । तब दज्जाल ने चीन्हया, ए मारे मुझे इमाम ॥५९॥
तिन से लड़ने को, बांधी कम्मर जोर । तब पैगाम पोहोंचाईया, किया बड़ा सोर ॥६०॥
छुड़ावने ईमान को, करने लगा जुलम । पैठ अपने लसकर में, सक सुभे उठावे कुंम ॥६१॥
परवरदिगारें देखिया, लड़ाई के बखत । बुलाया बेतुल्लाह को, साहिदी बखत कयामत ॥६२॥
सरियत के सिरे से, लिखे वसीयत नामें चार । तिनमें खबर कयामत की, पर काफर करे न विचार ॥६३॥
दज्जाल दिल सबन के, जोर बैठा दुसमन । जब पोहोंचे नामें वसीयत, धोए डारे सबन ॥६४॥
जब इमाम साहिब ने, पोहोंचाया पैगाम । तब दज्जाल कम्मर बांध के, लड़ा सामें इसलाम ॥६५॥
ऐसे समय में मेरते से, भेजे पैगम्बर । राठौर जसवंत सिंह सों, जाए कहो खबर ॥६६॥
जब पैगाम गया उन पे, सुन्या नाहीं कान । आजूज माजूज जो मारिया, बिना देखे ईमान ॥६७॥
फेर आए दिल्ली सहर में, तब भई सामी सरियत । ए आया हमें उठावने, फरदा रोज कयामत ॥६८॥
बात न सुनें इनकी, अपनी सुहबत में । घेर लिया सुलतान को, बात न करें इन से ॥६९॥
जो पैगाम पोहोंचावहीं, तिनको डारे मार । ताबे सब दज्जाल के, हुए ना खबरदार ॥७०॥
जब सुलतानें सुनी, दौड़ा तरफ ईमान । तब दज्जाल आड़े आए के, भान दई पहिचान ॥७१॥
बसबसा करने लगा, ऊपर छाती के । छूटत तुम से साहिबी, क्यों मानत हो ऐ ॥७२॥
जो मेरे ताबे रहोगे, तो करो पातसाही तुम । जो ताबे होत इमाम के, तो तुम पर होवे जुलम ॥७३॥
इत दज्जालें आए के, कहया मोमिन सें । मेरी पातसाही मिने, क्यों खड़ भड़ पाड़ी तुमें ॥७४॥
इहाँ से जाओ भाग के, ना कैद में करो तुम । मोमिन डरे तिन से, ताबे हुए हक हुकम ॥७५॥
दज्जाल गुस्से होए के, पैगाम दिया भान । मोमिन कैद करके, फेरी दृष्ट सुलतान ॥७६॥
तब हक सुभाने देखिया, तखत से दिया उठाए । सहे कै कसाले मोमिन, पनाह में लिए बचाए ॥७७॥
उदेयपुर आए पोहोंचे, दिया राणे को पैगाम । तित दज्जाल बैठा था, लड़ा साथ इमाम ॥७८॥
पीछे सुलतान आए के, मार उठाया तिन । राखे पनाह में इनको, पोहोंचे मन्दसोर मोमिन ॥७९॥
तब हक सुभान सों, इनों करी अरज । सोर दज्जाल का देख के, वास्ते उम्मत के गरज ॥८०॥
अरज सुनी सुभान नें, जबराईल भेज दिया । दे दस सिपारे कुरान के, बोहोत खुसाल किया ॥८१॥
तहां से उज्जैन में, रहे केतेक दिन । वास्ते दीन इसलाम के, थे कोई कोई मोमिन ॥८२॥
बुढ़ानपुर से होए के, पोहोंचे औरंगाबाद । बुलाए भावसिंह ने, हुआ कछुक इन्हें स्वाद ॥८३॥
अपने अंकुर माफक, लाभ हुआ इने । लगा माजजा मांगने, वाका हुआ तिन सें ॥८४॥
इन समें इत दज्जाल नें, बड़ी करी तलास । राखे मोमिनों को पनाह में, भानी दज्जाल की आस ॥८५॥
भेजा संदेसा खुदाए नें, बनी असराईल करो याद । तुम पीछे खबर फेरून की, सो मैं खबर दई बुनियाद ॥८६॥
दई तुमकों मैं कुलजम, इनको किया गरक । पढ़ो मेरे कलाम को, भागे सारी सक ॥८७॥
महामत कहे ऐ मोमिनों, सुकराना ल्याओ बजाए । दज्जाल सों लड़ाई, और क्यों कर लिये बचाए ॥८८॥
(प्रकरण ५४, चौपाई ३०१८)
