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श्री बीतक - प्रकरण ५५

लाल दास लसकर (दिल्ली काजियों के पास) को गए

उहां से आए बुढ़ानपुर, फेर पहुंचाया पैगाम । भई लड़ाई सरीयत सों, बीच दीन इसलाम ॥१॥

लाल पैगाम लेइ के, गया उत सरियत । करी काजी सों मुलाकात, लिख के भेजी तित ॥२॥

काजी अन्दर बुलाए के, पूछनें लगा कलाम । कहा हते क्यों कर आए, जवाब दिया इस ठाम ॥३॥

हमको हादी भेजिया, तुम पर सेख इसलाम । हमको जवाब दीजियो, जो भेजे तुम पर कलाम ॥४॥

पहिले तुम पर ल्याइया, मलूक चन्द अजमेर । सवाल कलाम अल्लाह के, ताको जवाब करो इन बेर ॥५॥

तब सेख इसलामें कहया, ए तुमें खुले कलाम । हम कहें तुमको, ए यार था इस ठाम ॥६॥

प्रात समें तुम आइयो, तुमकों कहें हम । अब तो हम जात हैं, प्रात को कहियो तुम ॥७॥

दिन दूसरे प्रात को, गए लाल नूर महम्मद । जाए के मुलाकात करी, जो साहिब सरियत हद ॥८॥

भई बातें सेख इसलाम सों, तहां बैठे थे यार । मंगाए किताब सवाल की, करनें बैठे विचार ॥९॥

बोले लोग सरियत के, एतो लिखी गलत । तब लालें जवाब दिया, कहा कहें तुमें इत ॥१०॥

हदीसां कुरान की, तुम नाम धरत इत । तो हम तुमसों क्या कहें, दावा रोज कयामत ॥११॥

तब सेख इसलामें कहया, हम ना कहेंगे गलत । ए लिखनें में चूक है, है उमियों के दसकत ॥१२॥

तब लालें जवाब दिया, इनका दोस कछू नाहीं । तुम मायना लेओ अन्दर का, होए पहिचान तासों ताहीं ॥१३॥

लई किताब जो हाथ में, बैठा दिल पर दुसमन । तिने दिल फिराइया, तित लड़े साथ मोमिन ॥१४॥

जवाब न होवे सवाल का, पोहोंचे ना हकीकत । तब गुस्सा लेए के, बात कही मोंह सखत ॥१५॥

फेर नवां किताब में, तिन बीच अल्ला कलाम । तुम एतो बात झूठी लिखी, ल्याए कीना इसलाम ॥१६॥

बड़ा डर किताब का, यों बोलन लगे सब । लाल को गुस्सा चढ़या, लई हाथ से किताब तब ॥१७॥

फेर काजी ने कहया, ए किताब राखें हम । लई लाल के हाथ से, दई अपने खादम ॥१८॥

तब काजी झुक के, करने लगा जवाब । अब तुम कहा कहत हो, हमको इनके बाब ॥१९॥

तब लालें देखिया, फिरी द्रस्ट जो इन । इन मारने का मन में लिया, ए बात ना सुने कान ॥२०॥

तब झुक के काजी ने कहया, मन में धर के रोस । तुम हमसों कहा कहत हो, हुआ इन पर बड़ा अफसोस ॥२१॥

तुम दावा करत हो, हमसों इमामत । एही बात फेर फेर कहे, लालें जवाब दिया इत ॥२२॥

हम तुम सों कहा कहें, कहावत हो हजरत तुम । एही बात कहत हैं, एता कहत हैं हम ॥२३॥

तब बोला सेख इसलाम, उन राह पाई नाहें । तब लाल गुस्से भया, ना चाहिए काढ़ो जुबाएं ॥२४॥

अब हम तुमको, कबहुं ना दें पैगाम । अब हम फेर जात हैं, ले अपने घरों इसलाम ॥२५॥

पीछे लगे बुलावने, सोहोबत के सब जन । निकसी मुख थें मुनकरी, कबहूं मुख ना देखें तिन ॥२६॥

इहां से चलके आए, घर मुफती अब्दुल रेहेमान । जिनसों मिलाप करके, कहया पैगाम सुभान ॥२७॥

कही हकीकत सरिएत, जो भई सेख इसलाम । करी मुनकरी इनने, हम पहुंचाया पैगाम ॥२८॥

अब हम तुमको कहत हैं, जो हमें आवे कछू दोस । तुम कहोगे हमको ना कहया, पीछे बड़ो होसी अफसोस ॥२९॥

हम तुम एक वतन के, तिस वास्ते उमेठत हैं कान । हम देखा रसूल खुदाए का, तुम ल्याओ तिन पर ईमान ॥३०॥

तब जवाब मुफतें दिया, रसूल आवे बखत कयामत । सो तो अजू दूर है, तुम आज ल्याए क्या इत ॥३१॥

क्यों तुम जान्या दूर है, बीच किताब इकतलाफ । समझ हमें कछू ना पड़े, क्यों दिल होवे साफ ॥३२॥

तब जवाब लालें दिया, ल्याओ किताब तुम । सब तारीखें समझाए के, एह बतावें हम ॥३३॥

सवाल दिखाए कुरान के, ताको दिया जवाब । ए तो आगे हो गये, ताके किस्से लिखे किताब ॥३४॥

बड़ी भूल तुम बीच में, ले डारत किस्से कुरान । वे रद जमाने हो गए, तुमको एही पहिचान ॥३५॥

ए सारे किस्से आज के, रसूल आए इत । सरत लिखी सो भई, फरदा रोज कयामत ॥३६॥

आए असहाब रसूल के, जाहिर भए मोमिन । आज तुमसो हम कहत हैं, हमें दोस दीजो कोई जिन ॥३७॥

तीन दिन सोहोबत भई, आया हादी का हुकम । अब तुम उत जिन रहियो, ए पाती लिखी हम ॥३८॥

नारायण दास ले आइया, सुन्या हक हुकम । उते पानी ना पीजियो, सिताब बुलाए तुम ॥३९॥

ए तो लोग सरियत के, जिन तुम पर डारे तोहमत । पोहोरा ए दज्जाल का, ए दुस्मन कयामत ॥४०॥

सुन पाती लालदास, संग चला नारायण । नूर महम्मद आए मिला, सरिएत कबहूं ना ल्यावे ईमान ॥४१॥

चले पीछे दिन तीसरे, पोहोंचे हादी कदम । मिलाप कर बातें करी, जो बीतक भई हम ॥४२॥

तब सुकराना राज का, बड़ा जो देखा इत । काल के मुख थें काढ़ के, राखे पनाह में साबित ॥४३॥

महामत कहे ए मोमिनों, ए बीतक बुढ़ानपुर । अब कहों आकोट की, राखे पनाह में ज्योंकर ॥४४॥

(प्रकरण ५५, चौपाई ३०६२)

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