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श्री बीतक - प्रकरण ५७

बुढ़ानपुर से आकोट, तहां रहे महिने चार । खबर लई सब साथ की, करने लगे विचार ॥१॥

एक लिखी फतूअल्ला पर, रहे बीच औरंगाबाद । तिनको सवाल कुरान के, लिख भेजे हैं आद ॥२॥

और हकीकत लिखी, तुम लड़ने बांधी कमर । होत एक दीन महम्मदी, तुम आड़े भए इन पर ॥३॥

आवते थे इसलाम में, तिन मारी सबन की राह । बिन समझे बातें करी, दुसमन हुए खुदाए ॥४॥

अब सवाल पठाए हैं, तिनको दीजो जवाब । जो पढ़े तुम आरफ हो, तो कहो इनके बाब ॥५॥

हम आवत है दीन में, हमको करो मुसलमान । दीन महम्मद के दाखिल करो, होए तुमारे गुलाम सुने कान ॥६॥

हमको समझाओ तुम, रब्बानी कलाम । जो लिखा सो सब करें, करो दाखिल बीच इसलाम ॥७॥

तब तोड़ी तुम को, खाना पीना हराम । जोलों हमारी निसां ना भई, तोलों जिन करो कोई काम ॥८॥

हम लाखों कबीले हिन्दुअन के, होत दाखिल दीन इसलाम । एह काम छोड़ के, कहा करो इस ठाम ॥९॥

जो सिफत कुरान में, लिखी नाजी फिरके की । जो तुम हो उन में, तो कहो खबर वही उतरी ॥१०॥

जो रूहें दरगाह मिनें, कही महम्मद बारे हजार । जो तुम हो तिन में, तो करो हमको खबरदार ॥११॥

जिन रूहों का मरातबा, लिखा अमेत सालून । तिन मानंद कोई नहीं, तुम देओ जवाब हो कौन ॥१२॥

मोमिन नूर बिलंद से, उतरे दुनियां में । जो तुम हो उन कौम में, तो करो जवाब हम सों ॥१३॥

बीच नसारों के गिरोह में, लाहूत का निसान । जो तुम हो तिन में, तो कर देओ हमें पहिचान ॥१४॥

जो लिखी सिफत यहूदन की, बीच अल्ला कलाम । जिन बीच में महम्मद, करे पातसाही तमाम ॥१५॥

जो तुम हो तिन में, तो हमको देओ खबर । गिरोह बनी असराईल की, जो है सब ऊपर ॥१६॥

जो तुम हो उन में, तो कर देओ हमें पहिचान । बांध्या बनी असराईलें, कयामत का निसान ॥१७॥

जो तुम हो तिन में, सो निसां करो तुम । जो जवाब न आवे तुम को, तो बताये देवें हम ॥१८॥

इन भांत के निसान, लिख भेजे उन ऊपर । जवाब न आवे तिन को, सरमिंदे हुए योंकर ॥१९॥

यों ही एक लिखा काजी पर, हिदा तुल्ला जाको नाम । एक लिखा अमानत खां दीवान पर, रूक्का बहादुर खान इस ठाम ॥२०॥

यों बैठ के आकोट में, पोहोंचाए पैगाम । पर दिल मुरदे न पावहीं, पहिचान दीन इसलाम ॥२१॥

इहाँ भाई से भाग के, आया अब्बल खान । रह न सके माया मिने, जाको हक पहिचान ॥२२॥

बोहोत दिलासा करी, बीच तरीकत इसलाम । तुमको दुनिया न लगे, हम जब बैठें एक ठाम ॥२३॥

तब तुमें बुलावेंगे, जिन तुम होवो दलगीर । तुम हमारी आत्मा, सांचे तुम सूर धीर ॥२४॥

तुम चार दिन रहो भाइयों भेले, अब रोसन होत है काम । तुम बैठे अरस अजीम में, निज वतन जो धाम ॥२५॥

आकोट के चौधरी, ताको भई पहिचान । ज्यों लौकिक गुरु मानिए, इतना था ईमान ॥२६॥

बार दो चार अपने घर, बुलाए करी मनुहार । अरूगाए भली भाँत सों, कर आचार विचार ॥२७॥

साथ सबको बुलाए, प्रसाद लेवे को । साथ राज के संग, बैठाए कबीले मों ॥२८॥

चरचा किरंतन सेवा को, लियो सुख माफक अंकूर । तहां रहे तिन माफक, उत तैसा हुआ मजकूर ॥२९॥

उत आया एक ब्राह्मण, सुनने को चरचा । परगने बराड़ के, हाकिम का गुमास्ता ॥३०॥

तिन सुनी चरचा कबीर की, लगे कलेजे घाव । खुल्या द्वार हकीकत का, ऐसा लगा आए दाव ॥३१॥

भूल गया सरीर को, नजर पहुंची बका में । और सान कछू न रही, हुआ सब तुमही सें ॥३२॥

घरों जाए पीछे फिरे, ज्यों ताना कोरी के । आवें जाए फिर फिर फिरे, नजर भई इनें ए ॥३३॥

जो बात कहे उनको, तो कहे तुमही हो तुम । और न मुंह से काढ़हीं, तुम पे आए हम ॥३४॥

जो चरचा कर समझाइये, तो बोल न निकसे और । चित उनका लगा, मूल अक्षर के ठौर ॥३५॥

पीछे फिरता ही रहे, समें प्रात के नदी पार । श्री राज दातौन करत हैं, पैठा नदी में हुसियार ॥३६॥

समेत कपड़े चला गया, गिर पड़ा बीच में । सुध न सान सरीर की, गिरी पाग उतर उन सें ॥३७॥

पैठे साथी दौड़ के, निकाला नदी से । कपड़े सुखाए पहिनाए, कछू सुध न रही इने ॥३८॥

पूछा उनें रसोई का, कहया चौका भए दिन तीन । मैं जानत नहीं कछुए, ए लोगों कहया आकीन ॥३९॥

ए भांत इनका फेर, पीछा हटाया चित । फिराया फिरे नहीं, उनके भाई बुलाए इत ॥४०॥

डोली में बैठाए के, पहुंचाया अपने ठौर । अंकूर माफक उन लिया, पावे न ज्यादा और ॥४१॥

सुकदेव ब्राह्मण था, मुलक उदेयपुर का । आतम सौंपी कदमों, अंकूर जेता तेता सुख लिया ॥४२॥

फेर उहां से चले, आए कापस्तानी । तहां बैठ चरचा करी, गिरोह जान अपनी ॥४३॥

तहां ईमान ल्याइया, दगड़ा और दत्ता । अमराजी आइया, सुन थोड़ी सी चरचा ॥४४॥

और कुटुंब कबीला अपना, ल्याया बीच दीन । तामे अमराजी रह गया, जिनका बका आकीन ॥४५॥

फेर दिन दस पांच रह के, आए एलचपुर पोंहोंचे । तहां एक परसाजी ने, खिजमत करी ए ॥४६॥

जो तुम इते रहो, तो मैं सेवों तुमें । ज्वारी मेरे बहुत हैं, मैं सेवा करों तिन सें ॥४७॥

तीन चार दिन सेवा करी, उच्छव रसोई । फेर तहां से चले, केतिक मजलें राह में भई ॥४८॥

मिला फकीर संग का, तिन साखियां दे करी सेव । सुन चरचा गलित भया, पाया नहीं भेव ॥४९॥

तहाँ से आए देवगढ़, तहाँ रहे दिन चार । राम टेक का राजा था, तहां किया ना किन विचार ॥५०॥

उहां से चलके, आए राम नगर । भई मजलें दरम्यान में, ए सुख सब ऊपर ॥५१॥

एक समद घोड़ा, असवारी को हाजर । श्री राज तापर विराजत, संग मोमिनों का लसगर ॥५२॥

तहां मांगत टूंका चलहीं, झोरी भर ल्यावें । श्री राज को अरूगाए के, साथ को बांट देवें ॥५३॥

सब साज फकीरी का, सोभित सब सनंध । मोमिनों भेख पहिचानिया, क्या पहिचाने अंध ॥५४॥

एक लड़ाई राह में, दज्जालें करी दरम्यान । भई गोंडों के गांव मिने, करी बिन पहिचान ॥५५॥

रामनगर आए पहुंचे, रहे केतकी पर । तहां अस्तल बनाए के, गणेस महन्त के बराबर ॥५६॥

पहिले आए छतई मिले, अपने कबीले समेत । और आया सुकई, और चूरामन इत ॥५७॥

और कुंजा वीर जी, और राम रतन । और गंगा सन्ता बेटी, कुसल्या जातमाल मोमिन ॥५८॥

और सूरत आइया, अपने तन मन धन । और देवकी नन्दन ईमान से, और स्तुति देत श्रवन ॥५९॥

और जगन्नाथ जातमाल, ए आए एचदे से । मकरन्द दास जातमाल, और कबीला दाखिल इनमें ॥६०॥

गोकल दास जातमाल, ले कबीला समेत । और सुन्दर दास आए, ईमान मुख कहत ॥६१॥

जयंतीदास जातमाल, और कबीला ल्याया । फेर पीछे से बुलाया, पहिले आपको ईमान आया ॥६२॥

और हरि राम भाई, और लड़ेती आई । चन्दा ईमान ल्याए के, कबीला पीछे ल्‍याई ॥६३॥

और आया सुन्दर, था नानक पन्‍थ में । और ननियां आई, बाई लाली आस इन सें ॥६४॥

और मूसे खां पठान, आया बुढ़ानपुर से । ईमान ल्‍याए घर गया, रहया कबीले में ॥६५॥

और रंचो बढ़ई, जयंति काके उपली पहिचान । आवत है दीदार को, ले दिल में ईमान ॥६६॥

मुरलीधर राह में, सुनके ए ल्याए ईमान । उनको असल अंकूर की, उतहीं हुई पहिचान ॥६७॥

कानजी आहेड़ का, सो गया एचदे में । गोकुलदास मकरन्द को, आए इसलाम तारतम सुनके ॥६८॥

कौसल्या ने सुनी, और देमां मथुरी । और श्री राम राजाराम, और भागो भाग भरी ॥६९॥

राजू और भंडारिन, और राई कुंवर । इनों सुन्या तारतम, देखा पटन्तर ॥७०॥

हिमोती और खेमाबाई, और आसबाई । संभू और मन्ना, और राम कुंअर आई ॥७१॥

जीवनदास और नवलदास, और आए भाई कल्यान । और महासिंह चौधरी, और दौलत खां पठान ॥७२॥

और पूरन नाऊ, और आसा राम । और एक आसा लल्लू, और परसराम ॥७३॥

और आए सेख खिदर, और अब्दुल रेहेमान । और भिखारी दास, ले कबीले समेत ईमान ॥७४॥

और आए भाई रघुनाथ, कबीला इनका आया । ए रामनगर की मजल, ए तो हिस्से माफक सुख पाया ॥७५॥

और बुढ़ानपुर से, आया बृन्दावन । और नारायन दास, और बराड़ का साथ मोमिन ॥७६॥

लच्छीदास खेमकरन, और आया कंनड़ जे । और हरकृष्ण सुकदेव, और गिरधर बेकैद ऐ ॥७७॥

और खरगो माता उनकी, और आए जगरूप । चरचा सुनत श्री राज की, सुन्दर रूप अनूप ॥७८॥

और आया रामनगर में, ए जो गंगा राम । और जो आया बदले, उन पाया आराम ॥७९॥

पतिराम मोदी, और केसवदास । और बल्‍लभदास संग, और मनिया खास ॥८०॥

और गिरधर बसन्‍त, और दयाल हसन । और बिहारी फरास, और बिहारी रोसन ॥८१॥

और गिरधर दरजी, और सूरज मल । और गोविन्द राए ईमान, और लालमन निरमल ॥८२॥

और देवराम, और पहाड़ी जाको नाम । माता खेमकरन की, आई जातमाल के काम ॥८३॥

और देवी दास आइया, और आए भगवान । सिद्धपुर पाटन से, दामोदर परवान ॥८४॥

और तिवारी उदई, थी लौकिक पहिचान । श्री राज को घरों पधराए के, रसोई कराई प्रमान ॥८५॥

चांद खान आइया, चरचा सुनने को । दौड़ता ईमान को, रहा रामनगर मों ॥८६॥

महामत कहें ऐ मोमिनों, ए कही रामनगर की तुम । और आगे अजूं बहुत, कहों हक के हुकम ॥८७॥

(प्रकरण ५७, चौपाई ३१५७)

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