श्री बीतक - प्रकरण ५८ | Beetak prakaran 58
ए बात हरिसिंह सुनी, करने आया दीदार । सुजान साह की सोहोबत, किया सूरत सिंह खबरदार ॥१॥
सुनी चरचा आए के, बोहोत हुआ खुसाल । घरों जाए न्योता किया, खबर पोहोंचाई हाल ॥२॥
तुम मेरे घर पधारो, मैं सेवा करों तुम । बात उनकी सुन के, भया उसे हुकम ॥३॥
हम आवेंगे तुम्हारे, जाए रसोई करो तैयार । उनका भाव देख के, बातें करी मनुहार ॥४॥
रोज दूसरे उनने, बुलाए अपनें घर । बड़ी बैठक करके, पधराए बिछौनों पर ॥५॥
सब साथ आए पोहोंचे, बैठाई चौकी पर । आप धोती पेहेन के, रहया प्रीसने पर ॥६॥
जुगतें बैठाए श्री राज को, भली बैठक ऊपर । साथ बैठा दोए पगथिए, करें सेवा दिल धर ॥७॥
पातर लगे प्रीसने, आप ऊपर ढोले बाए । जुगते अंन जो प्रीसही, सब सामा पोहोंचाए ॥८॥
ऊपरा ऊपर प्रीसही, मेवा मिठाई पकवान । कई जुगते अथानें, थी ऊपर की पहिचान ॥९॥
श्री राज आरोगे साथ सब, हुए है त्रिपत । ऊपर बीड़ी तम्बोल की, ले आगे धरी इत ॥१०॥
ले गए अटारी पर, श्री राज को एक ठौर । तहां बैठ बिनती करी, हाव-भाव अत जोर ॥११॥
मैं तुम्हारा दास हूं, मुझ पर करी मेहेनत । मैं उदास हुआ इतसें, ए होए मुझसे जेर इत ॥१२॥
हुकम हुआ तिनसे, तेरा कारज होए सिध । एह बात अंकूर की, आवे न जाग्रत बुध ॥१३॥
जेता था उनका हिस्सा, तेता लिया उन सुख । बिदा होए चला दरबार को, तब पड़ा कसाला दुख ॥१४॥
और किसोरी कुंवर नें, एह बात सुनी कान । तब ऊपर की पहिचान से, ले आया ईमान ॥१५॥
अन्दर उनके महल में, केतेक ल्याई ईमान । पर बंध दज्जाल के, सो कर न सके पहिचान ॥१६॥
किसोर सिंह ने अपना, न्योता पठवाए दिया । पधरावें हम राज को, चित्त को चौकस किया ॥१७॥
उठ आया दीदार को, चरचा सुनी कान । दिल में बोहोत राजी भया, ज्यादा भया ईमान ॥१८॥
कोइक दिन पीछे, पधराऐ श्री राज । साथी सब संग चले, कहे धन धन दिन है आज ॥१९॥
रसोई बनाई जुगत सों, बैठाए श्री राज । साथी गिरद घेर के, बैठे इनके काज ॥२०॥
मेवा मिठाई पकवान, श्री राज आगे थाल धरी । साथ सबों को प्रीस के, सेवा भली करी ॥२१॥
भाव दिखाया भली भांत सों, हुआ सेवा को सनमुख । अंकूर माफक अपने, इन भी लिया सुख ॥२२॥
एक दासी उनकी आवती, फेर वह ल्याई ईमान । देख दीदार हक का, कछुक भई पहिचान ॥२३॥
नित आवे दीदार को, कछुक सामा ल्याए । मुजरा कर पीछे फिरे, ताको दई पहुंचाए ॥२४॥
आसाराम आइया, था कबीर पंथ में । चरचा को आवे नित, सुनता ईमान से ॥२५॥
एक उच्छव इन किया, दिल में होए खुसाल । मैं तुमारे कदमों रहो, मुझे बकसो ए हाल ॥२६॥
इन समें दज्जाल, जोरा लगा करनें । आजूज माजूज उतरे, साथी लगे खेंचनें ॥२७॥
राम नगर में हुआ, साथियों का चलना । सुनियों नाम तिनके, जिन सोंप्या अपना ॥२८॥
ईस्वरदास उदयपुर का, ले चला कबीला संग । इन सौंपी आतम अपनी, पहुंचा संग कर जंग ॥२९॥
तूंगा बेटा उनका, था लड़का छोटा । भोम लिया अपना, आए धनी की ओटा ॥३०॥
और धनियानी रूकमा, रही कोईक दिन । पीछे अपने अंकूर पे, जाए मिली गोवरधन ॥३१॥
और कानजी रामी चलिया, आया सूरत सें । उन सौंपी आतम अपनी, रहया छबीला बेटा इनमें ॥३२॥
सामल दास चलिया, जाको चिन्तामन नाम । था ठठे के साथ में, पोहोंचा अपने धाम ॥३३॥
निरमल दास चलिया, था महाजरों मिनें । आया सूरत वतन से, सो पोहोंचा ठौर अपने ॥३४॥
दामोदर पाटन से, सौंपी अपनी आतम । रहया अंकूर माफक सोहोबत, याको कछु न भई कुंम ॥३५॥
संग रहया कोइक दिन, ए जो फकीर मासूम । सो चला इतहीं, ठौर पहुंचा इन कदम ॥३६॥
मलूक चन्द चलिया, था राजपूत राठौर । इन लड़ाई करी दज्जाल सों, हक बिना न रखे और ॥३७॥
जोरू जो गुलजीय की, हमों उसका नाम । ओ भी चली उन समें, छोड़ कार वेहेवार का काम ॥३८॥
मथुरी बुढ़ानपुर की, चली छोड़ कुटुम्ब परिवार । रही अंकूर माफक सोहोबत, पहुंची परवरदिगार ॥३९॥
गरीब फकीर बुढ़ानपुर से, चला बेटा उनका । उन हिस्सा लिया अपना, जो सुख अंकूर में था ॥४०॥
लाड़ कुंवर दिल्ली की, थी जोरू बनारसी । रही हुकम माफक, जाए अपने सुख रची ॥४१॥
मानबाई माता नन्द राम की, थी राज की सेवा में । सुख लिया ताले माफक, नन्दराम की सोहोबत से ॥४२॥
स्याम बाई बेटी लालबाई की, गढ़े में छोड़या आकार । सुख लिया अंकूर माफक, फेर चली इन करार ॥४३॥
गोमा खेमदास की, राह मिने चली । रही अंकूर माफक सोहोबत, जाए अपने ठौर मिली ॥४४॥
सदानन्द त्रिलोकदास, उदयपुर से आए रहे । सोहोबत सेवा मिने, ठौर अपने पोहोंचे ए ॥४५॥
इन भांत दज्जाल ने, साथी लिए छिनाए । एक को मजल पहुंचावें, तोलों दूजो रहने न पाए ॥४६॥
कोइक दिन ऐसा रहया, फेर दबा हुकम से । साथ सब दुदला भया, रहे विचार करने में ॥४७॥
इन समें सुलतान का, हुआ हुकम पुरदलखान । रहे राम नगर एक वेंरागी, तिनकी तुम करियो पहिचान ॥४८॥
ए कौन हैं कहां से आए, हैं इनका मतलब कौन । इन सुन हुकम खिदर को, भेजा ऊपर मोमिन ॥४९॥
आया अहदी होए के, करता बड़ा सोर । गढ़े से पुकारिया, किया राजा ऊपर जोर ॥५०॥
मैं आया फकीरों पर, पकड़ देओ मेरे हाथ । ना तो मुहिम तुम पर, ए चलें मेरे साथ ॥५१॥
हुकम पातसाह के, हम आए तुम पर । जो ढील करो इन बात में, तो होत गुनाह तुम पर ॥५२॥
ए बात राजा सुनके, भेज दिया कोतवाल । तुम कहो जाए स्वामी कृष्णदास सों, ऐसा हुआ हवाल ॥५३॥
एक चार दिन तुम इहाँ से, बैठो जाए जागा और । फेर के तुम आइयो, बैठियो अपनें ठौर ॥५४॥
पर पातसाही दबदबा, सहे न सकें हम । एक लाठी आवे उनकी, सो फेर न सकें हुकम ॥५५॥
ताको श्री जी साहिब जी ने, झुक के दिया जवाब । हम न डरें पातसाह से, आवे क्यों न सिताब ॥५६॥
हम तो राह देखत हैं, क्यों ए कर बोलावे हम । बैठे रहो घर अपने, जिन उपराला करो तुम ॥५७॥
तब कोतवाल जाए के, करी राजा सों अरज । बैरागी तो यों कहें, हम ना डरें इन गरज ॥५८॥
आवन देओ उनको, हम समझेंगे उनसे । तुम हमारे उपराले, ना रहियो मदत में ॥५९॥
तब राजा ने फेर पठवाया, तुम जाए कहो यों कर । हम तुम सों कहत हैं, अरज दूसरी बेर ॥६०॥
हम अपने धरम को, इसी वास्ते डरात । पकड़ ले आवें तुमको, तो सरम हमारी जात ॥६१॥
तुम दस बीस कोस, छिप के बैठो जाए । फेर के इत आइयो, हम लेवेंगे बोलाए ॥६२॥
फेर के कोतवाल नें, आए करी अरज । राजा यों कहत हैं, अपने स्वारथ गरज ॥६३॥
तब जवाब दिया श्री जी ऐं, तुम कछू न करो फिकर । हम समझ लेएंगे इनको, आवने देओ हमारी नजर ॥६४॥
कछू न चले इनका, जोरा हम ऊपर । देखत ही गल जायेंगे, बानी सुन पटन्तर ॥६५॥
जिन तुम अपने दिल में, ल्याओ दग दगा कोए । ए आसान होएगा, आज्ञा से जेर होए ॥६६॥
फेर गया कोतवाल राजा पे, सब कही बीतक । राजा सुन अचरज भया, इन्हें कछू न आवे सक ॥६७॥
जाए सुवंसराए तुम कहो, क्यों डरत नहीं तुम । पातसाही लोकन से, पीछे क्या करेंगे हम ॥६८॥
जब तुम को पकड़ के, ले जाएं हजूर सुलतान । तब हमारे दिल में, होए बदनामी सुने कान ॥६९॥
सुवंसराए सुन आइया, कही श्री जी साहिब जी से बात । राजा को कहलाई थी, ताकी करी विख्यात ॥७०॥
तब श्री जी साहिब जी ऐं कहया, जिन डरो मन में । अपना बल दिखाइया, कर चरचा उन से ॥७१॥
उन जाए कही राजा सों, काहे को कहो तुम । बिना मार अपनी, सब डर बताया हम ॥७२॥
जहां लग अपना कहना, सो कह के चुके सब । अब इनके दिल में जो आवे, सो करेंगे तब ॥७३॥
यों करते दिन दूसरे, शेख खिदर पहुंचे धाए । मुलाकात राजा सों करी, पहिले एही बताए ॥७४॥
हम आए तिन काम को, पकड़ देओ बेंरागी तुम । हजूर में ले जाएंगे, हमको है हुकम ॥७५॥
जो तुम इनकी रक्षा करो, तो है मुहिम तुम पर । केतो इनें पकड़ देओ, नातो बाँधो कमर ॥७६॥
तब राजा बोलिया, हम सों न कछू काम । तुम जाए पकड़ो उनको, ले जाओ अपने ठाम ॥७७॥
जो तुम आए हम पर, ले सुलतान हुकम । सो हम चढ़ाया सिर पर, ले जाओ बेंरागी तुम ॥७८॥
उहाँ से फेर उठके, आए उतरे हवेली में । भिखारी दास दीवान, बात करी उन सें ॥७९॥
अब हमें क्या करना, क्यों कर पकड़े हम । तब भिखारी दासें कहया, पहले हमें पठाओ तुम ॥८०॥
खबर ले उनकी, क्या है उनकी बात । वाकिफ उनके होए के, पकड़ लेएंगे जात ॥८१॥
भिखारीदास बिदा होए के, आए हादी कदम । कदमों लाग सेजदा किया, हम आए ऊपर तुम ॥८२॥
क्या तुमारी खबर है, आया पातसाही फुरमान । हम आए तुमें पकड़ने, ले जाएं पास सुलतान ॥८३॥
तब हादी ने कहया, हमको तो एही चाह । जो हमको ए याद करें, कोई हमको उत पहुंचाए ॥८४॥
तुम लेओ हमारी खबर, वाकिफ होवो हकीकत । सुनावें चरचा तुमको, सब समझो तुम इत ॥८५॥
कही हकीकत उनको, बात मूल की सब । सवाल भागवत कुरान के, मिलाए दिखाए तब ॥८६॥
जवाब करो तुम इनका, जो तुमे समझी जाए । यातो सुनो हम पे, सब देवें बताए ॥८७॥
तब भिखारी दासें कहया, हमें समझाओ तुम । हम तो ल्याए ईमान, तुमारे कदम न छोड़ें हम ॥८८॥
तीन रात और तीन दिन, कहया तारतम समझाए । सवाल कुरान भागवत के, सब ठौर दिए बताए ॥८९॥
विरोध सारा भान के, बताया एक दीन । मारा सक सैतान को, तबही ल्याया आकीन ॥९०॥
गया सेख खिदर पे, कही हकीकत सब । मैं देख्या हादी जमाने का, सेंख खिदरें पूछया तब ॥९१॥
ए कैसी बात तुम कही, तुमें क्यों कर भई पहिचान । सो मेरे आगे कहो, हादी आवने के निसान ॥९२॥
तब सवाल कहे कुरान के, और भागवत के प्रस्न । इनको खोल के, कर दिया दिल रोसन ॥९३॥
या सातों निसान क्यामत के, करी तिनकी चरचा जोर । एक दाभतूल अरज, और दिखाया दज्जाल का सोर ॥९४॥
और आजूज माजूज, आए ईसा हजरत । असराफीलें सूर फूंकिया, सब बताए दिए इत ॥९५॥
सूरज ऊगा मगरब, जाहिर हुए इमाम । ऐसे माएने खोल के, बताए दिए तमाम ॥९६॥
हुआ एक दीन सबमें, भानी सारी सक । राह सरातल मुस्तकीम, दिखाई मारफत हक ॥९७॥
हकीकत मारफत के, खोल दिये सब द्वार । तब सेख की सुध गई, करने लगा विचार ॥९८॥
सैयद अब्दुल रेहेमान, और रघुनाथ था संग । तिन साहिदी सब दई, भागा दज्जाल का जंग ॥९९॥
तुम चलो उतहीं, करावें दीदार । जो देखो हकीकत उनकी, तो पाओ परवरदिगार ॥१००॥
सेख वैसे ही उठिया, असवारी करी तैयार । आगे तें खबर करी, हम आवत करन दीदार ॥१०१॥
सेख आए के पहुंचिया, ले भीर अपनी । देख दीदार कदमों लगा, पाए अपनी वतनी ॥१०२॥
होने लगी चरचा, कयामत का मजकूर । सनंधे सुनी तिनने, सब देखा हक जहूर ॥१०३॥
इन समें दज्जाल नें, किया बड़ा सोर । रहत मुसलमान बेदड़े, तिनों किया अति जोर ॥१०४॥
उनों जान्या सेख पुकारता, आया पकड़ने को । तो हम जावें मदत, होवे काम दीन के मों ॥१०५॥
उहां कुरान तपसीर धरी थी, करने लगा जिद्द । ए हिन्दुओं को रवा नहीं, तुम क्यों चरचा करो महम्मद ॥१०६॥
तब सेख को गुस्सा चढ़ा, इन्हें उठाए देओ मुडदक । देओ धक्के इनको, करने लगा हरकत हक ॥१०७॥
सबों ने दई लानत, उठाया मजलस सें । स्याह मोंह ले उठिया, बैठा दज्जाल इन में ॥१०८॥
सेख सब साथ सों, ले आया ईमान । फेर आया डेरे को, करके पूरी पहिचान ॥१०९॥
दिन दूसरे गया, राजा की सोहोबत । हैफ हे राजा तुझको, ऐसा पहलवान रहे इत ॥११०॥
तूं तिनके दीदार को, गया नाहीं कब । तो मैं तुझको क्या कहों, तुझे पहिचान ना भई लों अब ॥१११॥
तब राजा बोलिया, अबहीं तुम करते पुकार । भली भई तुमहीं फिरे, तुमहीं करने लगे करार ॥११२॥
तब सेख बोलिया, हमें ना कछू खबर । हम भेजे आए उनके, इन काम ऊपर ॥११३॥
जब हम देखा हादीए को, ए तहकीक बरहक । हमको भई पहिचान, हमारी सारी भानी सक ॥११४॥
अब हम उनके गुलाम, जो हमको ए फुरमाए । सो सब हमें करना, दें पैगाम पहुंचाए ॥११५॥
तब लोगों ने कहया, राजा सों सुकन । है इनके पास भुरकी, सो हाथ रहे मोमिन ॥११६॥
जो कोई जात है, सिर पर डारत तिनके । सोई उनका होत है, तुम समझियो सोहोबत में ॥११७॥
राजा कहे मैं जाऊंगा, बैठों ना सोहोबत । दूर से दीदार करूंगा, वास्ते सेख खिदर के इत ॥११८॥
दिन दूसरे राजा ने, न्योता किया सबन । बाग में आप आए के, दीदार किया मोमिन ॥११९॥
हादी के सनमुख, खड़ा रहा ना बैठा जे । दिल में दहसत इनको, जिन अपने करें ए ॥१२०॥
ओ ऐसे ही पीछा फिरा, सुनी न चरचा कान । बिन अंकूरे क्या करे, कर ना सका पहिचान ॥१२१॥
फेर सेख खिदरें मांगिया, हमको करो हुकम । तैसा हम हजूर में, लिखा करें बाब तुम ॥१२२॥
तब कहया हादी नें, तुमको क्या कहें हम । जैसा तुमारी अकलें, देखा होए हमें तुम ॥१२३॥
तैसा तुम लिखा करो, पहुंचाओ पुरदल खान । वह भेजे सुलतान को, होए अंकूर पहिचान ॥१२४॥
केतेक दिन सेख रहया, लिख भेजी पहिचान । केतेक लोग सेख के रह गए, जिनको जोर ईमान ॥१२५॥
भिखारी दास सेख पहुंचाए के, फेर आए कदमों । कबीला अपना ल्याइया, सब सोंप्या हादी को ॥१२६॥
फेर अहदी गुलाम महम्मद, दौड़ा धमोनी से । तिनने सुनी बातें, वास्ते लोभ के ॥१२७॥
था खेस पुरदल खान का, पुकार किया उत सें । राजा से जाए कहो, वेंरागी पकड़ देओ हमें ॥१२८॥
तब राजा डरिया, इन पर दबदबा पातसाही । इन्हें हम अपने गांव क्यों रखें, बदी बदकारों बताई ॥१२९॥
तब राजा ने भेजे, गुमास्ते अपनें । तुम जाओ हमारे देस से, हम न सह सकें खरखसे ॥१३०॥
देखी नजर राजा की, दहसत भरी कहर । तब उहाँ से उठ चले, जिमी देखी जहर ॥१३१॥
सम्वत् सत्रह सै उन्तालीसे, मास अगहन सुदी दस में । चले रामनगर से, फेर आए चौदस गढ़े में ॥१३२॥
तब उतरे जाऐ बाग में, अहदी पहुंचा धाए । सो तो गया रामनगर, पाँच अपने पहुंचाए ॥१३३॥
तिनने रोके बाग में, तब आए पहुंचे देवकरन । तिनसे बातें होने लगी, लड़े चार पहर मोमिन ॥१३४॥
सनंधे हादी ने कही, सुनते ही हुए जेर । दिन उगते पहिले भगे, बड़ी हुई हमें खेर ॥१३५॥
एतो बली खुदाए का, हमसे बेअदबी कछु होए । तो होता बुरा हमारा, हम ठौर न पावें सोए ॥१३६॥
हादी वहां से चल के, गढ़े पहुंचे धाए । वहां भगवन्त राए का, बेटा हाकिम ताए ॥१३७॥
उनने दिल में यों लिया, लूट लेऊं वेंरागिन । एही हराम खोरी के, लोकों आगे कहे सुकन ॥१३८॥
ए सुनी गंगाराम बाजपेई, उहां था आसन । आया बार दोए दीदार को, जान सनमन्ध आपन ॥१३९॥
तिन जाए बरज्या उनको, क्यों एह करने लगा काम । वेरागियों को लूटते, होएगा बदनाम ॥१४०॥
और ए ऐसे नहीं जो कोई लूट ले, मरे मारेंगे तुम । काहे को भूल के सुकन, मुंह से काढ़ दिखाओ हम ॥१४१॥
लागी लानत गढ़े को, उस दिन से हुआ खुवार । सो रोज कयामत लों, ठौर न आवे लगार ॥१४२॥
महामत कहे ऐ साथ जी, ए गढ़े की बीतक । कछुक पीछे रही है, सो कहों हुकम हक ॥१४३॥
(प्रकरण ५८, चौपाई ३३००)
