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श्री बीतक - प्रकरण ५९

गढ़े की मजल में, आया याद रामनगर । तिनकी मजल कहत हों, सुनियो साथ खबर ॥१॥

सूरत सिंह ईमान ल्याइया, देख के दीदार । सक मन में ना रही, देखा धनी निरधार ॥२॥

सुनिया तारतम इनने, देखी हक सूरत । ए बात मैं किनसों कहों, कौन ल्यावे प्रतीत इत ॥३॥

गया दीवान देवकरन पे, एक सुनी मैं बात । तुमारे आगे कहत हों, मैं देखी हक जात ॥४॥

चलो मेरे साथ तुम, मैं कराऊं दीदार । केतकी पर रहत हैं, देखो धनी निरधार ॥५॥

ल्याए दीवान देवकरन को, देख के लगे कदम । सक कछू ना ल्याइया, सिर पर चढ़ाया हुकम ॥६॥

थोड़ी चरचा सुन के, दिल की भागी सक । मैं महाराज सों कहों, ओ ईमान ल्यावें बेसक ॥७॥

अब सेवा के साथी कहों, जो रामनगर में । मोदी खाने की सेवा दई, सो हुई पतिराम से ॥८॥

केसवदास और जेनती, हुए सामिल पतिराम के । और जेनती पानी पिलावत, साथ की सेवा करी ऐ ॥९॥

हाट से सौदा ल्यावत, इन समें गोकुलदास । कुल अखत्यार खान सामा को, था गरीबदास खास ॥१०॥

रसोई में खेमदास, और गंगाराम । और सन्त दास गोवरधन, पीछे सूरजमलें किया काम ॥११॥

इन सबों पर दरोगा, रहता वृन्दावन । लकड़ी जंगल की टहल, रहें बराड़ी साथ सबन ॥१२॥

गावनें में रहत हैं, ए जो निर्मल दास । तिन सेती सामिल रहे, भाई मुकुन्द दास खास ॥१३॥

श्री बाई जी गावनें में रहें, संग गोदावरी । बुआबाई हमो गावें, सनंधां जो उतरी ॥१४॥

और चौकी दो जिनस की, ए गावें बारे अपनें । निरमल दास नित्याने, रिझावें राज सब में ॥१५॥

और आरती में रहत हैं, लाल मुकुन्द दास । उत्तम दास पखावज में, सब सिरे निरमल दास ॥१६॥

और बनमालीदास सामिल, रहें आरती में तैयार । सेवा अपनी मिनें, नए नए करें विचार ॥१७॥

खिमाईदास ताल बजावत, कनड़ गावने में । कल्याण कला जमावत, ए सेवे आरती समें ॥१८॥

और साथ सब ठाढ़ा रहे, छबीलदास बजावें संख । आरती संझा समें होत है, करे मगन होए निसंक ॥१९॥

अग्यारह उच्छव कौसल्या के, पधराए घरों राज । सेवा करी भली भांत सों, पूरे मनोरथ काज ॥२०॥

दोए उच्छव तिवारी उदई, घरों पधराए अपने । एक भतीजा घासी, जान गुरु वेरागी पने ॥२१॥

रामजनी भगवती, तिनकी महतारी ने । उच्छव कर पधराए, जान पने अपने ॥२२॥

मकरन्द ने उच्छव किया, तन मन धन सोंपे । कदमों लाग ठाढ़ा रहे, कछू रख्या ना पीछे ॥२३॥

अमरा दत्ता दगड़ा, आए बराड़ से । किया उच्छव उमंग सों, सनमुख हुए साथ में ॥२४॥

देवी काका जयन्ति, इन किया उच्छव ए । श्री राज पधराए इन घरों, संग लिए सेवे ॥२५॥

हीरामन बढ़ई नें, करी उच्छव रसोई । श्री राज साथ को बुलाए, सेवा इनसे भली भई ॥२६॥

सातमी मजल आए गढ़े, एक मास तेरह दिन । हुकम हुआ श्री राज का, जाओ सुलतान पे मोमिन ॥२७॥

गढ़ें में आए मिली, बाई धरमा डोकरी । ईमान ल्‍याई सुनते, कछू सक ना इन करी ॥२८॥

अनन्त राम आइया, और आया घनस्याम । हरबाई संग इनके, और सदानन्द इस ठाम ॥२९॥

गंगाराम उज्जैन का, और वासू केसर । उदैती खिमोती दयाली, मोहन धनबाई इन पर ॥३०॥

फकीरा बेनी बेहेन थी, करमेती परवान । मानिक और पूर बहू, और लखमी आई जान ॥३१॥

और गोवरधन, और भट्ट मुकुन्द जी । देवीदास हरखो गढ़ा में, आए रूह कदमों दी ॥३२॥

बिन्दा बिहारी सन्त दास, वैस्य दुरजन सिंह जे । खांडेराए रूप सिंह, कीरत सिंह कदमों पहुंचे ॥३३॥

दरसा धरमोल रतन, और कुसल सिंह मधुकर । मयाराम वैद्य उहां का, लालसाह भदोरिया योंकर ॥३४॥

इन समें लालदास को, हुआ हजूर का हुकम । जाए कहो सुलतान को, ल्याए फेर पैगाम ऊपर तुम ॥३५॥

पूस सुद पांच को, बीरजू दई खबर । राम नगर राजा नें, अस्तल खोदयो भली तर ॥३६॥

सुन कान दुःख पाइया, हुआ गढ़ा खराब । ज्यों खोदो अस्तल को, ताको रहे न पकड़ो ताब ॥३७॥

जब देवकरन विदा भए, जब पूछी श्री राज नें बात । तुम अपना ठौर छोड़ के, और मुलक क्यों जात ॥३८॥

तब दीवानें ए कही, एक बात पर आए रिसाए । तबसे इहां रह गए, उहां जाने न पाए ॥३९॥

तब श्री राज नें कहया, तुम आए इन काज । एह वस्त लेए के, पहुंचावने महाराज ॥४०॥

हम सब राजा देखे, पै काहू न देखा अंकूर । सकुण्डल इन्हें परखी, तो इनसों होसी मजकूर ॥४१॥

जब लाल को हुकम हुआ, तब जाए देख्या कुरान । सोलह सिपारे मिनें, मूसे हारून का बयान ॥४२॥

तहां लिखा मूसे ने, खुदायसों करी अरज । मैं क्यों कर लड़ों फेरून सों, जोलों मेरी न करो गरज ॥४३॥

मैं फकीर ओ पातसाह, मैं पहुंच न सकों तिन । जो मेरा भाई देओ मुझको, तो लड़ों साथ मोमिन ॥४४॥

तब खुदाए ने दिया, मूसे को भाई हारून । अब फेरून का ना चले, कर ना सके खून ॥४५॥

एह आएत राज को, देखाई लालदास । आपन को एक राजा मिले, सो चाहिए मोमिन खास ॥४६॥

एह विचार करते, लाल रहया लसकर सें । चरन दास गरीबदास, पहुंचाए लसकर में ॥४७॥

धरमा मिली लाल को, राह में जाते । तुम्हारी बात देव जी ने, करी छत्रसाल आगे ॥४८॥

एह बात सुन लाल नें, आए आगे करी श्री राज के । बात अपनी होने लगी, छत्रसाल आगे ॥४९॥

तब देवजी पास पठाए, सन्त दास धरम दास । पाती लिख पहुंचाई, कहियो संदेसो खास ॥५०॥

फेर अगरिए से भेजे, लाल उत्तम जीवन । और गोविन्द दास को, भेजे ऊपर मोमिन ॥५१॥

बूढ़ी बूढ़ा मों आई, कमलावती रतन । राघव दास रेवादास, ए चारों मिल मोमिन ॥५२॥

लखीराम ने परने, लिखाया नाम अपना । मैं तुम्हारे साथ आऊं, मैं जहान जाना सुपना ॥५३॥

रामदास नें उच्छव किया, मिने रहमतर । तिनें कहया मैं हों तुम्हारा, जग सुपना दिया कर ॥५४॥

संतावरी दीपा मिली, गोकुल दास की माँ । अग्यारह दिन बिलहरी रहे, सब चले होए जमां ॥५५॥

महामत कहे ए मोमिनों, ए गढ़ा की बीतक । आगे कहो परना की, जो है हुकम हक ॥५६॥

(प्रकरण ५९, चौपाई ३३५६)

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