श्री बीतक - प्रकरण ६
दरसन
अब कहों श्री देवचन्द्र जी की, जो बात मूल बुजरक । जो मेहर सैंयन पर, करी सुभानुल हक ॥१॥
चौदह वर्ष नेष्टाबन्ध, सुनयो श्री भागवत जब । आवेस लीला भई, सब नजरों आया तब ॥२॥
कछू कसनी भई आकार को, इन समें इस ठौर । पर नजरों कछु न आइया, दज्जाल लड़ने लगा जोर ॥३॥
इहां ज्वर आवने लगा, एक लंघन भई दोय । श्रवना भंग न करें, कान बांध के सुनने जायें सोय ॥४॥
तीन चार पांच भई, ज्वर न छूटे जब । ए तो जाय सुनने, ए सेवा न छूटे तब ॥५॥
यों करते दस बारह लों, लांघन भई जोर । ए भागवत सुनन का, कछु न छूटे ठौर ॥६॥
मत्तू मेहता तबीब को, बुलाय दिखाया हाथ । तब तबीब औषध दिया, जतन करो इन साथ ॥७॥
वाउ लगने ना देवो, जतन करो इन पर । तब कुंअर बाई ने कहा, ए अबहीं जाये भागवत पर ॥८॥
तब वैद औषद को, इनसे लई फेर । इन वाउ से सनपात होय, मैं न आऊं दूजी बेर ॥९॥
तब मत्तू मेहता ने कहया, करेंगे हम जतन । हम क्यों जाने देवेंगे, रखना है याको तन ॥१०॥
तब श्री देवचन्द्र जी ने कहया, मैं न रहों क्योंए कर । धर्म राखे ते देह है, जवाब देत यों कर ॥११॥
वे जवाब यों देवहीं, देह राखे होय धरम । इनकी मत माया मिने, आधीन रहे करम ॥१२॥
वैद तो तब उठ गया, काढ़ा पिलाया जब । बखत हुआ सुनन का, कान मूंद लाठी ले चले तब ॥१३॥
मत्तू मेहता कुंवर बाई, बहुतक रहे बरज । ए कैसेहु माने नही, आतम साधन गरज ॥१४॥
तब घर में रूध किवाड़ दे, द्वार खड़ा मत्तू मेहता आप । श्री देवचन्द्र जी पुकारहीं, बड़ो दुख पायो ताप ॥१५॥
रे मूरखो मैं मरने का नही, मेरा देखोगे आकार । उत मेरी आतम जायगी, और नहीं विचार ॥१६॥
ए क्योंए माने नही, तब गिरे पीछले पाय । खम्मा खम्मा माता कहे, गिरि भोम भमरी खाय ॥१७॥
तब कुंवरबाई ने सोर करयो, कठिन कह खुलाए द्वार । आकार आंखें फिर गईं, कछु न आवे विचार ॥१८॥
अहो श्री देवचन्द्र जी, यों पुकार सुनावें कान । ए कछु न सुनत, ना सके काहू पहिचान ॥१९॥
तुम जाओ सुनने श्री भागवत, भट्ट के बुलौआ आय । तुम को कोई न रोकहीं, चलो पहुंचावें धाय ॥२०॥
एक आध घड़ी पीछे, कछुक भये सावचेत । तब उठ बैठे भये, मुख होय गया सुपेत ॥२१॥
जाय श्रवण करो श्री भागवत, कोई न बरजे तुम । लाठी पकड़ ठाढ़े भये, कहो तो पहुंचावे हम ॥२२॥
श्री देवचन्द्र जी बोले नही, चले स्याम जी मंदिर द्वार । आय बैठे सभा मिने, सुनत श्रवन उस्तवार ॥२३॥
जब भागवत सुन के, फेर के आये घर । तबहीं चैन जो पाइया, ठाढ़ा न रहया ज्वर ॥२४॥
फेर इहाँ से पथ लिया, होय चली फुरसद । दिन दिन चढ़ते गये, यही कसनी की हद ॥२५॥
दिन दस पन्द्रह हुए, कथा सुनत है कान । तहां आय दीदार दिया, तुमको मेरी पहचान ॥२६॥
वय किसोर अति सुन्दर, सरूप खेला जो वृन्दावन । देख श्री देवचन्द्र जी ने कहया, जैसी गवाही दई मन ॥२७॥
तुम हमारे खावन्द, एता जानत हैं हम । आप को पहिचानत हो, कौन कहां से आये तुम ॥२८॥
इतना हम जानत हैं, जो धनी हमारे तुम । कहया तुम एता ही जानत, अब बतावें हम ॥२९॥
नाम तुम्हारा बाई सुन्दर, खेले तुम ब्रज रास में । मनोरथ पूरे ना भये, ए तीसरा हुआ तिन से ॥३०॥
अब सब साथ बुलाय के, आओ अपने धाम । धनी वे साथ कहां है, कहया मैं भेजों तमाम ॥३१॥
ए भागवत कागद तुम्हारा, सो तुम्हें खुले कलाम । और कोई ना खोल सके, ए जो खलक आम ॥३२॥
अब तुमहें पूछना होय, सो पूछ लेओ तुम । फेर के ऐसी तरह से, द्रष्ट न आवें हम ॥३३॥
तब पूछा श्री देवचन्द्र जी ने, धनी कहां जाओगे तुम । तुम्हारे अंदर आकार में, आये के बैठें हम ॥३४॥
तब मोको कहा पूछना, ए कहे तारतम बीज वचन । फेर के अदृष्ट भए, प्रफुल्लित हुआ मन ॥३५॥
तब ही नजर सत वस्त को, जाय के पहुंची धाम । ब्रज रास दोऊ अखण्ड, सुरत पहुंची तिस ठाम ॥३६॥
श्री भागवत सास्त्र की, सब खुल गई नजर । विवेक सारी वस्त को, हो गई आतम फजर ॥३७॥
उठके आये आसन, अपने गृह विश्राम । एह बात मैं किनको कहों, कौन माने इस ठाम ॥३८॥
एक ठौर कथा मिने, भाई गांगजी देत श्रवण । जब कथा से उठते, तिन आगे कहे वचन ॥३९॥
राह मिने खड़े रहे, चरचा ठाढ़े करे दोय । पानी भरने जाये पनिहारी, फेर आए खड़े देखे सोय ॥४०॥
फेर दूसरी बेर जाये भरने, ए त्यों ही ठाढ़े कहे बचन । तब वे आपस में बातें करे, याके पांउ न थाके मन ॥४१॥
ए चरचा के रस में, देह की न रखे खबर । तब से पनिहारी तीसरे, कहे वचन यों कर ॥४२॥
ए भाई तुम बैठ के, क्यों न बातें करो बनाये । कब के तुम ठाढ़े हो, हम तीन बेर फेर फेर आये ॥४३॥
तब जाय सरीर की, सुध आवे याद । विचार कहे से दोऊ, याद करे बुनियाद ॥४४॥
यों नित करते रहे, गांग जी भाई ने देखे बचन । एह बात अगाध है, है कछु अलौकिक रोसन ॥४५॥
तब गांग जी भाई ने पूछिया, हम तुम भागवत सुनते दोय । एह प्रस्न तुम कहां से ल्यावत, तुम मोहे बताओ सोय ॥४६॥
गांग जी भाई को जब देखिया, वस्त का पूरा पात्र । तब कछु चले बतावते, सतबोय रज मात्र ॥४७॥
तिन खसबोय से भए, जोर जिज्ञासु जब । तब कछु आगे चले, बीतक बताई तब ॥४८॥
फेर जनम से लेय के, आये नये नगर । तहाँ लो सारी बीतक, कह चले ता ऊपर ॥४९॥
फेर नये नगर में, ज्यों कर भया दीदार । सो सारी बताय दई, जो मेहर परवर दिगार ॥५०॥
तब बहुत राजी भए, आवें चर्चा को घर । तहां मण्डान होने लगा, बात पसर चली योंकर ॥५१॥
एक से सुनी दूसरे, तहां से मिला साथ । सोई आवे दीदार को, जाके धनिए पकड़े हाथ ॥५२॥
महामति कहे ए साथ जी, ए अपनी बुनियाद । अब तुम्हें आगे कहों, ताको करो याद ॥५३॥
(प्रकरण ६, चौपाई ३४१)
