श्री बीतक - प्रकरण ६०
श्री जी व महाराजा जी की भेंट
पहिले सूरत सिंह सुनी, बीच राम नगर । देवजी को दिखाइया, तो कहया पैगम्बर ॥१॥
आए राज रामनगर, तहां बिराजे बरस दोए । मिले दीवान देवकरन, ईमान ल्याए सोए ॥२॥
उमंग अंग में आइया, कहों जाए छत्रसाल । एह हकीकत सुनके, होवेगा खुसाल ॥३॥
इन वास्ते रामनगर से, चल के मऊ आए । खबर करी महाराज को, दिया पैगाम पोहोंचाए ॥४॥
नौरंग अकस राखत है, है लड़ाई इसलाम । दावत सब ठौरों करी, बुलाओ अपने ठाम ॥५॥
अंकूर असल का, सुनत ही करे चेतन । बलदीवान के आगे, बात करी देवकरन ॥६॥
दिल में विचारते, लालदास पहुंचे । आए उत्तम दास आनन्द सों, बानी राज की गावते ॥७॥
सुने स्लोक महाराज नें, भागवत के कहे लालदास । तब श्री जी साहिब के चरन की, दिल में लई आस ॥८॥
श्री जी साहिब जी को बुलावने, जाओ देवजी तुम । लाल उत्तम को ले जाओ, सामे आए बुलावन हम ॥९॥
तहां से विदा होए के, आए अगरिए पहुंचे । रिझाए मिलते राज को, सेवा करी समेत कबीले ॥१०॥
चले अगरिए से, परने पहुंचे आए । डेरा किया अमराई में, ठौर झंडे की चित्त ल्याए ॥११॥
नदी किलकिला तीर पे, उतरे परमहंस आए । तिन में सिरदार अक्षरातीत, देख अपना ठौर सुख पाए ॥१२॥
डेरा करत परना के, दौड़े देखत गोंड़ लोक और । साध वेरागी कोऊ आए उतरे, देखें हम जाए वा ठौर ॥१३॥
सब ने आए दरसन करे, कही सुनो सब साध । या नदी को जल न पीजियो, याके पिए जाए प्राण व्याध ॥१४॥
तब सब साथ ने मिल के, धोयो चरण अंगूठा राज । डारयो चरणामृत नदी में, पीछे नहायो सकल समाज ॥१५॥
भेजी खबर महाराज को, आप पोहोंचे आए इत । कह भेजी महाराज नें, मोहे बने न आवत तित ॥१६॥
साथ सरूप दे को छोड़ के, आप छड़े पधारें इत । तो कारज सब सिध होवहीं, हम पावें सुख नित ॥१७॥
तब चले आप परने से, मऊ पहुंचे जाए । श्री बाई जी साथ सरूप दे, छोड़ चले सब आहें ॥१८॥
मऊ में तिदुंनी दरवाजे, डेरा किया वाहिं । राजा भेख बदल के, दरसन कियो ताहिं ॥१९॥
फेर दूजी बेर भेख बदल के, कर सिकार को साज । साथ सबों के बीच में, बैठे थे श्री राज ॥२०॥
तहां जाए ठाड़े भए, तरह मूढ़ की ल्याए । कही बाबा जू राम राम, बाबा बैठो इत आए ॥२१॥
आए बैठे बिछौने पर, बहुत किनारे दूर । कही बाबा और आगे आओ, बैठो इत हजूर ॥२२॥
तहां से उठ आगे गए, तो भी बुलाए आगे । कही अब तो परे तुम फंद में, अब कहाँ जाओ भागे ॥२३॥
तब कही महाराज नें, नहीं ऐसो ब्रह्मांड में कोए । जो हम पर फन्दा डारहीं, ए काम बुध जी से होए ॥२४॥
उनके हम चाकर हैं, बारह बरस से । तिनकी छाप के रूपैया, देखो तुम हम से ॥२५॥
एह हकीकत कह के, उठे उत थें महाराज । गए अपने महल में, कही भई बीतक जो आज ॥२६॥
अन्दर जाए के ए कही, जिन्हें करना होए दीदार । सो सबहीं कीजियो, आया परवरदिगार ॥२७॥
रानी देवकुंवर थी मऊ में, उन सुनी महाराज मुख एह । ब्राह्मणियों में भेस बदल के, दरसन कियो इने तेह ॥२८॥
फेर जाहिर होए के, आगे भीर चलाए । बलदिवान महाराज ने, भेंट करी बनाए ॥२९॥
वह बखत महाराज को, थी महूम अफगन । भई असवारी तैयार, आए लगे चरन ॥३०॥
श्री राज रूमाल लेए के, सिर पर धरा महाराज । हाथ धरा सिर ऊपर, होए पूरन मनोरथ काज ॥३१॥
इन समै लोग लसकर के कहें, जो हम ए पावें फते । तो एही हमारा हक हैं, लोक मांगे ए माजजे ॥३२॥
जब उससे फते करके, आए श्री महाराज । तब लोकों ने कहया, बिन श्री राज ना होए ए काज ॥३३॥
फेर श्री महाराजें देखिया, पट जो तारतम । अब बहेवार छुटत मुझसे, जाग खड़ी आतम ॥३४॥
मऊ सेती परना मिने, पहुंचे श्री जी साहिब । मंझली नें पहिचानिया, सेवा करी तब ॥३५॥
और सब अन्दर की, रहे पीछे तिन । जब महाराज आए पहुंचे, सबों बातां करी आगे इन ॥३६॥
गिरे दंडवत आए के, सनमुख साथ में पास । सीस धरयो दोऊ चरन पर, दीनो जगत निकास ॥३७॥
आए महाराज उत से, रसोई के बखत । अस्नान कर ठाढ़े हते, श्री जी साहिब जी तित ॥३८॥
कनातें ठाढ़ी करीं, बैठे श्री महाराज । थाल श्री बाई जी ल्याई, आगे धरी श्री राज ॥३९॥
चार जने महाराज संग, लिया इत प्रसाद । ईमान ल्याए अरस पर, ए सेवा करी आद ॥४०॥
कुली दज्जाल कांपिया, किया बड़ा सोर । ए निहचें मोकों मारेंगे, इन दोऊ से चले न मेरा जोर ॥४१॥
काहू काहू के दिल में, कलयुग आए बैठा । बदफैली दिल में करी, जो था सेना में जेठा ॥४२॥
डगावने महाराज को, बहुत करी दज्जाल । ना भए राज तरफ दलगीर, हमेसा रहे खुसहाल ॥४३॥
हिंमत परवत सिंह, और साह रूप । और नारायन दास, और सकत सिंह अनूप ॥४४॥
और ईमान ल्याइया, ए जो दुरग भान । जगत सिंह सुन दौड़िया, ए ल्याया ईमान ॥४५॥
सम्बत सत्रह सै चालीसे, पधारे परना में । सेवा श्री महाराजें करी, क्यों कहूं इन जुबां सें ॥४६॥
काहू करी ना करसी, ए जब को उपज्यो इण्ड । सब की सेवा सास्त्रों में, लिखी है जो ब्रह्माण्ड ॥४७॥
जैसे जिन पगले भरे, तैसा ही लिखा तिन । इन हिसाब कर देखियो, खास गिरोह मोमिन ॥४८॥
चौपड़े की हवेली मिने, तहां पधराए श्री राज । चले आप सुखपाल ले, कांध पर कुंवर महाराज ॥४९॥
सुखपाल धरी जाए द्वार में, अत उछरंग होए । चले आप भीतर को, दिन मान्यो सुफल जो सोए ॥५०॥
भीतर जाते द्वार में, रानी मझली ने आए । किया पांवड़ो साड़ी को, अत प्रेम दिल में ल्याए ॥५१॥
तब महाराजे ए कही, तू मेरे आगे क्यों होए । यों कहि उठाई साड़ी को, कियो पांवड़ों पाग को सोए ॥५२॥
पलंग बीच में जाएगा, रही कछुक पास । तहां बिछाई साड़ी को, बैठे सिंहासन खास ॥५३॥
अपनो आपा सब दियो, और दियो सब साज । आरती निछावर करके, कही धन धन दिन है आज ॥५४॥
एही टीका एही पांवड़ो, एही निछावर आए । श्री प्राणनाथ के चरन पर, छत्ता बलि बलि जाए ॥५५॥
श्री बाई जी को जोड़े राज के, बैठाए कर सनेह । कहनी में न आवहीं, लगो जुगल सों नेह ॥५६॥
साथ समस्त के बीच में, जुगल धनी बैठाए । कही तुम साक्षात अक्षरातीत हो, हम चीन्हा तुमें बनाए ॥५७॥
श्री ठकुरानी जी साथ संग ले, पधारे मेरे घर । धनी बिना तुम्हें और देखे, सो नही मिसल मातवर ॥५८॥
अब तो कछू ना हमारो, दे चुके हम सीस । आपा रहयो न आप बस, करो जानों सो बकसीस ॥५९॥
तब बोले श्री राज जी, देखे राणा पातसाह सब । पर जो कछू करनी अंकूर की, सो इत देखी हम सब ॥६०॥
आगे साध सन्तों ने, कहयो गुरु सिस्य को धरम । सोतो अब इहाँ भयो, उड़यो सबों को भरम ॥६१॥
पहिले दाता हम भए, गुरु को दीनों सीस । पीछे दाता गुरु भए, सब कछु कियो बकसीस ॥६२॥
साखी- बीतेगा उनतालीसा दगेगा चालीसा, तब कोई होसी मरद मरद का चेला । नानक गुरु दिखावे सांई, सच सच दी वेला ॥
बिजिया अभिनन्द बुध जी, ब्रह्म सृष्ट सिरताज । हाथ हुकम छत्रसाल के, दियो सो आपनो राज ॥६३॥
साखी कहके थाल ले, तिलक करयो श्री राज । भाल माहिं छत्रसाल के, कही आप बैठो महाराज ॥६४॥
बजी बधाई नृपत के, करी आरती प्रान । कही सब जन महाराज जू, करयो प्रणाम प्रमान ॥६५॥
सकुण्डल सोभा भई, प्रगट भई पहिचान । छत्रसाल छत्ता हुआ, छिपे सबे सुलतान ॥६६॥
छत्रसाल छत्ता हुआ, कहया सुन्दर बाई जोए । आप दिखावत आपनी, कही सकुण्डल सोए ॥६७॥
अरूगावने श्री राज को, मेवा मिठाई पकवान । आनन्द इन सुख को, कहयो न जाए परमान ॥६८॥
फेर और बेर बुलाए, भीतर लई सुखपाल । एक तरफ आप उठाए, एक तरफ ठकुरानी होए खुसाल ॥६९॥
पधराए अपने घरों, अत हेत कर प्यार । भूषन पेहेराए भली भांत सों, कियो बड़ो मनुहार ॥७०॥
चीन पेहेराई नवघरी, ले धरी आगे । हीरा मानिक चूनी, तले पहुंची लटके ॥७१॥
और दुगदुगी सांकर, तले हीरा मानिक । पहुंची जड़ाव हीरे की, रीझ पेहेनाई हक ॥७२॥
और भूषन कई भांत के, ले आगे धरे आए । और मंझली ने अपने भूषन, श्री बाई जी को पहिनाए ॥७३॥
और साथ ने इतहीं, सेवा करी बनाए । सो इन जुबां केती कहों, कहनी में न आए ॥७४॥
तन मन धन सों, कियो सब निछावर । हाथ जोड़ ठाढ़े भए, सिफत भई सब पर ॥७५॥
पहिचान पूरी करी, सेवे धनी कर धाम । साथ जो अन्दर रहे, तिन सेवा करी तमाम ॥७६॥
देखा देखी महाराज के, ल्याया जो ईमान । बस बसा छाती पर, करता था सैतान ॥७७॥
बात छिपाई कुरान की, आवते महाराज सो आप । सो पहिचान के वास्ते, इनको प्रकट करने प्रताप ॥७८॥
बैठे आप बंगले मिने, बांचे लाल किताब । आप करत है माएनें, भाई दो चार बैठे हिसाब ॥७९॥
बैठे सब एकान्त में, ऐसे में आए महाराज । दूर बैठ मन बिचारिया, यों क्यों बैठे हैं आज ॥८०॥
बुलाए के लालदास को, पूछी राजा ने एह । तुम कहा गुप्त बांचत हो, हमको कहिए तेह ॥८१॥
तब कहया उत लाल नें, हमको हुकम नाहिं । पूछें जाए हजूर में, तब कहें तुमें आहिं ॥८२॥
जाए लालें पूछी हजूर में, तब बुलाए हजूर महाराज । कही ए जो बात कुरान की, तुम सों छिपाई लों आज ॥८३॥
सो ए अब कहत हैं, इनमें बात अपनी है सब । महम्मद साहिब कुरान ल्याए, सो सब अपनो सबब ॥८४॥
यामें अपनी बीतक सब है, श्री देवचन्द्र जी को मेरे तेरो नाम । जा दिन जो बीती हम तीनों में, सो सब लिखी तमाम ॥८५॥
ए बात सुनत महाराज को, जोस जो बढ़यो जोर । ए वस्त प्रकट करके, करों खेल में सोर ॥८६॥
बात हमारे घर की, क्यों छिपावे हम । मुसलमान हमें कहा करें, ल्यावें तले तुमारे हुकम ॥८७॥
बांधी तरवार साह सों, सो तुमारे चाकर होए । हक हादी मोमिन बिना, और न देखे कोए ॥८८॥
और बात हमारी ए सुनो, जो ए बात सुन ल्यावे ईमान । छत्रसाल तिन ऊपर, तन मन धन कुरबान ॥८९॥
ए बात सुन राजा की, आप हुए खुसाल । जाहिर किया दीन को, बकसी किताब हाल ॥९०॥
ए बात राजा के घर में, कोई कोई कों न आई नजर । परचो लीजे इनको, ए हिन्दू बांचे क्यों कर ॥९१॥
तब बुलाए बलदीवान ने, काजी मुल्ला पण्डित । तिन सों तहकीक करने, चरचा कराई इत ॥९२॥
आया काजी महोबे का, नाम अब्दुल रसूल । तिन सेती चरचा भई, कुरान की मकबूल ॥९३॥
तिन सेती पूछाइया, कुरान का सवाल एक । एकै जवाब दीजियो, जिन बोलो जवाब अनेक ॥९४॥
मेरे आगे कुरान की, कोई मार न सके दम । उमी होए पूछत हो, कुरान की बातें तुम ॥९५॥
कुरान तमाम तपसीर, मुझको रहे याद । मुझ सेती कई खलक, पढ़के पहुंची मुराद ॥९६॥
तिस वास्ते तुमको डरत हैं, कोई न ल्यावे ताब । हम सवाल पूछत हैं, तिनका देओ जवाब ॥९७॥
क्यों दुनियां की पैदाइस, लिखी बीच कुरान । समझ जवाब दीजिओ, है बात बड़ी फिरकान ॥९८॥
तब जवाब काजीएं दिया, हम क्यों कर कहें खिलाफ । बूढ़े हुए पढ़ते, हमारे दिल हैं साफ ॥९९॥
जो कदी ए कुरान, और भांत बोलें । तो तुम आगे हारहीं, दम ना मार सकें ॥१००॥
पांच भांत की पैदाईस, लिखी अल्ला कलाम । खबर कोई ना पावहीं, पढ़ी खलक तमाम ॥१०१॥
तब कुरान आगे धरी, खोल देखो किताब । तिलकर रसूल में लिखा, आया नहीं जवाब ॥१०२॥
कुंन सेती पैदा भई, ए जो आम खलक । एक कहे एक हाथ से, दो हाथों कहे हक ॥१०३॥
और एक जमात को, ले आए उठाए इप्तदाए । और एक खिलकत और से, ए पांचों की पैदाए ॥१०४॥
तब पूछा अब्दुल रसूल को, तुम हो किन में । अब सांच बोलियो, तुम पैदाइस जिनसें ॥१०५॥
तब काजी के दिल में, भई जो दुदली । तब जवाब आया नहीं, तब बात कही बिचली ॥१०६॥
तब बलदिवान नें, कही ऐ मियाँ तुम । भूल के बात करत हो, छूटा वह हुकम ॥१०७॥
तब काजी कदमों लगा, किया सेजदा हक । हम तहकीक पहचानिया, ए बात बड़ी बुजरक ॥१०८॥
तब बल दिवान नें, काजी सों पूछी ए । मुसाफ सिर पर धर कहो, सांच बताओ जे ॥१०९॥
तब जवाब काजी दिया, मुसाफ सिर हमारे । जो हम झूठ बोलहीं, तो एही हमको मारे ॥११०॥
ए तहकीक जमाने का खाविन्द, जो करी थी सरत । सो सरत आए पहुंची, फरदा रोज कयामत ॥१११॥
तब बलदिवान के, कछू सांच आई दिल में । पण्डितों से तो पूछ देखों, कोई चरचा करे इनसें ॥११२॥
तब सुन्दर बल्लभ बद्री, और बुलाए पण्डित । तिनको लगा पूछने, ए बात कैसी इत ॥११३॥
बद्री को बुलाए के, महाराजें पूछी बात खरी । ए जो सवाल भागवत के, चित दे चरचा करी ॥११४॥
तब बद्रीदास ने, प्रसन सुनें दे कान । ए बात श्री कृष्ण की, होए ना बिना भगवान ॥११५॥
तब श्री महाराज नें, पाया बद्री पर सुख । रस रहया चरचा मिने, कहया न जाए मुख ॥११६॥
आधी रात उपरान्त, घरों गया बद्री जब । सब पण्डितों मिल के, बातें पूछी तब ॥११७॥
कैसी तुम चरचा करी, कैसा दिया जवाब । मैं जथारथ बोलिया, उड़ाए दिया ए ख्वाब ॥११८॥
इन ख्वाब के आज लों, है तुमारे घर । फिटकार सबों नें दई, क्यों ना गए तुम मर ॥११९॥
जब बात रोपी तुम इनकी, फिर है तुमारा कोई ठौर । अब मारो उलटाए के, बात करो जाए और ॥१२०॥
हम देत सवाल बनाए के, लेके जाओ तुम । जाए के खंत करो, आवें मद्दत हम ॥१२१॥
सवाल बनाए रात में, बिना जाने निसान । परियान कर उठे, प्रात करें पहिचान ॥१२२॥
प्रात समय उठके, आया बद्री दरबार । बल दीवान को बात से, किया खबरदार ॥१२३॥
भई भेंट महाराज सों, अबही बाताँ करते और । तब पूछा महाराज ने, रात की बात गई किस ठौर ॥१२४॥
ऐ प्रस्न भागवत के, हम तो सब जानत । झूठी बातें बनाए के, करने लगे इत ॥१२५॥
तब उस महाराज को, चढ़ी बड़ी रीस । कही बुन्देला इने गुरु ना करें, कोई न नवावें सीस ॥१२६॥
इनकी पटी सिर पर, अब बांधियों जिन कोए । बुन्देलों की जात में, इनको उठो न सोए ॥१२७॥
सुंदर बल्लभ बद्री, भले मिले कल माहिं । चौदह विद्या निपुन हैं, पर एकौ जानत नाहिं ॥१२८॥
फेर बलदीवान आगे, भई जो चरचा जोर । सब पण्डितों मिलके, मेरा चित दिया मरोर ॥१२९॥
जेर भए सब पण्डित, फते भई इसलाम । काफर स्याह मोंह होए के, ले गए अपने ठाम ॥१३०॥
एक बात इत और भई, सब कुंवर ठाकुरों में । खरच राज की बकसीस देख के, धोखा भया मन में ॥१३१॥
खरच इतसे पहुंचे नहीं, ए उठत है कहाँ से । है इनके पास रसायन, ए सबों जानी मन में ॥१३२॥
सिवाए एक महाराज के, सबके मन में बस गई । बरस तीन बीत गए, तब लग खरच की खबर ना भई ॥१३३॥
तब एक दिन महाराज ने, पूछी श्री राज से एह । सबके मन में धोखो है, ए खरच होत है जेह ॥१३४॥
तब फुरमाई श्री राज ने, आवत खरच साथ में सें । मेरता को साथ है, सो भेजत है हमें ॥१३५॥
तब महाराजा मन में, बहुत दलगीर भए । हम ब्रह्मसृष्ट के साथ में, अजूं भए ना सही नए ॥१३६॥
बहुत दलगिरी आई दिल में, माने न आपको साथ । अजहूं काम दीन का, आया न मेरे हाथ ॥१३७॥
विचार किया मन में, ए बात कहों जाए कित । दलगीर होए के प्रात से, पौढ़े घरों जाए तित ॥१३८॥
जब हो गए दो पहर, घर में रसोई भई तैयार । रानी तो उठाए ना सके, कह भेजी बलदिवान सो बाहर ॥१३९॥
आए बलदीवान चल के, जगाए श्री महाराज । तुम काहे होत दलगीर, सो कहो हमें आज ॥१४०॥
तब कही महाराज ने, नहीं कहवे की बात । तब कही बलदीवान ने, ए कही चाहिए साख्यात ॥१४१॥
तब महाराजे ए कही, हमारे मन में रहे एह । है इन पास रसायन, आज तहकीक करी हम तेह ॥१४२॥
ए आवत खरच साथ में से, ए सुन भयो दरद । हम कैसे सेवक इनके, हम पर गजब की रही न हद ॥१४३॥
तब बोले बलदिवान, ए बात है सहल । एक जागा मारिए, ताकी चौथ दीजे सब मिल ॥१४४॥
ए बात पक्की करके, लिखाए लई महाराज । तब सब साथ में आए के, अरज करी आगे श्री राज ॥१४५॥
आवे साथ परदेस को, और रहे जो इत । तिन सब की सेवा की, मोहे है गरज करों नित ॥१४६॥
और करी अरज हजूर में, करो इलाज बाहिर निकलने को । सब ठाकुरों मिल विचार कियो, एक जागा मारने को ॥१४७॥
हमको बड़ी उम्मीद है, आप होओ असवार । चले आगे असवारी में, हम जलेब में खबरदार ॥१४८॥
सम्बत सत्रह सौ तेतालीसे, असवारी करी जब । हस्ती पर चढ़ाए के, आगे सेना चलाई तब ॥१४९॥
राठ खड़ोत जलालपुर, नजीक कालपी पहुंचे । इत मुल्ला काजी सैयद, सब जमा किए ॥१५०॥
तिनसों कुरान हदीसों की, चरचा करी जब । जेर हुए इसलाम में, सबों मेहेजर लिख दिया तब ॥१५१॥
ए हम तहकीक किया, खाविन्द जमाने का । हम अपनी आंखों देखिया, जो कुरान हदीसों लिखा ॥१५२॥
सो पहुंचाया सरे तोरे को, कानों सुन्या सुलतान । सुनके सिर नीचा किया, छूटा नहीं गुमान ॥१५३॥
मुनकरी रसूल सों, लिखी बीच कुरान । सो क्यों ईमान ल्यावहीं, जो मोहर लिखी दोऊ कान ॥१५४॥
सातों निसान कयामत के, जाहिर किए जब । सुन के सिर नीचा किया, मुनकर हुए तब ॥१५५॥
दाभा हुई जाहिर, उगा सर मगरब । लड़ा दज्जाल अहम्मद सों, बिन बातिन न देखा तब ॥१५६॥
हुए आजूज माजूज जाहिर, बेटे याफिस के । खाने लगे सब को, मरगी पहुंची ए ॥१५७॥
जब इमाम जाहिर भए, हजरत ईसा साथ । मोमिन बन्ध छुड़ाए के, पकड़े नीके हाथ ॥१५८॥
असराफीलें आए के, गाया इत कुरान । नीके मोमिन सुनत है, इनों भई पहिचान ॥१५९॥
हकीकत मारफत के, खोल दिए दरबार । ए मेहर मोमिनों पर, सो आवे नहीं सुमार ॥१६०॥
इहां से असवारी करके, सिंउड़े पहुंचे जब । बसन्त सुरखी आए मिल्या, कदमों लगा तब ॥१६१॥
चित्रकूट को ले चल्या, पर जुदा रख्या आप । तो संसार की लहर का, कबूल हुआ ताप ॥१६२॥
श्री राज चले चित्रकूट को, लिया महाराजे दिल में । सेवा में भंग होत है, कोई इलाज करो इनसें ॥१६३॥
तब सेवा के वास्ते, पहुंचाया सब साथ । कुंवर ठकुराइने सबे, सोंपे श्री राज के हाथ ॥१६४॥
एक बरस तहां रहे, इत खोले अल्ला कलाम । श्री राज रोसनी जाहिर करी, खुल गए सब ठाम ॥१६५॥
तब श्री राजें लिया दिल में, ए खबर करी महाराज । चाहिए इन मेहर से, खुसाल होवें आज ॥१६६॥
तब ओरछे के राजा ने, लिया खटोला ए । लगी फिटकार तिनको, मौत हुआ तिन से ॥१६७॥
फेर मिठू पीरजादे ने, बुरी करी नजर । पांच हजार असवार ले दौड़ा, राह में भई फजर ॥१६८॥
तिनको मारा चमारों ने, फिरा मोंह स्याह ले । हुई लानत संसार में, काफर होने के ॥१६९॥
और पुन जिन जिन करी, तिन तित ही पाई सजा । ए काफर लिखे कुरान में, एही लिखी ताले कजा ॥१७०॥
महामत कहें सुनो साथ जी, यह कीमत की बात । जब आए तुम परना मिने, तब की ए विख्यात ॥१७१॥
(प्रकरण ६०, चौपाई ३५२७)
