श्री बीतक - प्रकरण ६१ | Beetak prakaran 61
अब कहूं बीतक परना की, जब बैठे इत आए । दज्जाल लगा पुकारने, सो तुमें कहूं बनाए ॥१॥
जब आए रामनगर से, तब पुरदल खान । कुफर दिल में लेय के, जाए कहो राजा के कान ॥२॥
लिख भेजी पातीय को, तुम क्यों कहत कयामत । उनकी मुदत दूर है, आज क्यों बताओ इत ॥३॥
ताकी पाती को जवाब, लिखो श्री जी साहब । तुम दूर कौन किताब से, तहकीक किया अब ॥४॥
सो बताओ हमको, जो लिखी बीच फिरकान । ओतो हुए जाहिर, सात कयामत के निसान ॥५॥
सूरज ऊगा मगरब, बिन रोसनी का अंधेर । तुम आंखों ना देखिया, अब नजर करो फेर ॥६॥
दाभा हुई जाहिर, किया दज्जाल जोर । ईमान लिया छीन के, पड़ा दीन में सोर ॥७॥
तुम राह देखत हो, आजूज माजूज भए जाहिर । देखा लोकों इसलाम के, खाई खलक बाहिर ॥८॥
असराफीलें गाइया, कुरान के सुकन । सो नीके सुनत हैं, खास गिरोह मोमिन ॥९॥
हजरत ईसा उतरे, आए दावत करी इमाम । सो कागद चारों खूंटों, सबको पहुंचाए तमाम ॥१०॥
आज तुम सूते नींद में, तो ऐसा लिखा सुकन । बिन नसीब तुम क्या करो, ए काम ईमान मोमिन ॥११॥
अब तुमें जाहिर होएगी, हकीकत कयामत । आई नजीक तुम पर, जो कही कुरानें साइत ॥१२॥
तुमारे अहदी आए थे, बीच रामनगर । सो तहकीक कर गए हैं, तुमें तहां भी न पड़ी खबर ॥१३॥
अब तुम हलके बहुत हो, बिना वाउ उड़े ज्यों तूल । सो हाल तुमारा होत है, कछू न रहेगा सूल ॥१४॥
ए लिख भेजी पाती को, सुनावने जवाब । फेर के उत्तर ना दिया, बिन अंकूर न पावे सवाब ॥१५॥
जब मारी ललत पुर, तब हुआ असवार । आवत भेंटा राह में, तब भागा हुआ खुवार ॥१६॥
बाईस असवारों मारी, फौज तीन हजार । भागा जाए भेड़ ज्यों, बिना तेज देखा खुवार ॥१७॥
फौज लेके आइया, गौर सों करी मुलाकात । लड़ाई सफजंग की, नाम निसान ना रही कछू आस ॥१८॥
ज्यों फेरून दुआ मूसे की, रोंद नील में हुआ गरक । त्यों औरंगजेब पर, फेरा फुरमान हक ॥१९॥
त्यों ही मिठू दौड़िया, मारा उन्हें चमार । खुवार हुआ दुनियां मिने, छूट गया अख्तयार ॥२०॥
भई मुहिम खटोला की, आए ओरछे के । उतहीं पटका हुकमें, जड़ समेत उखड़े ॥२१॥
फेर जेतपुर के राजा ने, मुहिम करी । ताको खुवार ऐसा किया, पूरी लानत उतरी ॥२२॥
फेर ओरछे के राजा का, आया दौवा खटोला पर । खुवार हुआ भली भाँत सों, फिरया स्याह मोंह लेकर ॥२३॥
फेर राजा के मुलक लिए की, पहुंची खबर नौरंगाबाद । सुन साह ने रणमस्त खां को, फौज लेके भेजा विवाद ॥२४॥
पीछे से पीरजादे में होए के, भई ईसारत रसूल की जब । तां समें विचार करके, लिखा किया साह ने तब ॥२५॥
सात मजल रनमस्त खां, गया था चल के ले हुकम । लिखा परवाने में तुमको, उहां से फेर आइयो तुम ॥२६॥
फेर रनमस्त खां ने, पातसाह के हुकम । सात मजल आइया, लिखा के फेर आओ तुम ॥२७॥
फेर पंडित ओरछे के, चढ़ आए लड़ने । तब मारा मुलक ओरछे का, मुस्किल हुआ रखना अपने ॥२८॥
दौआ और पंडित पर, भया कसाला जोर । विघन पड़े उतहीं, किया दज्जालें सोर ॥२९॥
फेर राणा परताप सिंह नें, बुरी करी नजर । तो ख्वारी आपस में भई, है कयामत की फजर ॥३०॥
जिनों जिनों जैसी करी, तिन सजा पाई तित । जैसी जैसी जिनों करी, ताए मारा उसी बखत ॥३१॥
मरनें के बखत में, दज्जाल पटकत हाथ । खुवार किया संसार को, जादा जो उनके साथ ॥३२॥
दज्जाल की छाती कही, दूध पीवे तिन सें । सो खुवारी उन से, रहे परेसानी में ॥३३॥
उजाड़ सब सहरों का, काहू होए न आराम । सब परेसान होएंगे, अपने अपने काम ॥३४॥
बलाए जो उतरी, सो दफे होए मोमिनों की बरकत । सो ठंडी हो जात है, पड़े उम्मत दज्जाल तित ॥३५॥
पनाह बीच मोमिन रहे, हक सुभान नजर । इनों को लेलत कदर की, होए गई फजर ॥३६॥
ए बैठे अपने ठौर में, करते हैं जिकर । फिरस्ते चौकी देत हैं, बलाए उड़ावें कर फिकर ॥३७॥
हकें दई मोमिनों को, अपनी जो पहिचान । नबूबत रसालत इनको, पूरा पाया ईमान ॥३८॥
एही सुंनत जमात हैं, गिरोह रब्बानी जे । इनको दाना हकें किया, अपना इलम दे ॥३९॥
साहिदी खुदाए की, कही गिरोह देवन हार । एही अरस अजीम से, ए सब खबरदार ॥४०॥
जबराईल वकीली, करत सब ऊपर । साफ दिल रखे इनको, सब पावत ए पटन्तर ॥४१॥
सात निसान बड़े कहे, जिनसे होए कयामत । सो इतसे पावे खलक, जो इत कादर बकसत ॥४२॥
विरोध सारी विस्व का, भान किया एक दीन । सबकी सबों समझाए के, एही देवे आकीन ॥४३॥
रूहें फिरस्ते उतरे, सोई अरस वारस । बानी अक्षरातीत की, इनों से सुने सरस ॥४४॥
आठों भिस्त आखर की, पाई इनों की बरकत । आखर खाविन्द करेगा, इन खातर उठे कयामत ॥४५॥
इनों की सिफत सब्द में, आवत नहीं जुबाए । त्रिगुन रोए पीछे फिरे, इन की खूबी सुन श्रवनाए ॥४६॥
महामत कहें ए मोमिनों, याद करो सुकराना । मेहर करी तुम ऊपर, तुम्हारी सिफत करे सुभाना ॥४७॥
(प्रकरण ६१, चौपाई ३५७४)
॥ नौतनपुरी से लेकर पद्मावती पुरी तक बीतक सम्पूर्ण हुई ॥
