श्री बीतक - प्रकरण ६२
मंगलाचरण
निजनाम श्री जी साहिब जी, अनादि अछरातीत । सो तो अब जाहेर भए, सब विध वतन सहीत ॥
श्री श्री जी की आठ पहर की वृत्त जो श्री पद्मावती पुरी में भई सो सुरु
अब्बल हक के दिल में, खेल दिखाऊं रूहन । इस्क रबद खिलवत की, बातां करें सैयन ॥१॥
चाह करें खेल देखने, मैं बरजो तीन बेर । त्यों त्यों मांगे फेर फेर, रबद चढ़ी सिर मेर ॥२॥
देख्या ब्रजरास को, तीसरे जो हिसाब । आए मेरे आगे बातें करे, लेकर बड़ा सवाब ॥३॥
तब लिया हकें दिल में, ए जो चौदह तबक । तिन में जम्बूद्वीप में, भरत खण्ड बुजरक ॥४॥
तिनमें विसेख देख के, ए जो खण्ड बुन्देल । काएम सिफत तिनकी, जो तीसरा तकरार लेल ॥५॥
तामें सिरे सिरदार की, ए जो परना ठौर । तिनमें सिफत छत्रसाल की, नहीं पटन्तर और ॥६॥
मिलावा सैयन का, तामें हुकम सिरदार । हकी सूरत धनीए की, करें ब्रह्मसृष्टि सों प्यार ॥७॥
इन सरूप की इन जुबां, कही न जाए सिफत । सब्दातीत के पार की, सों कहनी जुबां हद इत ॥८॥
सागर सुख अनगिनती, पल पल लेत सैयन । जो सेवा में सामिल, करते जो इन तन ॥९॥
एक पल सेवन की, सुख आवे न इन जुबान । लिखा अग्यारह सौ बरस का, ए लिया जिन ईमान ॥१०॥
तिन सैयों की सिफत, क्यों सके कोई कर । पर हुकम कहेवे धनी का, ए सिफत सब ऊपर ॥११॥
तामें सेवा कर जो संग चले, ताकी सुमार न आवे सिफत । एतो भई बका मिने, ए कहनी जुबां हद इत ॥१२॥
पर आज्ञा कहावत है, इत मैं तें कछुए नाहिं । सैयन मिलावे मिने, याद ल्यावें दिल माहिं ॥१३॥
जो याद करें यकीन सों, सो बैठे बका बीच धाम । सो दोऊ लोक में सिफत, होवे पूरन मनोरथ काम ॥१४॥
साका विजियाभिनन्द का, बरस एक हजार नब्बे । सम्बत सत्रह सै पैंतीस में, पहुंची सरत जो ए ॥१५॥
साके पांच परना मिनें, हुकम स्यामा जी श्री देवचन्द्र जी सामिल । दावत करी जाहिर, भई सकुण्डल सामिल ॥१६॥
बेवरा तीन सूरत का, जुदे हवाले जुदे काम । एक हुकम जोस एक आतम, पहुंचे एके बखत मुकाम ॥१७॥
धनी हजूर पहुंचे तीनों, भई मजकूर तिन से । सुने हरफ नब्बे हजार के, सब रोसनी इनमें ॥१८॥
बसरी मलकी और हकी, ए हुकम तीन सूरत । तिन दई हैयाती दुनी को, करी सैयन वास्ते सरत ॥१९॥
आई एक हजारें, सूरत जो बसरी । दूसरी दसमी सदी मिने, निजधाम से उतरी ॥२०॥
तीसरी जो हकी कही, तिन आई वारसी दोए । मता तीन सूरत का, किया हुकमें जाहिर सोए ॥२१॥
हुकम देवचन्द्र जी स्यामा जी, ए तीनों के फैल हाल । सारा मुदा इनों पर, ना कोई इन मिसाल ॥२२॥
रोसनी तीन सूरत की, तीनों के जुदे जहूर । बैठक बका बारीकियां, किए जाहिर तीनों नूर ॥२३॥
हुकम जोस बसरी पर, आए निजधाम से दोए । जिने देख्या सो जाहिर किया, इन बिना जाने न कोए ॥२४॥
रूह फूंकी मलकी मिने, रूह अपना दिया खिताब । सो कुंजी फुरमान की, सबों दिखाया हैयाती आब ॥२५॥
हक हिकमत हकी मिने, जित आई अकल नूर । तिन मता लिया सबन का, जाहिर किया बका जहूर ॥२६॥
दुनी पैदा जुलमत से, हिरस हवा सैतान । सो पहुंचे पेड़े लों, चढ़े न चौथे आसमान ॥२७॥
तीन वजह की पैदाइस, लिखी अपने कलाम । और लिखा सास्त्रों मिनें, पावे न खलक आम ॥२८॥
कहों तीनों का बेवरा, लाहूत जबरूत मलकूत । फैल तीनों करत हैं, बीच जिमी नासूत ॥२९॥
सैंया वाहेदत में असल, तिनके फैल तिन माफक । सो समझे अपनी जात को, निजधाम जिनका हक ॥३०॥
और गिरोह जबरूती, आए लगी इन सोहोबत । सो आई नूर अकल बीच, जो अक्षर की निसबत ॥३१॥
और आम खलक जो तीसरी, मलकूती अकल । ए आगे ना चल सके, नकल की नकल ॥३२॥
हुकम के अमल में, ना कोई उतरे मोमिन । हकीकत मारफत की, किन आगे करें रोसन ॥३३॥
तब हरफ करमकाण्ड के, कहे तीस हजार । होसी हकीकत मारफत जाहिर, बीच सैंया बारे हजार ॥३४॥
चढ़ नासूत मलकूत, छोड़ सुंन ला मकान । और देखा नूर मकान, छोड़ी रोसनी इन आसमान ॥३५॥
इतथें आया इसक, बैठे तिन तखत । पहुंचे अरस अजीम में, तहां देखी हक सूरत ॥३६॥
देखा मिलावा धनी का, रूहें बारे हजार । और देखा अरस अजीम को, चौथा नूर के पार ॥३७॥
होज जोए बाग जानवर, देखी हक मोहलात । पाई माफक साहिदी, जो जाहिर करी बात ॥३८॥
कहे दो तकरार लेल के, उतरे रूहें फिरस्ते जित । सो फेर आवेंगे आखरत, करी बातें साबित ॥३९॥
इत आवन को आगम, बातां करी बनाए । ए खेल देख सैयां पीछे फिरें, रही तामें सक न कांए ॥४०॥
सेवा सिफत मोमिन की, पहुंचत है सब हक । इन समान बन्दगी, नहीं कोई बुजरक ॥४१॥
और सुंनत जमात की, जो बातें हक सोहोबत । तिनको दीदार जो करे, ताकी न आवे जुबां सिफत ॥४२॥
तो इन जमात की क्यों कहों, सोभा सत इन मुख । ए सोभा सब्दातीत की, कहयो न जाए ये सुख ॥४३॥
इनकी सिफत सुक जी कहें, और सास्त्रों वेद व्यास । त्रिगुन अपने चित में, रज की राखें आस ॥४४॥
और नाम केते लेऊं, ब्रह्मांड के धनी ऊपर । सब कोई सेवे सनेह सों, अपना इष्ट चित धर ॥४५॥
अब तो इत कहवे को, रहयो न कोई ठौर । रही बात बका अरस की, सो सिफत हैं जोर ॥४६॥
अक्षर ठौर अखण्ड जो, जाके पल थें पैदा कई इण्ड । सो उपज फना हो जात हैं, त्रिगुन समेत ब्रह्मांड ॥४७॥
ईस्वर महाविष्णु प्रकृति, पल फिरें होत है नास । सो अक्षर इन सैयन की, करें दीदार की आस ॥४८॥
ए तो कही वेद की, और लिखी सिफत कुरान । सो सब सैंया पावहीं, कर देवें पहिचान ॥४९॥
बीच किताबों में कही, सैयों की सिफत । सबमें रोसनी होएगी, फरदा रोज कयामत ॥५०॥
हुकम नूर खुदाए का, जो है नूर जलाल । दाएम आवे दीदार को, फिरे मुजरा कर नूरजमाल ॥५१॥
तहां पैदा फना होत है, ए जो चौदह तबक । जहां जबराईल रहत है, पहुंच ना सक्या हक ॥५२॥
तिन हक का मेहेबूब, महम्मद अलेहु सलाम । सो आया गिरोह वास्ते, रसूल अपना नाम ॥५३॥
रब्बानी गिरोह रब्ब से, किए दाना आप । सिफत सुभान इनकी करे, रहे हजूर हमेसा मिलाप ॥५४॥
एही औलिया लिल्ला कहे, खुदा के दोस्त ए । सो रहे हमेसा हजूर, वास्ते बंदगी के ॥५५॥
इनकी जो बीतक भई, ताकी नेक कहों जहूर । ए सागर सुख अनगिनती, सो कहयो न जावे नूर ॥५६॥
ए कहावे हक का हुकम, करे वास्ते याद मोमिन । जिनकी पहुंची बंदगी, सौंप चले अपना तन मन ॥५७॥
विकार सारी विस्व का, मिटसी इन खुसबोए । सुनत सब्द संसार में, बिन मेहनत एक सृष्ट होए ॥५८॥
ए जो मासूक जबरूत का, कहियत है लाहूत । सो इत हुआ जाहिर, ऊपर मसनन्द मलकूत ॥५९॥
हुई जाहिर सब में, काढया कुली दज्जाल । सरतें सब आए मिली, मोमिन भए खुसाल ॥६०॥
तब सोर पड़ा आलम में, दौड़ी सब खलक । खोले द्वार मारफत के, पाया सबों ने हक ॥६१॥
एक पहिले आए पहुंचे, किया रसूल दीदार । तिनको द्वार जो भिस्त का, खोला परवरदिगार ॥६२॥
ता पीछे सफ दूसरी, आए मिले असहाब । ताको दिया हक सुभान ने, हैयाती का जो आब ॥६३॥
तीसरी सफ जो आई, तिन पूछा असहाब देखन हार । तिनको खोला खालिक नें, भिस्त का दरबार ॥६४॥
सोर पड़ा संसार में, तब भया ए ख्याल । फिरस्ते सब पीछे फिरे, नींद उड़ी नूरजलाल ॥६५॥
तब याद किया सुपन को, उठी आठों भिस्त । नूर की नजरों चढ़े, करके याद जो कस्त ॥६६॥
सैयां अपने महल में, पहुंचे नूर जमाल । खेल देख पीछे फिरे, होए इत खुसाल ॥६७॥
महामत कहे ऐ मोमिनों, सुनियो मंगलाचरन । अपनी बीतक देखियो, सुनियों दोए श्रवन ॥६८॥
(प्रकरण ६२, चौपाई ३६४२)
