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विषय-सूची

श्री बीतक - प्रकरण ६३

अष्ट पोहोर की सेवा

(जो श्री बंगला जी में विराजे श्री प्राणनाथ जी की मोमिनों ने की)

पहला पहर

सुन्दर सेज सरूप की, अति प्यारी भरी नूर । तिनकी सिफत इन जुबां, क्यों कर कहों जहूर ॥१॥

अत प्यारा लाल पलंग, पचरंगी पाटी मिहीं भर । प्रेम प्रीत सों सेवहीं, सिरदार साथ सुन्दर ॥२॥

सेज तलाई कोमल, मिहीं चादर धरी नरम । सिराने गाल मसुरीए, ए जाने सैंया दिल मरम ॥३॥

चारों पाए सेज बन्ध, बांधे सनंध कर अत । लटके फुमक रेसमी, पचरंग तरंग झलकत ॥४॥

चादर रजाई ओढ़ने, रूत समें सेवा होए । लाल डांडे चार नूर के, क्यों कहों छत्री सोए ॥५॥

परदे झालर झलकत, लवाजमें नाहीं सुमार । सेवे प्रेमदास जोस में, द्वारका दास खबरदार ॥६॥

पलंग उठाए बिछावत, नाराएन हर नन्‍दन । कोई दिन नाथे करी, करते थे रात दिन ॥७॥

फेर के चित दे करी, मथुरा गंगादास । परमानन्द भी संग रहे, सेवे धाम धनी लिए आस ॥८॥

स्याम जी सामिल रहे, सेज सेवा के संग । ए चारों चित सों करें, जान धाम धनी अरधंग ॥९॥

मानिक सेवे सनेह सों, सब सेवा में खबरदार । हजूर हाजिर रात दिन, सब सेवा में सिरदार ॥१०॥

छबीला जो सेवा करे, जो पहिले करी जमुना । ए वारसी इनको दई, जान बेटा अपना ॥११॥

जल अरूगावें छबीलदास, पीछली रात रहे घड़ी दोए । उठे पीउ पलंग से, आरोगत हैं सोए ॥१२॥

पूरबाई को राज नें, रीझ के सेवा दई एह । पीछली रात को अरूगावने, ल्‍यावे लोटा जल के ॥१३॥

पाव दाबन प्रात को, आवे अगरदास गुलजी । कबहूं कबहूं माव जी, दावने की सेवा करी ॥१४॥

और सेवा में आवत, रामबाई दाबत । कोई दिन खेमदास, पीछे रात जादी आवत ॥१५॥

उठत पीउ पलंग से, बखत अरूण उदे । सब हजूरी हाजिर रहें, सो सेवा करें ऐ ॥१६॥

अंगीठी इन समें, ल्यावें बिहारी दास । तपावें श्री राज को इन समें, ए सेवा है खास ॥१७॥

रूमाल रतन बाई का, भिजाइ ताते जल । श्री राज नेत्र पोंछत, ए सेवें दिल निरमल ॥१८॥

धनजी और तारा बाई, कन्नड और गंगाराम । धाम धनी तीजी भोम से, प्रात उठे इन ठाम ॥१९॥

ए नित गावत हैं, और साथी गावे कोई कोई । रिझावत हैं श्री राज को, बानी गावत सोई ॥२०॥

पहिले प्रेम दास करी, भी रामचन्द नन्द राम । आखर को वल्लभ करी, बस्तर पहिनाए के काम ॥२१॥

बिहारी दास सेवा करी, ले आवें अंगीठी भर । रात प्रात तपावत, बस्तर ताजे अंग पर ॥२२॥

पहिले चरना पेहेर के, फेर गोटा कन ढपी । चित दे चोंपसो सेवहीं, पहिनत हैं साहिब जी ॥२३॥

पहिले मोजे पहिनावत, प्रेमदास चित ‍ल्याए । पीछे वल्‍लभ दास ने, सेवा करी बनाए ॥२४॥

कबहूं पहिनें कुरती, जरी बूटे के संग । पटुका जरी जड़ाव जो, दो थुरमे सुपेत रंग ॥२५॥

प्रेमदास बस्तर में, पहिनावत हैं सिनगार । नन्दराम सामिल रहे, संग लाल कस बांधनहार ॥२६॥

लालबाई कस बांधत, मकरन्द दास रहे भेले । लाल दास के बदले, सेवा में रहे ए ॥२७॥

जब पहुंचे इत महाराज, पहिनावत सिनगार । सेवा करे सनेह सों, जान के धनी निरधार ॥२८॥

बल्‍लभ जीवी प्रेमबाई, बांधे चन्द्रवा सेतखान । ए सेवा नित करें, एही लई इनों मान ॥२९॥

प्रात समें पधारत, हरबंस के घर । पावड़े बिछावत प्रेम सों, लाल बाई सेवा पर ॥३०॥

सेतखानों घन स्याम को, था हरबंस के पास । फेर अपने ढिग किया, ए सेवा करी इनों खास ॥३१॥

चरन दासी पनहीं, पहिले रखी दास नारायन । कोई दिन मोहन रखी, फेर लई खिमाई जान ॥३२॥

फेर श्री राजें रीझ के, दई वल्लभ दास । कोईक दिन खिमाई सामिल, फेर आई वल्लभ पास ॥३३॥

पांवड़े बिछावत बकाई, और सेवा करे किसनी । चलते सैंया बिछावहीं, ए सेवा की निसानी ॥३४॥

लोटा भर के ल्यावहीं, ए जो भाई सिवराम । दोनों बखत राखत, ए सेवा के काम ॥३५॥

सेवा डब्बा रूमाल की, लाल बाई धरे। बदले लाल बाई के, दयाली जो करे ॥३६॥

इत पलास के वृक्ष तले, हरवंस देवकी रहें । साथी जो संग आवत, ताकी सेवा जुगतें करें ॥३७॥

करत ताते जल को, बड़े माट भर धरे । जल झारी दातोन, साथ आगे धरे ॥३८॥

कोई दिन सेवा करी, गुल मुहम्मद दौलत । नित राज पधारत, साथ सेवा करें इत ॥३९॥

सूरज मुखी लिए खड़ा, हाथ पकड़े बदले । सूरज सामी करत हैं, बदले यों सेवे ॥४०॥

अमोला प्रभावती, प्रात लिए मोरछल ये । करत ऊपर राज के, जोलों केसव न पहुंचे ॥४१॥

दोनों बाजू मोरछल, केसव संकर लिए हाथ । नन्दराम सामिल रहे, चलत राज के साथ ॥४२॥

छत्र सिर पर फेरत, बल्‍लभ चले पीछे । ए सेवे सनेह सों, खड़ा रहे पकड़ के ॥४३॥

हरबंस के घर से फिरे, चले पांवड़े पर । हंसे हंसावे साथ को, पहुंचावे मानिक गादी पर ॥४४॥

एक बिछावें धन बाई, एक बिछावें घनस्याम । हरबंस के घर से फिरे, तब इने सेवा का ए काम ॥४५॥

हिम्मत जब आइया, बिछावत पांवड़े । मांग लिया लालबाई से, सेवा करे नित ए ॥४६॥

हाथ पकड़ बैठावत, धन बाई रामकुंवर । जब चरन पखालत, बैठें कुरसी या पलंग पर ॥४७॥

चरण प्रछाल के तखत से, उतर के उतारे वस्तर । बैठे चन्दन चौकी पर, मरदन होत फुलेल अतर ॥४८॥

कबहूं बैठे पलंग पर, लवाजमें दन्त धावन । ले रूमाल ठाढ़े दोऊ बाजू, नारायन केसव सैयन ॥४९॥

छबीला अत छबसों, ल्याया कंचन मढयो दातोन । जल ताता सीरा समें, करे सेवा दे मन ॥५०॥

चिलमची हाथ में, नन्दराम पकड़ बैठत । श्री राज हाथ पखालत, संकर बांटत चरणामृत ॥५१॥

श्री राज अस्नान करके, तिलक चन्दन का समीर मिलाए । भाल में आप देए के, कर चितवन साथ को दिखाए ॥५२॥

तहां से आए तखत पर, धरे दोऊ कदम । साथ खड़ा सेवन को, जान अपनी आतम ॥५३॥

फुलमा बनावत, भर ल्यावत डब्बी । नूर महम्मद सेवत है, गुल महम्मद को दी ॥५४॥

रूपा बाई को रीझ के, सेवा दई श्री राज । नित हरड़े अरूगावहीं, रहे इन सेवा के काज ॥५५॥

पांखड़ी छबील दास सामिल, सेवत है दिन रात । अमल ल्याई अरूगावने, मीठी बातें करें विख्यात ॥५६॥

आए मकुन्ददास हाजिर, चीरा बंधावें चौपदे चित । कानढपी तिन ऊपर, गोदावरी बांधत ॥५७॥

तुर्रा कलंगी परन की, राखत मकुन्ददास । चीरा बंधावने बखत हाजिर करें, लटकत तुर्रा खास ॥५८॥

सिर पाग बांधें चतुराई सों, हक पेंच हाथ में ले । भाव दिल में लेए के, सुख क्यों कहुं बिध ए ॥५९॥

मकुन्ददास के सामिल, आए मकुन्द दास पहुंचे । छेड़ा पकड़ ठाढ़ा रहे, आए सेवा करे ये ॥६०॥

अगरदास ठाढ़ा रहें, ले हाथ में दरपन । सेवा करे समार की, ए सेवे चित दे मन ॥६१॥

तामें सामिल सीताराम, और गुल महम्मद । बंसी भी सेवा मिने, मन में धरे आनन्द ॥६२॥

नित ल्‍यावे दरपन को, ए जो अगरदास । सिर पेंच बखत हाजिर करें, ए सेवे दिल खास ॥६३॥

केते दिन सेवा करी, ऊधो दास तिलक । पीछे लई छबीलदास ने, करें प्रेम सों हक ॥६४॥

चन्द्रिका लटकें सिर पर, हीरा जोत अपार । चारों तरफों किरना उठें, तले मोती लटकत हार ॥६५॥

बैठत चीरा बांध के, ऊका ल्याया कलंगी । हेतें हाथों बनावहीं, ये सेवा इनकी ॥६६॥

फूलहार बनावत, रामदास धरमा । ढोला पहुंचावत हैं, बोले ललिता राज खंमा ॥६७॥

झोली मया राम की, सब फकीरी साज । गोदड़ी पेबंद की, ओढ़ावत हैं राज ॥६८॥

सुमरनी कपूर की, ‍ल्याए के देवें हाथ । चिप्पी सेली मुतका, माला ल्यावें गोदरी साथ ॥६९॥

सुई तागा कोकड़ी, और केतेक सुए बड़े । अजमा सोंठ पीपर, मसाला गंधियान केते ॥७०॥

काम पड़े मंगावत, बुलाओ मयाराम । झोली में से ल्याए के, हाजिर करें तमाम ॥७१॥

इत महाराजा आवत, पहनावत हैं सिनगार । पहिनावत बीटी बदले, दई अपने हाथ उतार ॥७२॥

भूखन श्री बाई जी ल्‍यावत, उमंग में दे चित्त । ए जो गोदावरी रूकमनी, संग आवत इत ॥७३॥

रकेबी रूपे की, भर ल्यावत भूखन । रूमाल ढाँप के ल्यावत, महाराजा पहिनावत मोमिन ॥७४॥

माला दो मोतिन की, जड़ाव मुंदरी कंचन । सोने की दो सांकली, दुगदुगी मानिक रोसन ॥७५॥

और सांकली दोहोरी, चंपकली नवसर । तापर कंठी बिराजत, तीन सरी ऊपर ॥७६॥

और कंठी मोतिन की, तले मानिक मोती लटकत । श्री राज कण्ठ विराजत, रोसन ज्यों झलकत ॥७७॥

पहनाए भूखन पीछे फिरें, श्री बाई जी अपने मंदिर । राज भोग अरूगावत, सेवा रसोई पर ॥७८॥

आई जी अरूगावने, ल्‍याई बाल भोग । रतन बाई मूंग ल्‍याई, आए पहुंची संजोग ॥७९॥

ले ले दौड़े और कोई, सो केती कहों बात । आरोगत हैं हेत सों, कोई प्रेम बरते कर बिख्यात ॥८०॥

इन समें छबीलदास, जल देवें कटोरा भर । बात पूछे कोई बीच में, ताको देत उत्तर ॥८१॥

आसबाई अर्ज करे, पधारो घर मानिक । श्री राज रीझ के बोलत, आई बाई बुजरक ॥८२॥

पनही जोड़े जड़ाव की, ल्याया बल्लभदास । छत्र सिर पर फेरत, ए मोमिन हैं खास ॥८३॥

पांव तले पांवड़ा, लालबाई बिछावत । और बिछावत किसनी, लेकर दिल में हित ॥८४॥

उठत पलंग पर से, धनबाई लेवें हाथ । दूजी तरफ लालदास, सेवा हाथ पकड़ने खास ॥८५॥

हाथ आसा गंगादास के, दूजी तरफ दास लाल । मकरन्द रहे सामिल, हाथ पकड़ने की चाल ॥८६॥

जब महाराजा पहुंचहीं, उठावत पकड़ हाथ । लालदास बदले लालबाई, कोई समें पकड़ चलें हाथ ॥८७॥

हंसावत हैं राज को, जरा सेवा में । आड़ी आए ठाढ़ी रहे, राज रीझे तिन से ॥८८॥

लटके मटके चलत, संग वानी गावनहार । संग संकर दास के, और साथ सिरदार ॥८९॥

मानिक मंदिर अपने, करें बिछौने जे । चारों तरफों चन्द्रवा, और रखे गादी तकिए ए ॥९०॥

सुआ को सेवा दई, अन्दर उतारन । नित्याने हजूर रहे, करत अपने तन ॥९१॥

जोड़े मंदिर गंगादास का, तहां बिछौने सब साज । तहां राज बिराजत, सब पूरे मनोरथ काज ॥९२॥

मोदी बड़ा बूलचन्द, चले राज संग ए । ठौर पहुंचे बोलहीं, धाम धनी की जै ॥९३॥

गौर बाई रहत है, हाथ उठावने सेवा में । हाथ पकड़ बैठावत, करे सेवा खुसाली में ॥९४॥

पहिले मोरछल में, रहता था नंद राम । दूजी तरफ केसवदास, करत एही काम ॥९५॥

यों करते मानिक के, घर से फिरे जब । मोरछल हाथ में लेए के, सेवा करे तब ॥९६॥

और दूजा मोरछल, संकर लिए हाथ । और चौंरी जड़ाव की, लिए बल्‍लभदास के साथ ॥९७॥

सामिल बल्‍लभ दास के, खुसाल बखतावर । हजूर हमेसा रहे, सेवा करे चित धर ॥९८॥

बल्‍लभ दास के सामिल, रहे महम्मद खान । मेहनत सेवा मिने, करे दिल में ले ईमान ॥९९॥

लटके मटके चलत, फेर बैठे पलंग आए । सामे मुरलीधर आसन किया, श्रवना देत बनाए ॥१००॥

ऊपर पहर दिन के, आए मानिक के घर से । पधारत पलंग पर, हुआ चरचा समें ॥१०१॥

महामत कहे सुनों साथ जी, ए पोहोर एक की बिरत । जो होत है ता पर, सोए बताऊं जुगत ॥१०२॥

(प्रकरण ६३, चौपाई ३७४४)

इसी सन्दर्भ में देखें-