श्री बीतक - प्रकरण ६४
दूसरा पहर
अब कहों दूसरे पहर की, सेवा साथ की जे । जिन भांत जो होत है, हक मेहर उतरी ए ॥१॥
दोऊ बाजू पलंग के, बैठत लाल केसवदास । फुरमान हदीसां पढ़न की, राज रिझावन आस ॥२॥
धनी धाम के देत हैं, निजधाम के निसान । लेवें मोमिन मिल के, अरस सुख सुभान ॥३॥
राज हेत कर कहत हैं, काका बुलाओ सिताब । दोऊ बाजू रेहेलां धरें, तापर धरें किताब ॥४॥
किताब खाना रखत हैं, संदूका सब साज । सेवा करे सनेह सों, श्री राज रिझावन काज ॥५॥
हजूर हमेसा रहत हैं, थैलियें पैसे । हुकम होये ताए देवहीं, काका सेवा करें ए ॥६॥
बाघजी ले आवत, आगे धरें जंगोटा । श्री राज रीझ के लेवत, वास्ते बैठक ओटा ॥७॥
पंजा वनमाली दास का, देवे श्री राज के हाथ । सुंदर सुभग सोभित, खजोले सुख पात ॥८॥
दुंदराए तपसीर ले, सुनावत अल्ला कलाम । हजूर हमेसा बैठत, इनका एही काम ॥९॥
खुसखत किताब लिखके, पहुंचावत पैगाम । वास्ते फरज उतारने, पहुंचाया खलक तमाम ॥१०॥
कोई दिन गोविन्द राए, और रहत टेक चन्द । गाजी बनी असराईल की, बीतक बांचे श्री देवचन्द ॥११॥
और बद्री दास बैठत, वाका लिखा बरस एक । सेवा है इनकी, और काम किए अनेक ॥१२॥
पोहोकर बद्री सामिल, सेवा करत जो ए । देवीदास बानी लिखें, पढ़ राज रिझावें जे ॥१३॥
और बानी साथ ले खड़े, ए जो लिखन हार । तथा मथुरा और तिमर, परसराम खबरदार ॥१४॥
पदमियां और बीरिया, और सूरत सिंह । मकनिया लिखत हैं, जुगते कलाम सनंध ॥१५॥
हीरामन हेत सों, लिखत बानी सार । और अपनी अपनी ले खड़े, ए हजूर बैठन हार ॥१६॥
मोहना अत मोह सों, लिखे पढ़ें भली भांत । भवन अडग बैठत, गिरधर सुने एही बात ॥१७॥
हरिदास बैठत, बानी लिखने काज । पुस्तक लिख घर में धरें, कोई ताले वाले के काज ॥१८॥
भागवत गीता के, रहस्य काढ़ दिखावें राज । हजूर हमेसा रहत हैं, मिसर गोविन्द जी इन काज ॥१९॥
श्री महाराजा आवत, बैठत चरचा में । श्रवना देत सनेह सों, नफा पावे खलक इन सें ॥२०॥
श्री मुख से चरचा करें, अत मीठी रसाएन बैन । दे साख वेद कतेब की, अत देत सुख चैन ॥२१॥
सनमुख श्रवना देत हैं, मुरली धर बनाए । ना आसन नेत्र डगावहीं, रहें दृस्टें दृस्ट जुड़ाए ॥२२॥
दिल दरियाव खुलत है, कई लहरां उठत तरंग । श्रवना देत जो साथ जी, कई उपजत अंग उमंग ॥२३॥
कई लहरें सुख धाम के, बरनन होत रसाल । श्री महाराजा रीझत, होत दिल खुसाल ॥२४॥
कई साखें सास्त्रन की, और भागवत बचन । प्रसन चालीसों खोलते, सैयां होत मगन ॥२५॥
और साखें कई बारीकी, खोज के कीरंतन । ब्रह्माण्ड सुंन पार के, पहुंचे अक्षर वतन ॥२६॥
ए साहिदियां देत हैं, कई पुरावत साख । और जो साधों की, भाख भाख कै लाख ॥२७॥
वेद और कतेब को, दोऊ करत हैं एक । आज लों कबहूं न हुई, कई उपजे खपे ब्रह्मांड अनेक ॥२८॥
चरचा चित दे होत है, श्रवना देत सब साथ । हेत कर कहत हैं, पकड़ के सैयां हाथ ॥२९॥
ब्रज नैन और चंचल, रहत चरचा में । मोंगे होके सुनत हैं, और न होए इनसें ॥३०॥
मीठी रसना रस भरी, अत सुन्दर हैं बोल । चैन होत है चित को, कोई नाहीं ए सुख तोल ॥३१॥
कहा कहों इन जुबान की, जो हेत कर फुरमाए । अहनिस जुगल सरूप को, बरनन कर दिखाए ॥३२॥
धाम धनी निजधाम को, और न दाता कोए । ये लेने वाले साथ हैं, और न समझे सोए ॥३३॥
सुख बतावत धाम को, दुःख बतावत खेल । जगावत हैं जुगत से, तीसरे तकरार लेल ॥३४॥
तुम नाहीं इन खेल के, याद करो निज धाम । दो बेर दो तकरार में, पूरे हुए न मनोरथ काम ॥३५॥
तिस वास्ते ए तीसरा, दिखाया तुमको ये । मेरी तीनों सूरत, खेल में आई जे ॥३६॥
पहिले ल्याया कलाम को, इसारतें रमूजें हक । रूह अल्ला किल्ली ल्याइया, इमाम खोल दिखाया बुजरक ॥३७॥
पांचों रोज रब्ब के, दिखावत कर प्यार । अब हम धाम चलत हैं, तुम हूजो हुसियार ॥३८॥
दिन कयामत के कहे थे, सो आई सरत सुभान । ए बात मोमिन जानहीं, जाए देवे हक ईमान ॥३९॥
सात निसान बड़े कहे, होसी रोसन वखत कयामत । कहया अग्यारह सौ सन के, सो आए पहुंची सरत ॥४०॥
चारों वसीयतनामें का, सोर पड़ा संसार । आप दावत जाहिर करी, हूजो खलक खबरदार ॥४१॥
आजूज माजूज जाहिर भए, ऊग्या सूरज मगरब । दाभा हुई जाहिर, देखेगी दुनियां अब ॥४२॥
भई लड़ाई दज्जाल सों, करी मोमिनों और इमाम । सो अब होसी जाहिर, देखसी खलक तमाम ॥४३॥
ईसा और इमाम, लड़े दज्जाल सों जोर । मरते दज्जाल पुकारिया, पड़ा खलक में सोर ॥४४॥
असराफील आए के, गावे अल्ला कलाम । सूर फूंका संसार में, होए चालीस बरसों तमाम ॥४५॥
ए नसीहत गिरोह पर, होत है रात दिन । ए विचार समझहीं, खास गिरोह सैयन ॥४६॥
अरस इलाही खजाना, करते है सरफ । जिन ताले लिखा सो पावहीं, और ना लेवे एक हरफ ॥४७॥
इन चरचा में बोलन की, काहू ना रहे मजाल । भानने को ठाड़ा रहे, सोई करत दज्जाल ॥४८॥
महामत कहें ए साथ जी, सुनियो चित दे तुम । अब आरोगन के वखत का, हुआ है हुकम ॥४९॥
(प्रकरण ६४, चौपाई ३७९३)
