श्री बीतक - प्रकरण ६५
अब कहूं आरोगन की, उठत समें झीलन । पीछे आरोगन की, कहों सेवा जो सैंयन ॥१॥
दो घड़ी दोए पहर में, बाकी रही जब । बाई हनमन्त अरज करें, थाल ल्यावन की तब ॥२॥
हुकम किया हक ने, जाए के ल्याओ थाल । आए बाई जी सों कहया, होए के खुसाल ॥३॥
अरज की सेवा मिने, पहिले कमलावती । तिस पीछे लाड़बाई, पीछे हनुमन्त करती ॥४॥
हुकम हुआ श्री राज का, ल्याओ धोती पोती तेल । सेवा के सामिल मिलो, तब आऊं तुमारी गैल ॥५॥
तबलों मोकों चरचा से, काहे करत हो भंग । तब साथी सेवा के कहें, श्री बाई जी अरज करें अर्धंग ॥६॥
जेनतीदास आए के, बातें करी बीच कान । अरज खास गिरोह की, देत कर पहिचान ॥७॥
उठत राज झीलन को, बैठत चौकी पर । सखियां तेल लगावत, चारों तरफों फिर ॥८॥
तेल की सेवा मिने, गोदावरी गंगाराम । कटोरी भर के ल्यावहीं, इनका इन सेवा में विसराम ॥९॥
अस्नान के समय में, होत तेल मरदन । अगरदास गुल जी करे, साथी जो सेवन ॥१०॥
इन सेवा में सामिल, बंसी सीताराम । और सेवा करें सब, सबको देवें आराम ॥११॥
तेल प्रसादी बांटने, करत सेवा गंगाराम । साथ की सेवा मिने, करें मनुहार तमाम ॥१२॥
धोती पोती पीताम्बर, लालदास इत ल्याए । मानक ताते जल को, ल्याई कर बनाए ॥१३॥
जल समोवने ल्याइया, गंगाराम भगवान । झीलण की सेवा मिने, दिल में नहीं गुमान ॥१४॥
झीलण रंग सुहामणा, गावें कन्नड़ गंगाराम । बाई तारा सामी झीलत, गावें केतेक साथ तमाम ॥१५॥
चौकी ल्याई अस्नान को, ए जो बाई मान । तिन आगे पटली धरी, रतन बाई परवान ॥१६॥
पावड़ियां चंदन की, ल्याई बाई राम । तले पांवड़ा चादर पटली पर, ए रतन बाई का काम ॥१७॥
चन्द्रवा ऊपर तानत, ए जो बाई रतन । चौकी ऊपर चादर, ल्याई मानिक बाई बिछावन ॥१८॥
मानक नहवावें सनेह सों, जल के लोटे भर । लालदास सामिल रहें, जल डारे उमंग कर ॥१९॥
छबीलदास वृन्दावन, अंग पोंछत समें झीलन । लाल बाई देत हैं, करें सेवा होए मगन ॥२०॥
इन समें आए पहुंचे, श्री महाराजा जब । अंग पोंछन हाथ पकड़न की, सेवा करत हैं तब ॥२१॥
रूमाल ल्याई लालबाई, श्री बाई जी पोंछत अंग । प्रेमदास सामिल रहे, कई सखियां सेवे संग ॥२२॥
घेर के ठाढ़ी रहें, फिरत हैं गिर्दवाए । जल लोटा ललिता पर, सब कपड़े दिए भिगाए ॥२३॥
हांसी होवे इन समें, सब सैंया करें कलोल । श्री राज रसना सों, मीठे कहत हैं बोल ॥२४॥
सोभादास झीलन में, लोट पोट होवें जल । निरगुन भेख रहत हैं, साफ दिल निरमल ॥२५॥
औलिया लिल्ला जो कहे, नफस के दुसमन । सो सिफत है इनमें, जो कही मोमिन ॥२६॥
केसवदास बानी ले, बांचत समें इन । लालदास कुरान की, आएत करें रोसन ॥२७॥
पीताम्बर पहिनावत, लाल प्रेमदास । महाराजा दो थुरमें, ओढ़ावत हैं खास ॥२८॥
पीउ पावड़े चलत, रतन बाई के । पनही जोड़े जड़ाव की, धरी बल्लभदास आगे ॥२९॥
एक पांवड़ा रेसमी, दीपा बिछावत । राज चलत ता ऊपर, रसोई के बखत ॥३०॥
पांवड़े बकाई के, चलत लटकनी चाल । संग सैयां घेर के, बानी गावें रसाल ॥३१॥
दोना पातर बनावत, ए जो खेमदास । सीताराम के संग रहे, सेवे कर विस्वास ॥३२॥
थाल ऊपर चन्द्रवा, चार जनी पकड़े । ए सेवा धनबाई की, आवे रसोई के समे ॥३३॥
थाल बड़ी रूपे की, आसबाई बनाई कर हेत । धोए रूमाल सों पोंछ के, बाई जी अपने हाथों लेत ॥३४॥
कटोरे कंचन चाँदीए के, दस धरे फिरते । धोए पोंछे रूमाल सों, वास्ते तरकारी के ॥३५॥
और राज भोग थाल में, धरत हेत कर प्यार । और कटोरी सैयन की, कहे हूजो खबरदार ॥३६॥
श्री बाई जी आवत अरूगावने, मध्यान को ले थाल । तुलसी राधा रूकमनी, सैयां घेर चलें खुसाल ॥३७॥
श्री बाई जी के आगे पांवड़ा, बिछावत करना । गादी बिहारी दास धरें, करे सेवा जान अपना ॥३८॥
बिहारी दास बिछाईया, आगे तखत के । गादी चाकले रेसमी, और दोऊ बाजू तकिए ॥३९॥
तिन पर आन बिराजत, दोऊ बाजू बैठावनहार । एक बाजू लालबाई, दूजी धन बाई खबरदार ॥४०॥
इत खंमा ललिता बोलत, इनकी सेवा ए । और सनमुख गावन को, मुकुन्द दास बैठे ॥४१॥
कन्नड़ इनके साथ हैं, परमानन्द प्रवीन । बिंदा भी सामिल रहे, गावे गंगाराम आकीन ॥४२॥
मान बाई अत मान सों, चौकी आगे धरत । धरया झालर लग्या रूमाल, ऊपर बिछावत ॥४३॥
थाल धरी ता ऊपर, श्री बाई जी बैठत पास । आई जी सनमुख बैठत, थाल ल्यावें कर बिस्वास ॥४४॥
लई मानक चिलमची, श्री बाई जी हाथ पखालत । रूमाल सों लेइके, लाल बाई लोबत ॥४५॥
सैयन मिलावें गिरोह सें, आवत आरोगने थाल । संकर सेवा में हाजिर, राज आरोगत दिल खुसाल ॥४६॥
मिलावे सैयन के, जेनती दास सिरदार । सेवा करें सब साथ की, उपली टहल को खबरदार ॥४७॥
सूरजमन रसोई में, रहता था दिन रात । साथ की सेवा करे, फेर मिला अपनी जात ॥४८॥
रूमाल कसीदल सिर पर, मानक बांधे कर हेत । श्री राज बातां करें गुझ सों, मीठी रसना कर देत ॥४९॥
रूमाल कसीदे का, आरोगते उठावे । लालबाई सेवा करें, ओढ़त इन समे ॥५०॥
मथुरी अत मोह से, रूमाल देवें भिगोए गुलाब । बिंदी करें तिलक बीच, श्री राज देत हैयाती आब ॥५१॥
मथुरी हिमोती थाल ल्यावत, बारे अपने अपने । सेवा में दोऊ सामिल, कछू चूक ना जान पने ॥५२॥
हमेसा ढिग बैठत, श्री बाई जी सेवा में । रूच के श्री राज मांगत, कहवत श्री बाई जी इन समें ॥५३॥
हाथ करके हेत सों, श्री बाई जी परसन हार । साक तरकारी अथाने, आरोगत बात विहार ॥५४॥
लाल केसव बैठत, दोनों बाजू के । चौपाई लिखे चितसों, आरोगत फुरमावें जे ॥५५॥
गोकुल हाजर इन समें, बातां करें बनाए । इलम हदीसां साहिदी, कहत हैं चित ल्याए ॥५६॥
आरोगते प्रथम देत है, बाइयों को प्रसाद । राजाराम हेत सों, पावे इनको स्वाद ॥५७॥
रतनबाई मूंग ले आई, ल्याई पूरबाई प्रवीन । और साथ सब ल्यावत, सब सेवा में आधीन ॥५८॥
सुआ और सीताबाई, और प्रेमबाई । रूमाल हाथ डुलावत, आरोगने बखत आई ॥५९॥
छत्र लिए ठाढ़ा रहें, ए वल्लभ दास करी । रूमाल ठाढ़ो डुलावत, ए सेवा करी बिहारी ॥६०॥
धरम पालें बाई धरमा, रोटी अरूगावने ल्यावत । रसोई में श्री राज आरोगत, ए ल्यावत कोमल चित ॥६१॥
दाऐं बाऐं बैठत, खरगो हनमन्त भंडारन । श्री बाई जी वस्तां मंगावत, दौड़ ल्यावे दिल दे मन ॥६२॥
सखियां गिरद घेर के, केतिक रहें खड़ी । केतिक सनमुख बैठत, इत ठौर ना कछू रही ॥६३॥
जल अध बीच में, देवे छबील दास । पीक दानी तले धरत, वल्लभ मोमिन खास ॥६४॥
हजूर में हमेसा, दोए रहें पीकदान । ठाढ़े रहें हजूर में, सन्त संकर बड़ा ईमान ॥६५॥
और संकर सामिल, राघव जी रहत । तंबोल प्रसादी लेए के, साथ को पहुंचावत ॥६६॥
संग रहे संकर के, सेवत मुरली धर । पीकदान और मोरछल, करत राज ऊपर ॥६७॥
केसवदास लालदास, दोऊ बाजू बैठत । चौपाई लिखें चित सों, श्री राज को रिझावत ॥६८॥
और साथ केता कहों, दांए बांए बैठन हार । सखीदास ठाढ़ा रहे, सेवा में खबरदार ॥६९॥
मयाराम आवत, ले चिप्पी में चने । समारत सनेह सों, श्री राज आरोगे चुटकी से ॥७०॥
दूध दधि सिखरन, श्री बाई जी अरूगावत कर हेत । आरोग रहे पीछे, बांटने को कवल देत ॥७१॥
ए सेवा लाल बाई की, देत प्रसाद श्री राज । वास्ते सब दुलहिन के, और आवे सबके काज ॥७२॥
आरोग रहे पीछे, धरे रूमाल आगे ये । रामबाई सेवा करे, आरोगे पीछे जे ॥७३॥
हरबाई ठाढ़ी रही, लेके हाथ रूमाल । आरोगे पीछे देत, होत मन खुसाल ॥७४॥
सुपारी गीगा ल्याइया, और देवे मानक । और छबीलदास छबसों, सबसे पहिले दें हक ॥७५॥
और जो तम्बोल को, ले आया प्रहलाद । कल्यान सेवा करत हैं, प्रहलाद के आद ॥७६॥
प्रहलाद के सामिल, रहत हैं संपत । तम्बोल सेवा मिने, ए करत हैं नित ॥७७॥
पान पोंछने को काढ़त, लगाए काथो चूना जुगत । लवंग जावन्त्री जायफल, श्री बाई जी बनावत ॥७८॥
कपूरदानी राखत है, ए जो मुकुन्द दास । अरूगावने बीड़ी मिने, ए मोमिन हैं खास ॥७९॥
बीड़ी वालें श्री बाई जी, देत राज के हाथ । लोंग इलाएची देत हैं, इन बीड़ी के साथ ॥८०॥
महाराजा अरूगावहीं, अपने हाथ तम्बोल । श्री राज रीझ के कहत हैं, कोई नहीं सेवा इन तोल ॥८१॥
पहिले गिरधर सोंनी, सेवा करी तम्बोल की । पीछे छोड़ी इनने, साथ जब खेंच करी ॥८२॥
कस्तूरी को राखत, बेनी दास कोई दिन । श्री राज आरोगत पान में, सेवत है दे मन ॥८३॥
आरोगत आनन्द सों, बातें करत बनाए । सेज समारी पौढ़न की, सखियां सेवन को इत आए ॥८४॥
इत पांवडे बिछावत, पधारत घर मानक । हाथ पकड़ उठावहीं, लछिदास बुजरक ॥८५॥
आसा ले हाजिर किया, गंगादास इत ल्याय । लटके मटके चलत, मीठी बातां करें बनाय ॥८६॥
जब महाराजा आवत, तब हाथ पकड़े ए । दूजी तरफ लालदास को, श्री राज हाथ दे ॥८७॥
फिरती बखत हाथ पकड़े, लेत प्रेमदास लाल । मकरन्द इनके सामिल, सेवत दिल खुसाल ॥८८॥
सेज बिछाई सनेह सों, ए जो द्वारका दास । प्रेमदास दूजी तरफ, और सेवे साथ जो खास ॥८९॥
चारों तरफ बिछाए पांवड़े, परदछना के गिरद । लटके मटके चलत, मोमिन सेवें कर मरद ॥९०॥
संग जुत्थ सैयन के, घेर के चले साथ । गावें बानी श्री राज की, जाके राजें पकड़े हाथ ॥९१॥
सैयां राज रिझावत, बचन मीठे बोल । श्री राज रिझावें सैयन को, कोई नहीं इन सुख तोल ॥९२॥
कबहूं बानी रास की, गावत हैं कर प्रेम । कबहूं ब्रजलीला मिने, कबहूं न लेवें नेम ॥९३॥
कबहूं अरस अजीम को, गावत देकर चित । श्री राज रीझ के तिन पर, बहुत करत है हित ॥९४॥
बाई जी के गादी तकिए, सेवा करती ए । राज आरोग पलंग बैठत, आगे आवें धरने के ॥९५॥
सुख देत सनेह सों, कई भांतों कर हेत । अत मीठी रसना बोलत, धाम धनी सुख देत ॥९६॥
इन समें सनेह की, कहां लो कहों ए सुख । ए तो सैंया जानहीं, कहयो न जाए मुख ॥९७॥
सेज सुरंगी नूर की, अति प्यारी भरी नूर । इन सेवा के लवाजमें, क्यों कर कहो जहूर ॥९८॥
सेवत अत सनेह सों, साथ गिर्दवाए घेर । सखियां गिरद घेर के, चरनों लागें बेर बेर ॥९९॥
लटके मटके चलत, आए बिराजे पलंग । चरनों लाग पीछे फिरीं, श्री जी की अरधंग ॥१००॥
इत दोए पहर पूरन भए, हुआ तीसरे का अमल जब । तिनकी बीतक कहत हों, सुनियो सेवा की विध तब ॥१०१॥
महामत कहे ए साथ जी, ए बात बड़ी बुजरक । एक जरा मैं न कह सकों, लाल कहया गजे माफक ॥१०२॥
(प्रकरण ६५, चौपाई ३८९५)
