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श्री बीतक - प्रकरण ६६ | Beetak prakaran 66

तीसरा पहर

अब कहूं तीसरे पहर की, बीतक जो सैंयन । सो तुम सुनियो नीके कर, दिल के रे कानन ॥१॥

चरना लेके आइया, प्रेमदास पहिनावन । नन्दराम पीछे खड़ा, ले गोटा कनढपी खलीतन ॥२॥

पिउ पौढ़े पलंग पर, सैयां सेवन को सनमुख । मीठी बात रसना सों करें, देत निजधाम के सुख ॥३॥

सेवा अंग परस की, वीरो आन करत । सैयां चरनों लाग के, मंदिर अपनें फिरत ॥४॥

जीजी सिर आगे धरें, श्री राज मारो टपले । पौढ़न बखत पलंग पर, इन समें आन पहुंचे ॥५॥

इन समें राधाबाई, श्री राज के पकड़े हाथ । सिर को खुजलावने, बैठे सेज सेवा के साथ ॥६॥

गुलजी और अगरदास, आवत पांव दाबन । इन सेवा मिने ये, रहते थे मगन ॥७॥

मयाराम इत आए के, बानी सुनावत धाम । श्री राज राजी होए के, सब पूरें मनोरथ काम ॥८॥

तमूरा में तांत सों, गावें जगन्नाथ जुगत । धाम बरनन सुनत हैं, पौंढ़ने के बखत ॥९॥

गजपत गहरा पन सों, गरजत हैं मुख बान । साखी कहवे साख को, ले दरद खड़ा ईमान ॥१०॥

समय सब पौढ़न के, रिझावत हैं राज । अखंड बानी धाम की, जाके गाए होत सब काज ॥११॥

गजपत चरने राज के, तन मन सौंप्या चित । कुरबान हुआ श्री राज पर, पीछे कछू न रख्या वित्त ॥१२॥

चन्द्रावली रिझावत, गाए के पंजाब के बचन । दरद उपजावे दिल को, स्याबास कहिए तिन ॥१३॥

नन्दू नित दोए बखत, गावत आगे पलंग के । तब लों तंबूरा बजावत, जोलों बारी वाले न पहुंचे ॥१४॥

बदले आया गावने, अपने साथ संगी ले । संभु स्वर पूरत, और सन्त दास सेवे ॥१५॥

बखतावर अमृत कुण्डली, सम्पत सेवे सनेह । गावत हैं अत हेतसों, श्री राज रिझावें ॥१६॥

बानी मेरे पीऊ की, गावत अति रसाल । सुनते सुख उपजे, होत दिल खुसाल ॥१७॥

साथ फेरे सब अपनो, इत बानी सुनन का दाव । श्री राज सुने सनेह सों, दिल में बड़ी चाव ॥१८॥

और भी साथ सुनत हैं, जान धाम धनी सों नेह । प्यार करें पिउ तिन सों, राखत बड़ा सनेह ॥१९॥

अब कहों गावन की, जो बारी में गावें । फिरती फिरती आवत, गाए के रिझावें ॥२०॥

वारी में गावत हैं, चौदह आवत फिरती । कलाम वहदानियत के, वहीयां जो उतरी ॥२१॥

ये कलाम रब्बानी, जो सुने रसूल अलेहु सलाम । तीस हजार जाहिर किए, तीस हजार जो लिखे कलाम ॥२२॥

और तीस हजार कानों सुने, पर चढ़े नहीं फुरमान । सो हरफ सिफायत के, जो मुहम्मद सुने कान ॥२३॥

सो ए कलाम इत आए के, कहे वास्ते पहिचान । ए दावत कयामत की, ल्यावे खलक ईमान ॥२४॥

जिन बानी गाए से, होत है दीदार हक । ए सिफत महम्मद की, होत है इनसे बुजरक ॥२५॥

ए आठों पहर में, गावत समें समें । एक प्रात मध्यान को, गावत हैं चित से ॥२६॥

और समय चितवनी के, जब रहे दिन घड़ी चार । और संझा समें, मोमिन करें विचार ॥२७॥

और समें पोढ़न के, जब रात जाए पहर दोए । तब गावने बैठत है, ताके नाम कहत हों सोए ॥२८॥

एक बारी बदले की, तहां संग संभु गावन हार । कबहुंक थानू बैठत, करे सन्तदास मनुहार ॥२९॥

और सामिल गावहीं, ए जो बखतावर । अमृत कुण्डली गावहीं, बानी सुन्दर वर ॥३०॥

और दूसरी बारी मिने, मना और रतनी । असाई भागो धन बाई, सब वारी रिझावे अपनी ॥३१॥

और तीसरी बारी मिने, दयाली गावें । और खिमोती दमोती, जसिया भी आवे ॥३२॥

चौथी में लछो आवत, संग असाई मना । और सब हाजिर रहें, जान राज अपना ॥३३॥

जहूरा गौरी बारी मिने, गावत बाई प्रेम । खेम बाई सामिल रहें, गुलो गावें लिए नेम ॥३४॥

सब की बारी मिने, चन्द्रावली देत मदत । श्री राज रीझत तिन पर, गावने के बखत ॥३५॥

जीजी की बारी मिने, गावत है अगरी । बड़ी जीजी सामिल रहें, और गावत हैं मथुरी ॥३६॥

करमेती के सामिल, गावैं हरखों बाई गौर । लालो रतो लड़ेती, ए गावत हैं जोर ॥३७॥

और लछो ललिता, और सुआ संता द्रोपती । केसर लखमीं आवत, राज बड़ी रीझ करी ॥३८॥

आठमी बारी मिने, हर कुंअर सिरदार । पांखड़ी सूजा कासी, गावत खबरदार ॥३९॥

नवमी जसा की बारी मिने, गावें भीगू चंगाई । वीरो किसनी सामिल, ए गावने को आई ॥४०॥

भागीरथी के भाग में, गावत हैं मोहन दे । लड़ेती लछो सुआ रहे, पटेलन जेंनती के ॥४१॥

और सन्ता गावें सनेह सों, लाली लालो इनमें । अपनी बारी गावहीं, रहे खुसाली सें ॥४२॥

अग्यारमी भानी की बारी मिने, गावे हिमोती गोमा । रामबाई तहां गावत, हक आवत करें उपमा ॥४३॥

खरगो खिमोती रहे, ए गावे अल्ला कलाम । श्री राज रीझ के कहत हैं, इन्हें देओ बैठने का ठाम ॥४४॥

खेमबाई की बारी मिने, गावें साहो हंसों जादी । करमाबाई आवत, रीझ राजें वारी दी ॥४५॥

गुलो की बारी मिने, गावे जान मानवंती । दयंती मनिया गौरबाई, गावत सुख देतीं ॥४६॥

दो पहर की बारी मिने, गावत हैं सिवराम । संझा समें भी सामिल, ए पावत विसराम ॥४७॥

सदानन्दन गावहीं, भाई जो सिवराम । और अमृत कुण्डली, और बखतावर को काम ॥४८॥

बनमाली की बारी मिनें, गावे दो पहर संझा समें । संग सन्ता प्रेम जीजली, राम बाई सूरत से ॥४९॥

ए बारी वाले गावहीं, आठ पहर रात दिन । एह नित सुनत है, खास गिरोह मोमिन ॥५०॥

और आवत हैं बहुत, मढ़े फिरत दोऊ कान । बिना अंकूरे क्या करे, पावें ना सुख सुभान ॥५१॥

नातो बुरा न चाहे कोई आपको, पर ना सुनने ताकत । लज्जत तिनको न आवहीं, तो क्यों कर बैठे तित ॥५२॥

ताबे रहे सैतान के, सो खैंचे अपनी तरफ । दिखावे दुनीय को, तो पावे ना एक हरफ ॥५३॥

जो कदी कानों सुने, काहू की सोहोबत । पर दिल की आंखें फूटियां, ताथें न पावे लज्जत ॥५४॥

ए जिनके ताले लिखे, सो गावे सुने सुकन । जोस फिरे जबरूत लों, नजर लाहूत में मोमिन ॥५५॥

तिनके वास्ते खेल को, बनाया खालक । रसूल को उन इनों पर, भेज दिया है हक ॥५६॥

सुने न कुरान को, इनके कहे न कान । कलाम रब्बानी उतरे, वास्ते मोमिनों पहिचान ॥५७॥

सो वानी सिफायत की, किन वास्ते उतरी । हक मेहर करत हैं, सो मोमिनों दिल धरी ॥५८॥

पांचों चीज बका से, उतरी वास्ते मोमिन । जबराईल जोस धनी का, करत सदा रोसन ॥५९॥

असराफील आइया, नूर मकान से । गावत हैं कुरान को, बैठ बीच मोमिनों में ॥६०॥

करनाइ फूंकन को, देखत है राह हुकम । पीठ कूबड़ी करके, बीच सांस ना लेवे दम ॥६१॥

और हुकम आया हक का, ऊपर करने काम । मोमिनों को खेल दिखाए के, पहुंचावे वतन निजधाम ॥६२॥

उतरी रूहें अरस अजीम से, ए सामिल है पांचे । सब कारज होवे इन से, एक ठौर होए के ॥६३॥

ए सब वास्ते मोमिन के, करत हैं सुभान । सब सिफत लिखी इनकी, इनको दिया ईमान ॥६४॥

भागवत गीता मिने, और वेद वेदान्त । सास्त्र इन वास्ते हुआ, हकें करी सब कर खान्त ॥६५॥

उपनिषद इन वास्ते, बोलत है अद्वैत । सुनत चरचा इनकी, उड़ जात सब द्वैत ॥६६॥

वेद कुरान कहेवहीं, सो कहया वास्ते मोमिन । हकीकत मारफत के, द्वार खोल दिये सब इन ॥६७॥

पैगाम जो उतरे, सो वास्ते मोमिनों के । सब गवाही देवे इनकी, और सिफत कहे ए ॥६८॥

मुकदमा कयामत का, सो इनों वास्ते होए । मुरदे किये जीवते, इनों वास्ते किया सोए ॥६९॥

राह जो इसलाम की, पावे सब खलक । मेहर बड़ी जो उतरी, सो भेजी इन वास्ते हक ॥७०॥

और बाते केती कहों, सब हुआ इन वास्ते । सो तुम जाहिर देखोगे, दिल अपनी नजर से ये ॥७१॥

महामत कहे ए साथ जी, सुनो जिकर सुभान । ए सिफत ईमान की, लाल जिनको भई पहिचान ॥७२॥

(प्रकरण ६६, चौपाई ३९६७)

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