श्री बीतक - प्रकरण ६७
चौथा पहर
अब कहूं पोहोर चौथे की, बीतक जो सैयन । सो दिल के कानों सुनियो, करत हों रोसन ॥१॥
इत एक पहर पिउ पौढ़त, आये सेवन को सब साथ । जल लोटा भर ल्याइया, छबीलदास अपने हाथ ॥२॥
श्री राज कोगला करत हैं, डारत हैं पीक दान । संकर आगे धरत हैं, संग सन्तदास परवान ॥३॥
मानक दौड़े इन समें, हजूर पहुंची आए । ए सब सेवा में सामिल, कछू अरज पहुंचाए ॥४॥
श्री राज रजा देत हैं, आए हजूरी सब । संकर सेवे सनेह सों, मोरछल लिए तब ॥५॥
हजूर हमेसा रहे, ए जो केसव दास । कंचन मूठे मोरछल, सनेह सों सेवा खास ॥६॥
बल्लभ गंगादास जो, रहत हजूर हमेस । निरगुन हो के रहत हैं, माया नहीं लवलेस ॥७॥
बिहारीदास हमेसा, रहे हजूर हक । सब कामों में दौड़त, बड़ी सेवा बुजरक ॥८॥
लालदास हजूर में, मकरन्द इनके साथ । नीमा पहिनाया प्रेमदास, कस बांधे दोऊ हाथ ॥९॥
धरत हैं सिर पर, गोटा पहिनावत नन्द राम । गोस पेंच सिर ऊपर, आये मुकुन्द दास इन ठाम ॥१०॥
दुता सुपेत कंचन का, पहिनावत ऊपर । रामचन्द्र हैं सामिल, सेवा नन्दराम यों कर ॥११॥
पटका कमर सों बांधत, जरी किनारी झलकत । थुरमा ओढ़े कुरती पर, सोभे सुनहरी बूटे इत ॥१२॥
तकिए मखमली ल्याइया, ए जो बिहारी दास । कोई दिन सेवा करी, मिल बन्दे फरास ॥१३॥
मेघा इनके संग रहे, और सुकाली सेवे । गोविन्ददास बदले, और बिसंभर सेवा करें ॥१४॥
भाई बनमाली दास नें, ए जो बनाया तखत । हवाले रहे बिहारी दास के, गादी तकिए धरें इत ॥१५॥
धनजी गावने में रहे, बनमाली दास के संग । तखत कुरसी सेज सेवा, करें सामिल हो उछरंग ॥१६॥
सेज पर से उठके, कोई दिन घर जावे घनस्याम । तहां पांवड़े आगे बिछावत, ए लाल बाई का काम ॥१७॥
और बिछावत किसनी, एक पाँवड़ा जित । फुम्मक चंद्रवा बांधत, मानिक बाई तित ॥१८॥
तिन सेवा के सामिल, गंगादास सोभादास । इन सेवा बराबरी, कोई न पहुंचे खास ॥१९॥
इत हाथ पकड़ के, लच्छीदास ल्यावे । पीछे फिरते हाथ दे, लालदास पहुंचावें ॥२०॥
प्रेमदास चिंता गले लिए, सेवन को सब साज । बातें करें बनाए के, सबे राज के काज ॥२१॥
लटके मटके चलते, आए बैठे गादिए । ए सेवा बिहारीदास की, बिछाई है भर के ॥२२॥
धरे दोऊ बाजू तकिए, ऊपर पाँवड़े चलत । पगथिए चरन धर के, आए कुरसी बिराजत ॥२३॥
चरन पखालनें को छबीलदास, ल्यावत सुन्दर जल । मुकन्द दास खास पखालत, ए सेवत दिल निरमल ॥२४॥
दूजा पखालें प्रेमदास, पीछे केसव रूमाल ले । नारायण ता ऊपर, रूमाल देवें कर सनेह ॥२५॥
दोइ बाजू पिंडुरी, पकड़त बनमाली दास । लालदास सामल, लिए सेवन की दिल आस ॥२६॥
इत चिलमची धर के, बैठत हैं नन्द राम । जल प्रसादी बांटत, संकर को ए काम ॥२७॥
हाथ पखालत हेत सों, छबीलदास रेड़े जल । हाथ पोंछावे रूमाल सों, प्रेमदास निरमल ॥२८॥
अमल आरोगें इन समें, इत छबीलदास देवे । फोफल आरोगन को, मानक ले पहुंचावें ॥२९॥
कुरसी गिरद घेर के, अम्बो और गौरी । और मानवंती मान सों, और गोदावरी ॥३०॥
दुरगी ललिता आइयो, सुआ खिमाई सांम । लच्छी और मन गमता, मातेन जहूर इस ठाम ॥३१॥
और बाजू सखियां खड़ी, कुरसी को घेर के । संकर मथुरा गावत, गंगादास बिहारी झीलें ॥३२॥
कासी हाथ पकड़त, बैठत कुरसी बखत । ओका कलंगी हाजिर करे, जब बैठे श्री राज तखत ॥३३॥
इत बिहार कई भांत के, आवे नहीं जुबान । सैयों को सुख देत हैं, कराए अपनी पहिचान ॥३४॥
बल्लभ छत्र पकड़ के, फेरत सिर ऊपर । हाथ पकड़ उठावत, दास लाल इन पर ॥३५॥
इन तखत के गोफने, बांधत मानक इस ठाम । दोए लाल बाई बांधत, एक बांधत घनस्याम ॥३६॥
मानक सामिल रहत हैं, फूलबाई सुदामापुर से । सो फूलबाई रहत है, सरीख सब सेवा में ॥३७॥
तखत साज सोने रूपे का, राखत हैं बुधसेन । सब सेवा में ठाढ़ा रहे, आवे जाए लेन देन ॥३८॥
सेवा लिखन हार की, स्याही देत बनाए । कूजा भरके पुकारहीं, कोई लेवे जो दिल चाह ॥३९॥
लटके मटके राज चलके, आये बिराजे तखत । केसव संकर ले खड़े, मोरछल इन वखत ॥४०॥
पीछला बाकी दिन, रहया घड़ी चार । धाम वतन चलन की, मोमिन करें विचार ॥४१॥
दोऊ बाजू भरके, आए के बैठा साथ । अरस अजीम पहुंचावने, हकें पकड़ें हाथ ॥४२॥
श्री महाराजा आवत, सब सेवा में शामिल । अत सनेह सों सेवा करें, पाक दिल निरमल ॥४३॥
जो सेवा सकुण्डल करी, अपने तन मन धन । अपना तन धन सोंप्या, तो कहया अमीरूल मोमिन ॥४४॥
अरस की निमाज का, आए पहुंचा बखत । गोकुल अरज करत हैं, सामें होए तखत ॥४५॥
हम को इन खेल से, सिताब काढ़ो श्री राज । भए मनोरथ पूरन, रहया ना कोई काज ॥४६॥
श्री धाम धनी सुनत हैं, ए बानी जो मकबूल । द्वाए जो मोमिनों की, होत है कबूल ॥४७॥
अरज करी एक भांत साथ नें, कई भांत धनी दिए सुख । खेल समेत बैठाए के धाम में, दोऊ ठौर धन धन किए सनमुख ॥४८॥
खास ढाल तलवार जो, दई पहिले मुरलीधर । कोई दिन भिखारी दास, कोई दिन गिरधर रहे पकर ॥४९॥
फेर दई लालदास को, सन्तदास खड़ा रहे ले । कबहूं दूजा भिखारी दास, पीछे बुध सेन करे ॥५०॥
सूरत सिंह राखत हैं, तरकस तीर कमान । बरछी घनस्याम राखत हैं, करे खिजमत रेहेमान ॥५१॥
श्री बाई जी पठे देत हैं, हाथ मकरन्द के । श्री राज के वास्ते भूषन, ल्यावत है नित ये ॥५२॥
रकेबी रूपे की, भर ल्याए भूखन । महाराजा पहिनावत, लिए पकड़े हाथ मोमिन ॥५३॥
माला दो मोतिन की, और उतरी कंचन । दोए सांकली सोने की, झलकत हीरा रोसन ॥५४॥
दुग दुगी दो जड़ाव की, करे मानक जोत अपार । महाराजा पहिनावत, ताकों क्यों कर कहूं सुमार ॥५५॥
चन्द्रहार झलकत, चंपकली सिर नूर । कण्ठी पर कण्ठी सोहे, सो क्यों कर कहूं जहूर ॥५६॥
मोतिन की कण्ठी बनी, तले मोती ऊपर मानक । चौखूना सोने मढो, सोभित है कण्ठ हक ॥५७॥
गिरद चन्द्रिका कमल ज्यों, लटकत पाग ऊपर । सिरे मोती लटकत, धरे हीरा जोत सिर पर ॥५८॥
महाराजा पहिनावत, पोहोंची बांधी इन ठाम । हीरा मानक झलकत, ए महाराजा का काम ॥५९॥
और अंगुरियों मुंदरी, आगे सब धरी । माफक बैठत अंगुरी, सो अंगीकार करी ॥६०॥
महामत कहे ऐ मोमिनों, ए चौथे पहर की विरत । अब कहूं पोहोर पांचमां, सुनियो तन मन हित ॥६१॥
(प्रकरण ६७, चौपाई ४०२८)
