श्री बीतक - प्रकरण ६८
पांचमा पहर
अब कहूं पहर पांचमा, आया जब बखत । हुआ समें बैठन का, ऊपर इन तखत ॥१॥
लच्छो अरज करत हैं, राज पधारो कौन घाट । श्री राज उत्तर देत हैं, आज पधारें पाट ॥२॥
तखत बिछौने होत हैं, बिछावत बिहारी दास । तलाई ओछाड़ सूजनी, तकिए धरे मखमली खास ॥३॥
इत जोड़े तखत के, गादी बिछौने होए । चारे गमा ते तान के, बिहारी दास धरें सोए ॥४॥
दीपक सेवा में खड़ी, मानक करमेती । श्री राज को रिझावत, सब विध सुख देती ॥५॥
सुखपाल में बैठ के, श्री बाई जी आवत । अरज आरोगन की, मीठी बातें करत ॥६॥
इत थाल आरोगन की, ल्याई मथुरी और हिंमत । साक तरकारी कटोरी, लेके आगे धरत ॥७॥
श्री महाराजा बाई जी, बैठत अरूगावने थाल । हाथ पखालत प्रेम सों, मानक सेवा करें खुसाल ॥८॥
हाथ पोंछने को दिया, रूमाल श्री महाराज । एक मुंह आड़े अपने बांध के, अरूगावत श्री राज ॥९॥
आरोगत अत हेत सों, सो कहां लो कहों मैं ए । राज भोग सामग्री लवाजमें, सब साक तरकारी के ॥१०॥
इत रूमाल आड़े डार के, सेवे बिहारी दास । सखियां सब ठाढ़ी रहे, मन में सेवन की आस ॥११॥
थाल ले आगे धरी, बैठे पकड़ महाराज । मीठी रसना सों बातें करें, रीझ रीझ के राज ॥१२॥
आरोगत अत हेत सों, बातें करें बनाए । धाम धनी गाए रिझावहीं, कवल देत हैं ताए ॥१३॥
बाई जी बातां करत है, आरोगने के बखत । श्री राज रीझ के कहत हैं, ऊपर बैठ इन तखत ॥१४॥
जल छबील दास ल्याइया, आरोगने को हक । कंचन कटोरे सुन्दर, जल बाए देत माफक ॥१५॥
कोई वस्त अरूगावने, मसाला ल्यावें घर से । मेवा मिठाई पकवान, राज हेत कर आरोगते ॥१६॥
श्री राज रहे आरोग के, सैयां उठाई थाल । चुल्लू करावें चोपसों, सकुण्डल दिल खुसाल ॥१७॥
कहवा आरोगने को, ले आई मानक । भरके देवे हाथ में, ए जो गंगादास बुजरक ॥१८॥
फूल सुपारी बीड़ी मिनें, अरूगावे कल्याण । ऐ सेवा श्री बाई जी की, दई सेवक अपना जान ॥१९॥
बीड़ी वालत श्री बाई जी, महाराजा अपनी । दे सुपारी मानक छबीला, और सेवत महारानी ॥२०॥
हार कलंगी आवत, ऊपरा ऊपर इत के । ले ले नाम मुजरा होत हैं, होए जुबां एक एक के ॥२१॥
संभू ओका जसिया, ल्यावत हैं कलंगी । श्री राज हाथों धरत हैं, सेवा अंगीकार करी ॥२२॥
महाराजा कलंगी बनावत, अपने हाथों कर । बांधत लटकनी छब की, हाथों हाथ धरें सिर पर ॥२३॥
मुकुन्द दास ले आवत, तुर्रा कलंगी परन । श्री राज सिर पर धरत हैं, झलकत है किरन ॥२४॥
महाराज के रावर से, आवत कलंगी हार । चित माफक अपने सोभित, दे महाराजा अपने लार ॥२५॥
कहा कहों इन समें की, जहां राज बिराजे तखत । आई जी मोरछल करत हैं, सो कहयो न जाए बखत ॥२६॥
महाराजा मोरछल लिए, दोऊ बाजू चंवर ढुराए । सेख बदल लाल खान, हाथ फेरत चमर बनाए ॥२७॥
कबहूंक पीठ पीछे होए के, लाल केसव करे अरज । कुरान हदीसां वास्ते, रहे पढ़नें की गरज ॥२८॥
चितवनी की बारी मिने, भोग दियो बखत इन । गावत संझा को अवसर, पहर रात लो रोसन ॥२९॥
मना अरज करत हैं, बस्तर सुनने की । सो राज मोसों कहो, मैं हाजिर ना थी ॥३०॥
साड़ी रंग सेंदुरिएँ, स्याम जड़ाव कन्चुकी । नीली लाहिको चरनियां, ए बस्तर ठकुरानी जी ॥३१॥
चीरा रंग सेंदुरिया, जामा सुपेत जवेर तार । पछेड़ी रंग आसमानी, देख परवरदिगार ॥३२॥
नीले पीले रंग को, पटका बांधो कमर । केसरिया रंग इजार है, ल्यो मूल बागों दिलधर ॥३३॥
आज निरत नवरंगबाई को, साड़ी जड़ाव स्याम । आंबा रस कंचुकी, पांच पटे चरनियां इस ठाम ॥३४॥
पहिनी इजार नीली, ए बस्तर बाई निरत । और सिनगार सब साथ को, स्यामा जी माफक देखत ॥३५॥
ए बस्तर सब साथ को, कहते बखत दोए । एक प्रात और संझा समें, साथ सुनत हैं सोए ॥३६॥
सरूप दाता ब्रह्मांड में, भए हैं दो तीन । सो लिखे सास्त्रों मिने, जो ल्याए आकीन ॥३७॥
सो सरूप बैकुण्ठ का, जाए कहया मलकूत । कहने वाले फिरस्ते, जिनका ठौर जबरूत ॥३८॥
ए सूरत अरस अजीम की, जाय कहया अक्षरातीत । कहने वाले धाम धनी, सुने मोमिन कर परतीत ॥३९॥
नेष्टाबन्ध सुनत हैं, जाए सांच होवे कान । पांव हाथ अंग इन्द्रियां, होए हक की ताए पहिचान ॥४०॥
दूसरा कोई इत आए के, कबूं न बैठ सकत । काहू खुसामद गरज आवही, पर मिने न पेठ सकत ॥४१॥
ए तो बात अंकू्र की, होए न बिना सनमंध । जो दुनियां को देखहीं, ताए कहया बड़ा अंध ॥४२॥
जब कलाम रब्बानी खुले, तब हुआ वखत कयामत । तब लगा रोजगार को, है बड़ा कम हिंमत ॥४३॥
आया समें आरती का, साथ आवत चारों तरफ । इन समें सोभा की, कहयो न जाए हरफ ॥४४॥
श्री बाई जी आवत इन समें, होत बिछौने जोड़े तखत । गादी तकिए बिहारी दास, बिछावत हैं इत ॥४५॥
आरती होत आनन्द सों, करत अति घने प्यार । सोभा होत संसार में, करत सबे मनुहार ॥४६॥
झांझ ताल थैली मिने, ए दगड़ा राखत । आरती समें ल्यावत, भाखरिया नाचत ॥४७॥
दोऊ बाजू चंवर ढोरत, लालबाई पहिले । गोबिन्द दास करता था, कोई दिन सिवराम के ॥४८॥
हरनन्द कोई दिन, सेख बदल लालखान । आखर आई इन पे, जिनका था ईमान ॥४९॥
गावे गवावें साथ को, ए सेवा मुकुन्द दास । आरती में आए खड़े, होत नित बिलास ॥५०॥
बिन्दा कन्नड़ गावहीं, और गंगा राम । अगरदास आनन्द सों, बद्री दास इन काम ॥५१॥
कबहूं उत्तमदास आवहीं, बजावत हैं मृदंग । झांझ ताल बजावत, केतिक सैयां इन संग ॥५२॥
गावने में आगे खड़ा, परमानन्द प्रवीन । भाव दिखावत भेद सों, आया कूवत माफक आकीन ॥५३॥
साथ सबे खड़े रहें, भरके बाजू दोए । झांझ मृदंग बजावत, आनन्द अजीम होए ॥५४॥
सुन धुन इन समें की, कांपत कुली दज्जाल । ए नेहेचे मोकों मारेगा, ऐही मेरा है काल ॥५५॥
मेघा गादी बिछावत, श्री बाई जी के कदम तले । जब आरती करत हैं, श्री बाई जी खड़े ऊपर इनके ॥५६॥
आरती के बखत में, चादर बिछावत हीरामन । चावल बधावत श्री बाई जी, सब आरती वाली सैयन ॥५७॥
श्री बाई जी करें तिलक, चौड़त हैं चावल । राघव रूमाल धरत है, करे सेवा अपने बल ॥५८॥
आरती करें आनन्द सों, श्री बाई जी इत आई । ए सेवा की जोगबाई, साज रूकमनी ल्याई ॥५९॥
रूपे पच घड़ी आरती, गिरद दीपक जोत बतीस । करे फिरते प्रकास चहुंदिस, सेवत मन परतीत ॥६०॥
और आवत करने आरती, लच्छो इन समें । दीपक जोत प्रकास के, कोई दिन हुई सेवा इनसे ॥६१॥
और अंबो करे आरती, सामिल दूजी तरफ । एक बाजू महतेन खड़ी, और भानी एक तरफ ॥६२॥
और कई कुमारिका, लिए दीपक थाली हाथ । झलकत जोत चहुं दिस, करे बाई जी ऊपर साथ ॥६३॥
कंचन थाल चहुं मुख दिवला, दीपक जोत प्रकासी । करत आरती जियावर रानी, आनन्द अंग उलासी ॥६४॥
जुगल सरूप सुन्दर सुखदायक, स्याम धाम धनी सोहे । मंगल रसिक बदन की सोभा, निरखन्ता मन मोहे ॥६५॥
सखियां निरत करें और गावें, आनंद अखंड अपार । ताल मृदंग झांझ जन्त्र बाजे, सखियां बोले जै जै कार ॥६६॥
बधावें मुक्ताफल सखियां, श्री जियावर स्याम सुहागी । तन मन जीव निछावर कीन्हों, श्री इन्द्रावती चरणों लागी ॥६७॥
रूकमनी थाल धरत हैं, श्री राज के आगे । कर पसार बीड़ा धरें, करे मेहर धाम धनी ए ॥६८॥
और सबकी थाली में, डारत है बीड़ी ये । सेवा कल्याण प्रहलाद की, नित आवे करने के ॥६९॥
इन भांत नित आनन्द, होत है बंगले में । कई खलक आवे दीदार को, सुन कायमी पावे इनसे ॥७०॥
इत धुन सूरज मन, करे आरती बोध । श्री धाम धनी जियावर के, नाम लेत भागे बिरोध ॥७१॥
एही अक्षरातीत है, एही हैं धनी धाम । एही महम्मद मेहंदी ईसा, एही पूरे मनोरथ काम ॥७२॥
इन भांत कई गावत, होए के मन मगन । कई साथी संग गावत, साथें सूरज मन ॥७३॥
इन भांत आरती समें, कई विध होत कलोल । हैं गए बंगले ना सुनात, कोई सुख नाहीं इन तोल ॥७४॥
एक पहर रात लों, होत है ए मनुहार । कोई आवत कोई जात है, कहां लों कहूं प्रकार ॥७५॥
सिंहासन बाई जी, जुगल सरूप सोभाए । आनन्द सरूप सुतेज को, कहां लों कहूं बनाए ॥७६॥
महामत कहें ऐ साथ जी, भया चरचा का वखत । अब तुम सुनियो चित दे, लाल आगे आए बैठे इन तखत ॥७७॥
(प्रकरण ६८, चौपाई ४१०५)
