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श्री बीतक - प्रकरण ६९

छठा पहर

अब कहों पहर छठे की, जित चरचा होत है हक । बैठे सुंनत जमात, जो खास गिरोह बुजरक ॥१॥

साथ सबे बंगले मिने, बैठे होए सनमुख । केसव दास बानी पढ़ें, कहयो न जाए ए सुख ॥२॥

कुरान हदीसां बांचने, बैठत है दास लाल । गोकुलदास पढ़त हैं, करने राज खुसाल ॥३॥

इत चरचा होत है चोपसों, बरखा होत अद्वैत । रसना मीठी सों कहें, उड़ जात सब द्वैत ॥४॥

मुरलीधर सम्मुख बैठत, पलक न मारत नैन । मुख सों मुख सनमुख, श्रवण सुने मुख बेन ॥५॥

एक बाजू श्री महाराजा, और देवकरन जी साथ । और दुरगभान पीछल, जाके धनीएं पकड़े हाथ ॥६॥

और चन्द्रहंस आवत, और साह रूप । देत श्रवना कहते, सरूप सुन्दर रूप ॥७॥

और किसोरी आवत, बैठत चरचा में । झाडू देत बंगले मिने, सोहबत देवकरन सें ॥८॥

अमानराए परबत सिंह, और नारायन दास । और सकत सिंह आवत, और जगत सिंह खास ॥९॥

हमेसा दुरगभान के, लोंगे आवत दोए । एक रुपैया रसोई को, पहुंचावत है सोए ॥१०॥

तुलाराम सेवा मिने, आवत दरसन को जब । प्रणाम करके बैठत, चरचा सुनत है तब ॥११॥

प्रेम जी पीताम्बर, और मकुन्ददास । गोकुल केसव बैठत, और जेनती खास ॥१२॥

और सूरतसिंह मकरन्द, और मोंनी गिरधर । भगवान सिवराम सदानन्द, और बैठे गिरधर योंकर ॥१३॥

और सेख बदल बैठत, और लाल खान । मिहीन पठान बैठत, और अव्वल खां सुने कान ॥१४॥

और नूर महम्मद, और चंचल दयाराम । गुल जी नाथा ठाड़ा रहे, पावें चरचा में आराम ॥१५॥

टेकचन्द भली भाँत सों, और दुन्द राए । पोहोकर दास भी आवत, गोविन्द राए बैठत आए ॥१६॥

केसवदास मोदी बैठत, बैठे दूजा मुरलीधर । इहाँ महावजी नित आवत, मोहन दास बैठे इन पर ॥१७॥

मूल जी मामा बैठत, और काका बैठनहार । सन्‍त दास सेवा मिने, गंगा राम बैठे खबरदार ॥१८॥

और घनस्याम बैठत, कबूं नाहना भी आवत । छतई भी सुनत है, और सुकदेव बैठत ॥१९॥

और निरंजन नरसिंह दास, बैठे मके साहमन । सिंघ घासी ब्रजभूषण, और धना सोहबत इन ॥२०॥

वीर जी मोदी आवत, और लच्छी सुकल । मिडई नित चरचा सुने, बिन सुने न पड़े कल ॥२१॥

बिहारी फरास आवत, और बिहारी झंडूला । दूर खड़ा सुनत है, भगवान कलाम अल्ला ॥२२॥

मामा बनमाली दास आवत, और बैठत धन जी इत । लालमन और संकर, और नारायन बैठत ॥२३॥

मथुरा कासी आवत, खड़ा रहे बल्‍लभदास । सन्तदास हजूर में, परसादी मोमिन खास ॥२४॥

और असऊ बैठत, अगर दास आवत । सुने दूर बैठा गोवरधन, छबील दास बिन्दा बैठत ॥२५॥

भिखारीदास बैठत, और मया राम । बेनीदास आवत, सोभा दास विसराम ॥२६॥

गजपत गरीबदास जो, और देवी दास । थानू बदले सुनत, और संकर रसोइया खास ॥२७॥

स्यामजी सुनत हैं, और बैठे चंपत । सुख चैन खरग देऊ, और मुरली आवे इत ॥२८॥

और साथी केतिक, आवे नेष्टा बंध । कोई आवे मरजाद में, कोई परवाह की सनंध ॥२९॥

कोई सुनत है पुष्ट में, कोई सुने मरजाद । कोई परवाह में कान दे, ए सुनने की बुनियाद ॥३०॥

कोई ग्रहत है पुष्ट में, कोई ग्रहे मरजाद में । कोई परवाह में लेत है, ए बीतक कही इन सें ॥३१॥

एक पांव भरें पुष्ट में, दूजे मरजाद में कदम । एक परवाह में पांव भरें, यों सोंपी आतम ॥३२॥

यों एक एक के तीन तीन, तिन तीनों के नव । फेर बांटे तीन बेर, सताईस कहो ॥३३॥

फेर के बांटे तीन बेर, ताके इक्यासी भए पख । और पच्चीस पख ब्रह्मसृष्ट के, कहें उन ऊपर अलख ॥३४॥

ए पच्चीस की बात बड़ी, जिन नजर लाहूत पर । सो हिसाब में न आवहीं, कहों सैयों की खातिर ॥३५॥

तामें सात घाट धाम के, और जमुना जी पुल दोए । दसों भोम मोहोल राजत, देखो साथ तुम सोए ॥३६॥

और महल चौबीस हांस को, बड़ी नहरें और जोए । और तालाब मानक, चार हार हवेली होए ॥३७॥

चारों तरफ सागर के, और जिमी के होए । मोहलात बड़ी रांग की, गिरदपाल कही सोए ॥३८॥

और आठों सागर, और पहाड़ पुखराज । जमुना जी इहां प्रगटी, ए बेवरा करत हैं श्री राज ॥३९॥

जहां पटी महल खुली चली, मरोर खाया और । इन दरम्यान कई भांत हैं, सब कहें है ठौर ॥४०॥

ए चरचा नित होत है, भोम कही अद्वैत । पच्चीस पख में सब है, उड़े सुनते द्वैत ॥४१॥

श्री राज और स्यामा जी, ए दोनों जुगल किसोर । रूहें रहें दरगाह में, ए तीनों एक सरूप न और ॥४२॥

लखमी जी और भगवान जी, ए दोनों एकै अंग । ए हैं अंग श्री राज के, ए पांचों अद्वैत एक संग ॥४३॥

और भगवान जी की दृष्ट से, कई कोट उपजे इण्ड । पल फिरे उड़त है, त्रिगुण समेत ब्रह्माण्ड ॥४४॥

अक्षर आवें मुजरे को, श्री धाम धनी के दीदार । मुजरा कर पीछा फिरें, रिझावें परवरदिगार ॥४५॥

जहां राज के दिल में, इस्क रब्द कारण । खेल दिखाए बेवरा किया, देखो मिल मोमिन ॥४६॥

चाह करें खेल देखनें, मैं बरजे बेर तीन । तुम भूलोगे तहकीक, रहे न काहू आकीन ॥४७॥

तब रब्द करें मुझसों, मेरे कहयो न माने कोए । तब सुपन दिखाऊंगा, इनों पें मंगाए के सोए ॥४८॥

अक्षर को इच्छा भई, रूहों कैसा इस्क । प्रेम परवरदिगार सों, क्यों रहे साथ हक ॥४९॥

तब हुकम कुदरत मलकूती, भई दीदार चाह जो इन । किन बिध नूर जमाल मोमिन, नूर सिलसिले से उपजा तिन ॥५०॥

तब रूहों के दिल उपज्या, हम खेल देखें भगवान । मांगे आज राज पे, हमें कब होए पहिचान ॥५१॥

हम आपस में रब्द करके, आइयां पासे हक । हमें खेल देखन की, रहे बड़ी चाह बुजरक ॥५२॥

बहुत बरज्या इनको, फेर फेर तीन बेर । बहुत चाह जब देखिया, उतारी बीच अंधेर ॥५३॥

पहिले हुकम भगवान पे, हुआ एह सुपन । उतारी रूहें तिन में, आइयां खेल देखन ॥५४॥

पहिले आए ब्रज में रहे, अग्यारे बरस बावन दिन । ता पीछे पहुंचे वृन्दावन, एक रात रोसन ॥५५॥

तित तुमको इच्छा रही, तो आए तीसरी बेर । इन्ना इनजुलना सूरत, तुम वास्ते उतरी खैर ॥५६॥

रसूल आए तुम वास्ते, धरी जुदी तीन सूरत । ए खेल तुम खातिर किया, फरदा रोज कयामत ॥५७॥

पांच चीजें बका से उतरी, सो तुमारी खातिर । हुकम आया तुम पर, ले फिरस्तों का लसगर ॥५८॥

जबराईल जोस धनी का, करे तुमारी वकालत । तुमको साफ राखहीं, कहूं पैठ न सके इल्लत ॥५९॥

असराफील आइया, अपनी फौज बनाए । सूर फूंका संसार में, कलाम रब्बानी गाये ॥६०॥

रूह अल्ला आए तुम पर, तिन पहिने जामें दोए । रूहों तुमको खेल में से, ढूंढ़ काढ़े सोए ॥६१॥

अरस अजीम के सुकन, जिनसों होए सिफायत । दीदार होए हक का, सो तुम वास्ते ल्याए इत ॥६२॥

सो तो सागर सुख के, बरनन करत हैं जेह । विचार जिनको विवेक, दिल श्रवना देत हैं तेह ॥६३॥

सातों सरूप स्याम के, बरनन करत श्री राज । साथ को सुख उपजावहीं, पूरें मनोरथ काज ॥६४॥

बरनन करते धाम को, परदक्षना पुखराज । अहिनिस केल करत हैं, संग सैयां श्री राज ॥६५॥

सातों घाट पधारते, श्री ठकुरानी जी संग । खेलें सब सैंयन सों, श्री धाम धनी अरधंग ॥६६॥

दोनों पुलों पधारत, कुंजबन मंदिर । जमुना जहां मरोर खाए के, आए ताल मिली यों कर ॥६७॥

हौज दिखावत हेत सों, और चारों घाट । टापू बरनन करत हैं, एक हीरे को सब ठाट ॥६८॥

गिरद ताल के बन भला, आगे पहाड़ मानक । बीच महल खेलन का, जहां खेलत हक ॥६९॥

चौबीस फुहारे बीच में, परे चौबीस गुरजें । तासों परे चौबीस चादरें, गिरद परे कुण्डें ॥७०॥

धनी मानक पहाड़ को, कर देत बरनन । जहां हिंडोले दो पहाड़ बीच, सुन सुख पावें मोमिन ॥७१॥

जित फिरती हवेलियां, चौखूनी गिरदवाए । बारे हजार मंदिर हर एक में, फिरते बड़े दरवाजे आए ॥७२॥

मानक पहाड़ से दछिन, नदी निरमल नीर । ताकी सिफत कह दिखावहीं, जल उजल खुस्बोए खीर ॥७३॥

दोऊ बाजू देहुरे बने, बड़ी हीरे की पड़साल । सुन सैयां कामिल, होत अति खुसाल ॥७४॥

जहां राज रमत हैं, बन की जो मोहलात । अत सुन्दर सोभा देत है, सो क्यों कर कहों विख्यात ॥७५॥

अत ऊंची है अलंग, गिरदवाए फिरती । चार हार मोहोल बनें, याकी सोभा कहों केती ॥७६॥

आठों सागर ए कहे, जहां रमन की ठौर । टापू बेट बिराजत, कहयो न जाए मरोर ॥७७॥

और बानी कई भांत की, कह समझावत सब साथ । साथ अब कोई धाम में, पकड़ बैठाए हाथ ॥७८॥

ए लीला केती कहों, रात होत पहर दोए । कोई समें तीन जात है, चरचा कहि समझावे सोए ॥७९॥

श्री राज पौढ़े पलंग पर, गादी तकिए उठावें ये । बिहारी दास संग नाथा रहे, और साथी सामिल सेवा के ॥८०॥

महामत कहें ए सैंयनों, ए छठे पहर की बीतक । अब कहों पहर सातमां, जैसी सोहोबत हक ॥८१॥

(प्रकरण ६९, चौपाई ४१८६)

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