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श्री बीतक - प्रकरण ७

साल नव सै नब्बे मास नव, हुए रसूल को जब । रूह अल्ला मिसल गाजियों, मोमिन उतरे तब ॥१॥

सम्वत सोलह सै अड़तीसा, आसो सुदि चौदस में । जनम दिन श्री देवचन्द्र जी, प्रगटे इन समें ॥२॥

देस मारवाड़ में, उमरकोट है गाम । मतू महता कुंवरबाई, श्री देवचन्द्र प्रगटे इस ठाम ॥३॥

तहां से आए कच्छ देस में, बीच महम्मदें दिया दीदार । पहुंचाय मजल को, किए खबरदार ॥४॥

कच्छ देस में आय के, खोज बड़ी करी । जब भोजनगर आय पहुंचे, तब वही इलाही उतरी ॥५॥

हरवंस जी हरिदास के, रहे कोइक दिन । ता पीछे नौतनपुरी, सुना भागवत होय मगन ॥६॥

चौदह वर्ष लों नेष्टाबंध, बचन ग्रहे सब सार । चालीस वर्ष की उमर में, हकें दिया दीदार ॥७॥

सुनत भागवत देहुरे, तहां कहा तारतम । तुम आये हो अरस से, जगाओ अपनी आतम ॥८॥

तुम आए ब्रज रास में, फेर तुम आए इत । रही खेल देखन की, तुमको इच्छा तित ॥९॥

तिस वास्ते इंड तीसरा, रचा तुम कारण । ए भागवत तुम को खुले, तुम ही करो रोसन ॥१०॥

बुलाय ल्याओ सैंयन को, अपने वतन निजधाम । इनको इत जगाय के, पूरो मनोरथ काम ॥११॥

मोको फेर न देखोगे, इन भाँत इन नैन । अन्दर तुम्हारे आऊंगा, पूछ लेओ अब बैन ॥१२॥

हुकुम हक सुभान का, मूल श्री देवचन्द्र जी पर । ए जो खेल देखन को, साथ धाम से आए उतर ॥१३॥

तिनको बुलावने, मैं भेजे तुम को । खेल से जगाय के, प्यार करों इन सों ॥१४॥

सम्वत सौलह सै अड़तीसे, आसो सुदि चतुर्दसी के दिन । प्रगटे देस मारवाड़ में, गांव उमरकोट उतपन ॥१५॥

सम्वत सत्रह सै बारोत्तरे, भादों मास उजाला पख । चतुर्दसी बुधवारी भई, हुए धनी अलख ॥१६॥

बरस चौहत्तर में, न्यून भया एक मास । तब सौंप चले श्री मेहेराज को, उमत खासल खास ॥१७॥

सम्वत सोलह सै पचोतरा, भादो वदि चौदस नाम । पहर दिन चढ़ते बार रवि, प्रगटे धनी श्री धाम ॥१८॥

सम्वत सत्रह सै इक्यावना, सावन वदि चौथ में । रात पीछली घड़ी दोय में, आया फिरस्ता धाम सें ॥१९॥

तीज भई रात घड़ी चौद लों, उपरान्त चौथ भई जब । दोय घड़ी रात बाकी रही, समय अन्तर्ध्यान को तब ॥२०॥

बार था इत सुकर, रहे इत एक दिन । ता पीछे मंदिर मिने, पधराए मोमिन ॥२१॥

बरस छेहत्तर में, कम दो मास दस दिन । देखा खेल यहां लों, फिरे तरफ वतन ॥२२॥

साथ सौंप्या आप श्री राज को, जाहिर में श्री महाराज । अब हम फिरत धाम को, तुम रहो सावचेत आज ॥२३॥

महाराजा जी सों कहा, मैं देखत हों एक तुम । तिस वास्ते सेवा साथ की, सौंप चलत हैं हम ॥२४॥

अब हुकुमें द्वारा खोलिया, लिया अपने हाथ हुकुम । दिल मोमिन के आय के, अरस कर बैठे खसम ॥२५॥

अब साथ अगले और बीच के, और आखर की बीतक । सो सब जाहिर होत है, कहावत हुकम हक ॥२६॥

(प्रकरण ७, चौपाई ३६७)

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