श्री बीतक - प्रकरण ७०
सातमा पहर
अब रात पहर दो गई, पोहोर चार दिन दो रात । उपरान्त पोहोर सातमा, कहों ताकी विख्यात ॥१॥
इन समें सेज समारत, नारायन द्वारका दास । गंगादास परमानन्द, और सेज समारत खास ॥२॥
इत साज समारत, ए जो दोए पलंग के । एक पर बैठें एक कोतल, सोभा कही न जाए ते ॥३॥
चार पाए अत सुन्दर, नूर भरे अत प्यार । इस उपले नूर के, ताको क्योंकर कहों बिहार ॥४॥
पचरंगी पाटी भरी, अत नरम सुखदाए । तापर तलाई सोभित, तापर चादर बिछाए ॥५॥
अत सुन्दर सेज बन्ध, जुगतें बांधे चारों पाए । पांचों रंग रेसमी झलकत, सुन्दरता सुख दाए ॥६॥
सिराने गाल मसुरिए, कहां लों कहूं बनाए । चारों डांडे नूर के, ऊपर छत्री गिरदवाए ॥७॥
झालर झलके नूर की, ऊपर छत्री घेर । ए जो सोभा सेज की, क्यों कर कहों इन बेर ॥८॥
सेज बिछाई सनेह सों, फेरत ऊपर हाथ । जिन तिनका कोई रहे, बिसंभर सेवे इन साथ ॥९॥
आए आगे अरज करी, सेवे बल्लभ दास । घड़ी घड़ी पोहोर पोहोर, सुनावें धाम लीला खास ॥१०॥
आनके अरज करी, घड़ी पहुंची आए । धाम धनी याद कीजिए, समया पहुंचा धाए ॥११॥
अरज करे सेज की, गंगादास इन काम । समें भया पौढ़न का, राज पधारो इस काम ॥१२॥
चरचा में चित रहे, स्वाद धाम बरनन । सब श्रवना देत सनेह सों, खास गिरोह सैयन ॥१३॥
सवाल करे कोई बीच में, ताको दे उत्तर । फेर चरचा तिन पर होत है, रस घटे न क्यों ए कर ॥१४॥
इन समें कोई आयत, लालदास ल्यावत । फेर सुने चित देय के, पौढ़ने की अरज करत ॥१५॥
जेनती इत आए के, बीच में करें अरज । बातें गिरोह की सुनी होए, ताको उतारें फरज ॥१६॥
गोकुलदास इत आए के, ल्यावत हदीसें । केसवदास पढ़त हैं, हदीसां इन समे ॥१७॥
साथी सब सेवन के, रहे गिरदवाए घेर । फेर फेर अरज होत है, अब बहुत हुई है बेर ॥१८॥
साथ सबे इन्तजार खड़े, श्री जी आप करें झेर । चरचा के सुख वास्ते, सब मोंगे रहे फेर ॥१९॥
यों करते आधी पर, घड़ी दोए चार बितीत । फेर के अरज होत है, कहें उठत हैं ल्याओ परतीत ॥२०॥
जब महाराजा होवहीं, देवें चरचा में श्रवन । कोई न बोलें इन समें, साथ चरचा के आधीन ॥२१॥
श्री बाई जी इत बैठत, करत इसारत साथ । बेर भई अबेर, क्यों ना छोड़ो किताब हाथ ॥२२॥
श्री राजें देखा साथ सामनें, हुए उठने को तैयार । तब सरूप बरनन धाम का, दिखाया परवरदिगार ॥२३॥
तुम सुरत राखो धाम में, श्री राज पौढ़ने की ठौर । इन समें अपने सरूप को, याद ल्याओ न और ॥२४॥
सरूप बरनन सनेह सों, करत साथ पर प्यार । इन समें को सुख क्यों कहूं, जो करते थे मनुहार ॥२५॥
इत वल्लभ अरज करत हैं, श्री धाम धनी की वृत । संझा से आधी लग, कहता कोमल चित ॥२६॥
श्री राज उठत इन समें, पधारत घर मानक । हाथ पकड़ उठावत, गंगादास बुजरक ॥२७॥
एक तरफ लालदास, यातो लच्छीदास । या हाजिर होवे मकरन्द, पकड़ ग्रहत दिल उलास ॥२८॥
पांवड़े बिछावन होत हैं, हाजिर रहे हिम्मत । लटके मटके चलत, मीठी बातां बीच करत ॥२९॥
पहुंचावे मानक के मकरन्द, बैठावत बाई गौर । मानक बातें करत हैं, लिए हुज्जत चित मरोर ॥३०॥
हंसते उत्तर देत हैं, कई न्याय चुकावें इत । फेर इहां से उठ चले, आए सेज पौढ़ने बखत ॥३१॥
आय बिराजे सेज पर, साथ सब किया प्रणाम । आप अपने आसन गए, पहिले उठी सब आम ॥३२॥
इत गोदावरी आवत, ले आई कटोरी में तेल । चोटी छोरें बातां करें, राज भला दिखाया हमें खेल ॥३३॥
बातें श्री बाई जी की, घर की जो बीतक । श्री राज श्रवना देत है, ए बातें बुजरक ॥३४॥
अंगारे अंगीठी भर के, ल्यावत बिहारी दास । थाली में अंगारे धर के, फेरत मानक खास ॥३५॥
सेज तपावें भली भांत सों, रजाइयां और चादर । कनढपी गोटा हाजिर करें, पहिनावत ऊपर ॥३६॥
मुरलीधर बिदा भए, उठे गिरोह के लोक । चरचा आहार अघाय के, भाग गए सब सोक ॥३७॥
श्री राज पौढ़ें पलंग पर, सबको कही प्रणाम । गावन वाली आइयां, अढ़ाई पहर गई जाम ॥३८॥
बदले राग अलापत, साखियां लगा कहनें । सब संगी सुर पूरत, लगे मीठी श्रवने ॥३९॥
श्री राज चित दे सुनत हैं, बड़ी खुसाली कर । इन समय साथी खिजमत के, आए अपनी खिजमत पर ॥४०॥
चौकी सेज्या की बैठत, हंसे और साहमन । केसवदास दौलत, और हजूरी सैयन ॥४१॥
और बानी सुनन को, कोई कोई साथी बैठत । मानक लगते सेज के, तलाई पठई उन बखत ॥४२॥
लगते बिछौने बाई जी के, होत सिराने तरफ । और घेर बिछौने सैयन के, और कोई दम ना मारे हरफ ॥४३॥
और मोमिन भर बंगले, कोई बैठत कोई सोवत । मुरलीधर और जेंनतीदास, बैठे चरचा को इत ॥४४॥
कोठरी काके की, आगे मिलावा होत सैयन । तहां कुरान हदीसां बांचत, लाल केसव मोमिन ॥४५॥
गोकुल दास बैठत, और मोदी बूलचन्द । और केतिक बाइयां बैठत, और सदा बैठे सदानन्द ॥४६॥
इत बड़ा मिलावा होत है, कबूं बानी कबूं चरचाए । कबहुं किताबें कई तरह, यों आहार रूह खिलाए ॥४७॥
श्री राज उत्तर देत हैं, बैठे कौन इन बखत । संकर बुधसेन बल्लभ, नाम साथ के बतावत ॥४८॥
कबूं दस कबूं बीस, तीस चालीस पचास । कबूं साठ सत्तर असी, ए धाम धनी की आस ॥४९॥
आखर को सौ बैठत, कबूं ऊपर भी होए । भर एक अलंग बंगले, बैठत हैं सब सोए ॥५०॥
कोई कोई नेष्टा बन्ध, चूकत नाहीं सोए । कोई कबहुं आवे कबहुं नहीं, ए चरचा सब मिल होए ॥५१॥
ए चरचा सो करे, जो सुनी होय श्री राज । तिन चरचा को अरचत, श्री राज रिझावन काज ॥५२॥
मिलावा बैठत सैयन का, रीझ राज भेजत हार । कबूं कलंगी बकसत, ऐसी करें मनुहार ॥५३॥
उठ मुरलीधर लेत हैं, श्री राज की बकसीस । बांट देत सब साथ को, फेर फेर नवावें सीस ॥५४॥
गोकुल केसव दौलत, कबहुंक लालदास । जो चरचा इत होत है, सो सुनावन की आस ॥५५॥
राज सों बातां करन को, हरखत है मन मांहे । श्री राज राजी होत है, सुन विवेक इनको मुस्कायें ॥५६॥
इत कई भांत बिहार की, बातां होए विवेक । सो मेरी इन जुबां केती कहों, न आवे रसना एक ॥५७॥
महामत कहे ए मोमिनों, ए सातवें पहर की बीतक । अब कहों पहर आठमा, ताकी सुनो सिफत ॥५८॥
(प्रकरण ७०, चौपाई ४२४४)
