श्री बीतक - प्रकरण ७१
आठमा पहर
अब कहों पोहोर आठमा, श्री राज पौढ़ें पलंग पर । बानी धाम धनीय की, गरजत सब ऊपर ॥१॥
बारी वाले गावत, फिरती चौकी पर । जिनकी आवे सो गावहीं, रसना मीठी कर ॥२॥
बानी धाम धनीय की, ए चौदे तबक हैयात । पहिचान भई न काहू को, रूह पिये हैयाती हो जात ॥३॥
आज लों इन इण्ड में, कबहूं काहू सुनी न कान । कई हुए इण्ड कई होवहीं, पर काहू न बोए पहिचान ॥४॥
ए सुननें की ताकत, त्रिगुन को ना होए । और नाम किन के लेऊं, इन उपरान्त सोए ॥५॥
सो रस सागर रेलत, कोई ना धरत कान । एक सैयों की रूह पीवहीं, और काहू ना पहिचान ॥६॥
कैसी जिकर होत है, किन ठौर पहुंचत । क्या नफा होत है, ए पहुंचावे कित ॥७॥
एह मेहर किन करी, ए हुई किन ऊपर । किन बरकतें आई इत, कोई पावे न पटन्तर ॥८॥
जो पावे ए पटन्तर, ताकी पल न वृथा जाए । सो इन रस में झीलत, ताको और कछू न सुहाए ॥९॥
ए बैठत ढिग आए के, धरें सुनने को कान । होत पहिचान रूह की, बढ़त जात ईमान ॥१०॥
ए बानी इन धाम की, ले बैठावत निजधाम । सबको सुख उपजे, होए पूरन मनोरथ काम ॥११॥
इन बानी से होत है, नजर पड़े बीच बका । ए रसना स्यामा जीए की, पिलावत रस रब्ब का ॥१२॥
जो धाम अन्दर की, बिहार की मजकूर । सो अक्षर को सुध नहीं, जो अन्दर का जहूर ॥१३॥
जो अक्षर को सुध नहीं, सो त्रिगुन पास क्यों होए । सो सब इन बानी में, सुपने नजर पहुंची सोए ॥१४॥
नजर नाबूद जीव की, सो सुपने में रल जाए । नींद उड़े उड़त हैं, सुध ना रहवे ताए ॥१५॥
तिन नाबूद की नजर, बीच अखण्ड पहुंचे । अक्षर ठौर सरूप की, इन बानी से देखे ॥१६॥
जहां जबराईल रहया, चल सक्या न आगे । इन बानी की बरकतें, जमुना सातों घाट पहुंचे ॥१७॥
आगे रसूल तखत पर, रफ रफ के बैठे । जोए उलंघ आगे चले, देखा धाम ठौर जेठे ॥१८॥
इन जुबां के सुर सुनते, सब ठौर आवे नजर । रूह आतम पहुंचत, ताए हो जात फजर ॥१९॥
इन बानी के सुनते, आप होत हैयात । देखें बैठे माया मिने, ठौर बका हक जात ॥२०॥
इन बानी के सुनते, खुलत भिस्त के द्वार । आप देखे औरों दिखावहीं, पहुंचे नूर द्वार पार ॥२१॥
इन बानी की बरकतें, कछू न रहवे सक । रूहें राजी रहे रात दिन, जाए बैठे कदमों हक ॥२२॥
इन बानी की बरकतें, भया जागृत सुपन । पहिचान काहू ना हुई, पहिले पास आई सैंयन ॥२३॥
तहां से ए संसार में, पसरी चौदे तबक । बढ़ते बढ़ते बढ़ चली, जाए त्रिगुन पहुंची हक ॥२४॥
इन बानी की बरकतें, नींद उड़ी नूर जलाल । ए याद करे सुपन को, होए के दिल खुसाल ॥२५॥
याद करे बानीय को, तब उठे आठों भिस्त । इन बानी की बरकतें, धाम अन्दर पाई किस्त ॥२६॥
इन बानी की बरकत, मावे न जिमी आसमान । सुंन छोड़ बका पहुंचे, सो मोमिन सुनके कान ॥२७॥
श्री धाम नव भोम है, इन बानी के में । सो ठौर है अखण्ड, बानी ऐसी कहे सें ॥२८॥
हौज जोए बाग जानवर, सो इन बानी बीच है सब । सातों घाट जो पुल हैं, सो सैयां देखें अब ॥२९॥
मानक महल पुखराज, और अलंग गिरदवाए । सो सब बानी बीच में, सैंयन को पहुंचाए ॥३०॥
आठों सागर सुख के, बीच टापू महल मोहलात । सो सब है बानी में, पहुंचावत साथ हैयात ॥३१॥
हक हादी रूहें रहत हैं, सो इन बानी में । नित बिहार करत हैं, सो इन बानी सें ॥३२॥
औलिया लिल्ला कामिल, दोस्त कहे खुदाए । सो इन बानी बीच में, हमेसा इप्तदाए ॥३३॥
और सिफत कहां लो कहों, पातसाही परवरदिगार । सो इन बानी बीच में, सब सैयां जानन हार ॥३४॥
इन बानी की बरकतें, सब दफे होत बलाए । सदा सैतान कांपत, मिने पैठ न सके ताए ॥३५॥
एह जिकर जुबान सों, करत हैं सब मोमिन । श्री राज पौढ़े सुनत हैं, नींद न आवे नैनन ॥३६॥
कछू आंख मिली के ना मिली, फेर सुनत हैं कान । कोई आगूं पीछूं हरफ कहे, कहें मोमिनों को सुभान ॥३७॥
ये आगे पीछे क्यों कहया, क्यों गए हरफ भूल । चुप रहें अरज करें, कहें हमें न आया सूल ॥३८॥
यों करते इन भांत से, बाकी रात रही घड़ी चार । आया समें बिरत का, गिरोह उठने का करे बिचार ॥३९॥
सरूप मुरलीधर कह के, करे साथ को प्रणाम । साथ सब कोई उठे, अपने देह क्रिया के काम ॥४०॥
कोई नींद करत हैं, कोई सुनने चाहें विरत । उठे लालदास कहने को, पहले मंगला आरती के इत ॥४१॥
मंगल आरती के समय में, साथ नेष्टाबन्ध आवे इत । आरती सब मिल कर के, फेर बैठ के सुने विरत ॥४२॥
सोवते सुन विरत को, बैठे आए के इत । सावचेत सब दिल दे, होए बैठे जाग्रत ॥४३॥
इत पहिले हंसे के घर में, बिरत का उठा अंकूर । जेंनती गिरोह मिलाय के, करते थे मजकूर ॥४४॥
तहां सेती लई लाल नें, ए मेहर हक सुभान । फेर एक एक दिन सबों कही, जिनको जेती पेहेचान ॥४५॥
वृन्दावन के घर में, कोई दिन कही विरत । साथ सब उत बैठ के, कस्त जो करते इत ॥४६॥
अग्यारहीं जोलों रही, दिल बड़ो चाह धरे । फेर ठंडे पड़ते गए, कहे लाल अंग ठरे ॥४७॥
लालें दई मकरन्द को, फेर लई लाल खान । ये तीन फिरते कहे, श्री राज सुनत है कान ॥४८॥
बहुत खुसाल होत है, सुन धाम बिरत प्रात । उठ बैठे सेज्या पर, कानों सुनें विख्यात ॥४९॥
पीवत कहवा मंगाए के, बिरत सुनत जात हैं कान । देख मेहर हक सुभान की, करावत है पहिचान ॥५०॥
आवे महावजी इन समें, नेष्टा लेकर दिल । बिरत कहने वाले ढिग बैठत, अंग दाबें हिल मिल ॥५१॥
जो कोई बिरत कहे, करे सेवा ताए । आवें पिछली रात को, ऐही हेत दिल ल्याए ॥५२॥
और मोहन दास आवत, और मोदी मूलचन्द । नेष्टा ए ना छोड़हीं, ले दिल में आनन्द ॥५३॥
और गोविन्द दास आवत, और इन पीछे सब कोए । आवत सुनने सरूप को, आनन्द अंग में होए ॥५४॥
धाम की गिरद कहके, फेर अन्दर पैठे । चारों चौक उलंघ के, पहुंचे पांचवे चौके ॥५५॥
कहे चौसठ थंभ फिरते, चन्द्रवा दुलीचे । सिंहासन के ऊपर, जुगल किसोर बैठत ॥५६॥
साथ गिर्दवाए घेर के, बैठे चबूतरे भर । सब भूखन वस्तर, बरनन होत चित धर ॥५७॥
फेर चौक गिरद के, गिरद छज्जे बन मोहोलात । फेर लेत दूसरी भोम को, फेर तीसरी चढ़ जात ॥५८॥
चौथी निरत की बरनन होत है, पैठे पौंढ़न पांचमी में । फेर छठी सुखपाल की, हिंडोले झूलें सातमी ऐ ॥५९॥
खट छप्पर है आठमी, नोंमी पे सिंहासन । तहां बैठे गिरद देखहीं, बहुत झलकत नूर रोसन ॥६०॥
जब पूरब तरफ बैठत, तब देखत सातों घाट । और ठौर अक्षर की, वार न पार इन ठाट ॥६१॥
बट पीपल चौकी बैठहीं, मानक और पुखराज । या बीच धाम तालाब, इहां खेलें सैंया संग राज ॥६२॥
तालाब मानक बीच में, चौबीस फुहारे उछलत । चौबीस गुरजों चादरें, कुण्ड लहरें तलाबे इत ॥६३॥
फेर मानक वर्णन होत है, गिरद फिरत हवेली ए । दोइ बीच में दरवाजे, एक गिरद चौखूनी के ॥६४॥
फेर गिरद के हिंडोलें, जहां बैठे बारे हजार । नेहरां दोऊ बाजू देहुरे, सैयां रमते करें करार ॥६५॥
नहरे चार आठ कहूं बारह, फेर आवें वन मोहोलात । आगे मैदान देख के, खेले मैदान में इत ॥६६॥
फेर अलंग बरनन करें, चार हार सोलह दरबार । आठों सागर टापू बीच में, खेले परवरदिगार ॥६७॥
फेर नवमी भोम से, जाए पहुंचे दसमी आकास । तहां से तले चौक पांचमां, रूहें स्याम स्यामा जी खास ॥६८॥
चारों चौक उलंघ के, आए पहुंचे बीच द्वार । फेर आगे आए देखे चांदनी, दोऊ चबूतरों खेलनहार ॥६९॥
सातों घाट फेर के, दोउ पुलों ऊपर जमुना । चल आगे पीछे मरोर खाई, पहुंची तालाब में लेहरां ॥७०॥
गिरद तालाब टापू बरनन, बन चौफेर गिरदवाए । अन्न बन लगता आगे दूब बन, सब जरद रंग सोभाए ॥७१॥
इन आगे मैदान है, फेर फूलबाग करें नजर । सौ बाग तले सौ ऊपर, सोभा सुनते हो जाए फजर ॥७२॥
फेर लाल चबूतरे आए के, आए चारों बन पुखराज । हजार गुरज गिर्दवाए, चारों दरवाजे खेले श्री राज ॥७३॥
आठ पेड़ पुखराज के, तले बंगले जमुना मूल । आगे पटी जमुना खुली, मरोर खाए मिली पुल मूल ॥७४॥
दोनों पुलों बीच में, सातों घाट कहे । छूटक देहुरी तिन में, आगे चली तालाबें ये ॥७५॥
कुंजबन इन बीच में, ए विरत होत बरनन । दिन रहया पोहोर पीछला, श्री राज स्यामा जी उठ बैठे सैंयन ॥७६॥
कौन घाट आज जाएंगे, पूछ के पहुंचे तित । एक पहर बिलास किया, दोए पहर बिहरत ॥७७॥
फेर पौढ़ें पांचमी, प्रात उठे इन ठौर । तीसरी भोम पधारत, ए सोभा है जोर ॥७८॥
आरोग पौढ़ें भोम तीसरी, खेलें चौक में साथ । श्री राजें आज चित धरी, खेल दिखाऊं पकड़ हाथ ॥७९॥
खेल दिखावन की, जो भई रद-बदल इसक । भूत भविष्य और वर्तमान, सब ये देखाया हक ॥८०॥
फेर इस्क रब्द खिलवत की, मजकूर करी मोमिन । आए तले बिराजत, होए आप में चेतन ॥८१॥
इच्छा भई भगवान पर, आए बीच सुपन । फेर रूहों पर हुकम हुआ, ब्रज में भए एक ठौर सैंयन ॥८२॥
अग्यारे बरस बावन दिन, पीछे पहुंचे बृन्दावन । एक रात तहां रहे, फेर तीसरा उत्पन ॥८३॥
तहां रास लीला कर के, आए बरारब स्याम । त्रेसठ बरस तहां रहे, वायदा किया इस ठाम ॥८४॥
रूह अल्ला आए दसमी मिने, रहे बरस चौहत्तर । ताए तीन सौ तेरे मिली, पाई कुरान में पटन्तर ॥८५॥
ए संक्षेप बिरत का, एक एक कहया सुकन । विस्तार इत बहुत है, सब ठौर पावें मोमिन ॥८६॥
ए बिरत श्री राज सुनत हैं, तब होत अरुन उदे । सब सेवा में सनमुख, हुआ प्रात को समें ॥८७॥
महामत कहे ऐ मोमिनों, ए आठों पहर की बीतक । अब सरूप साथ को देत हैं, सो कहूं सोभा हक ॥८८॥
(प्रकरण ७१, चौपाई ४३३२)
