श्री बीतक - प्रकरण ७२
दिन आठों पहर की, कही बिरत जो ए । नित कारखाने सेवहीं, कहूं साथी सब सेवन के ॥१॥
मूल कुल दीवान गिरी, थी सेवा गरीब दास । सो नित अरज करें, अब चले न सेवा मों पास ॥२॥
एह तुम देओ और को, मजल राम नगर । कही बहुत आतुर होए के, तब हुआ हुकम लाल पर ॥३॥
गढ़े से हुकम हुआ, पातसाह के हजूर । तब बृन्दावन को दई, जान के काम जरूर ॥४॥
लाल का रहना हुआ, हुकम ना हुआ सो तेह । सुनी ए सकुण्डल ने, परने जाए कहो एह ॥५॥
तब लालदास को पठए, ले परने को पैगाम । महाराजा सों मिल के, किया बुलावने को काम ॥६॥
आए पहुंचे परना में, लाल चले ना तब । तब छोड़ी वृन्दावन नें, सौंपी लाल को सब ॥७॥
दे पठई कुंजी को, लाल को हुआ हुकम । एह आई अज्ञा से, सेवा करो अब तुम ॥८॥
मूल छत्तीस कारखाने का, सब दिया हाथ लाल के । जिनको जो कछू चाहिए, सो सबों पहुंचावे ये ॥९॥
एक मूल श्री बाई जी के, सब पहुंचावें साज । बस्तर जो पहिनन के, तुमें क्या चाहियत हैं आज ॥१०॥
दोनों सरूप और साथ के, सब बस्तर भूषन । पहुंचावें सनेह सों, नित नित रंग नौतन ॥११॥
और अनाज सब जात के, साक तरकारी सब । मेवा मिठाई हरड़े, जो जिन समें चाहिए जब ॥१२॥
रूई सूत और बासन, निरगुन और सरगुन । सब पहुंचावें समें समें, आन आन देवें सैंयन ॥१३॥
हाजिर रहें हजूर में, बैठे श्री राज के पास । आगे पीछे ना होवहीं, ये सेवा करें खास ॥१४॥
इनके पास रहत हैं, इन कारखाने में । घनस्याम लेखा लिखें, धरम दास खजानें ॥१५॥
सन्त दास सामिल रहें, और चतुर रहे इत । और मानक रहत हैं, कल्यान भी आवत ॥१६॥
भिखारीदास भी रहें, खजाना मकरन्द रखें । इन पीछे गीगे को दई, सेवा करें सब कोए ॥१७॥
कपड़ा मकरन्द देवहीं, सब साथ और राज । नित सेवे सनेह सों, फेर खेम करन रखा इन काज ॥१८॥
पहिले नारायन देवें कपड़ा, रहे सेवा में हुकम । देवें सब सनेह सों, फेर करी खेमकरन आतम ॥१९॥
महामत कहे ए मोमिनों, ए साथी सेवा के । कहों केता अजूं बहुत हैं, जिने प्यारे चरन धनी के ॥२०॥
(प्रकरण ७२, चौपाई ४३५२)
