श्री बीतक - प्रकरण ७३ | Beetak prakaran 73
गरमी के दिनों में, सब सेवा खुसबोए । अतर खरीद सब जात के, आवे तुंग भरे गुलाब के सोए ॥१॥
अगर चोवा खस खाना, करें सेवा गंगाराम । खसबोय खाना सब रखत हैं, एही खरीद करें इस ठाम ॥२॥
खस खाना बनावत, टटियां अपने हाथ । छप्पर छांटे भली भांत सों, छिटकत पानी साथ ॥३॥
टटियां बांधने को, एक ओका गंगा राम । सेवा कृष्णदास दयाल, रहे महम्मद खां इन काम ॥४॥
फते महम्मद आवत, खड़ा करन खस खान । बंगले के बीच में, सब सेवा करें समान ॥५॥
काम बढ़ई का पड़े, रहे मोहन हीरा मन । सुतरी डोरी ल्यावन को, बूल चन्द मोहन ॥६॥
बांस कमचिएँ ल्यावत, पुरबीए खोज पर । समारने बांसन को, जग्गू वीर जी बुलावने पर ॥७॥
लाल खारूआ चाहिए, ल्यावत है नारायन । बनाए के ठाढ़ी करें, पोंढ़त है सुभान ॥८॥
जल छिरकत सब बंगले, उठाए सब बिछौनें । इनाएत खां भगवान, गंगाराम सेवें इनमें ॥९॥
बिछौने वाले बिहारीदास, सब साथ दौड़े इन काम । वीरजी मोदी जल छिरकत, कर राज की पहिचान ॥१०॥
नन्दराम पखाले मंगावत, आखर बल्लभ इत छिरकत । तर करें जिमी को, गरमी न फरकत ॥११॥
वाओ ढोलें इत हजूरी, खड़े रहें इक पाये । बिहारी वाओ ढोलत, कबूं गंगादास इत आए ॥१२॥
संकर हाथ में रहत हैं, हमेसा ही बिजने । जब महाराजा आवत, वाओ ढोलें इन समें ॥१३॥
और साथी सब ढोलत, जहां लग पौढ़त श्री राज । चार जने इत खड़े रहें, वल्लभ संकर एही काज ॥१४॥
गंगादास गंगाराम, और बिहारीदास । सन्त दास सेवन में, खड़े रहें ए खास ॥१५॥
और साथी भी सेवन को, खड़े रहें सदा सनमुख । जिनों सुख लिया इन समें, कहयो न जाए इन मुख ॥१६॥
इन सेवा मिने पहिले, रहते निरमल दास । ता पीछे प्रेमदास नें, सेवा करी जो खास ॥१७॥
लाल मुकुन्ददास रहत हैं, निरमल दास के संग । गोविन्द दास सूरती, मगन सेवत सर्वा अंग ॥१८॥
जमुना मानक इन समें, रहें हजूर सेवा में । राम बाई आखर में, ए सबे हुईं बल्लभ सें ॥१९॥
हकीकत खां भेजत है, गुलाब के सीसे । छिरकत हैं सब सेज पर, गंगाराम इन समें ॥२०॥
मिहीं वस्तर पहिनन के, प्रेमदास ल्यावे । आखर को इन पे, नन्दराम पासे जावे ॥२१॥
आई फेर बल्लभ पास, यापे सब सेवा को बोझ । बहुत मेहनत इन करी, सब सेवा की खोज ॥२२॥
महावजी भाई इन समें, आए पोरबन्दर से । सेवा अनार राखवे की, और पत्री लिखवे की सेवा में ॥२३॥
आसबाई इन समें, लागत हैं चरन । श्री राज हेत कर बुलावत, प्रसन्न होए के मन ॥२४॥
महामत कहें सैयन को, ए सेवा के कहे साथ । इहां तेही खड़े रहे, जाके धनीएं पकड़े हाथ ॥२५॥
(प्रकरण ७३, चौपाई ४३७७)
॥ श्री बीतक सम्पूर्ण ॥
