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श्री बीतक - प्रकरण ८

अब तुम सुनियो मोमनों, देखो अपने कदम । साथ चले जिन भांत सों, देत नसीहत आतम ॥१॥

कूच किया श्री बाई जी ने, आगे श्री जी साहिब । जीत चली सब साथ में, सब धन-धन कहें अब ॥२॥

सम्वत् सतरह सौ पचास में, बैसाख सुदि अष्टमी । वार बुध पोहोर दिन चढ़ते, ठौर अपने जाय जमी ॥३॥

सम्वत्‌ सत्रह सौ इक्यावन, असाढ़ के महिने । दिन चौथ पीछली रात में, धनी पहुंचे धाम अपने ॥४॥

बार सुकर जुम्मे का, पीछली रात घड़ी दोय । पहुंचे अर्स अजीम को, दारूल बका कहया सोय ॥५॥

जिन मोमिन को पहिचान, तिन बांधी कमर । सोंपी आतम कदमों, हुए सब ऊपर ॥६॥

जिन ढील खिन एक न करी, सुनके पानी किया हराम । हम पहुंचे सेवा मिनें, और न कोई काम ॥७॥

स्वास न खाया बीच में, छोड़ी न साइत । उठे धाम वतन में, ए फरदा रोज क्यामत ॥८॥

हम साथ देखत रहे, जिन घेर लिया घेन । जब आँखे खुली, ताय क्योंए ना पड़े चैन ॥९॥

दरद न आया धनी का, बिछुड़ते न उड़ी अरवाहे । साथ मिने तिनका, मुख ऊंचा होवे क्यों ताये ॥१०॥

जीती बाजी हार दई, ए दरद बड़ा मोमिन । ए कहनें में न आवत, बहुत भारी होसी रोसन ॥११॥

ना तो सिरदार सिरोमनि, थी बेसक पहिचान । पर आखर बखत फल समै, हाय हमें कछु न रहया ईमान ॥१२॥

निसबत हमारी ना रही, ना तो वतन हमारो श्री धाम । तिन समे ना देखिया, सो छुड़ाया दज्जाल ने ठाम ॥१३॥

ऐसा पसु भी ना करे, जिन माया की प्रीत । हमसे कछू ना हुआ, कछू ना आई रीत ॥१४॥

ए रहे श्री राज के हुकमें, और न कोई उपाय । जान सिरोमनि क्यों रहें, पर हुकमें कछू न बसाय ॥१५॥

कहां लो कहूं मैं इनकी, धिक-धिक हुआ आकार । अब कहूं मैं तिनकी, जो संग चले साथ सिरदार ॥१६॥

संकर हजूरी चले, और चले लालमन । और नारायणदास जो, कहे खास मोमिन ॥१७॥

गोदावरी और किसनी, संग दिया धनजी नें । भए आसिक दीन इसलाम पर, धाम मेले अपनें ॥१८॥

बड़ा जस लिया जसिया, जिन छोड़े न राज कदम । साथ में धन धन सबों कही, जाग पहुंची आतम ॥१९॥

और अम्बो बाई चलीं, थी इस्क में गरक । इन ऊपर मेहर मेहेबूब की, पहुंची कदमों हक ॥२०॥

और जो रतन बाई, चली राज के साथ । सांची रहे सेवा मिने, तो धनिये पकड़े हाथ ॥२१॥

राम बाई आपा डारिया, थी सेवा में आसिक । जान के तो अपना, साथ रखी हक ॥२२॥

ए साथ जो संग चले, जिन सिर ऊँचा किया मोमिन । संसार में धन धन हुए, जिनके दिल रोसन ॥२३॥

महामति कहे ए मोमिनों, देखों साथ कदम । अब इनको देख के, जगाओ अपनी आतम ॥२४॥

(प्रकरण ८, चौपाई ३९१)

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