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श्री बीतक - प्रकरण ९

अब कहूं मोमिन की, जो फिदा हुए ऊपर हक । इनकी सिफत न आवे सब्द में, नेक कहूं अपनें माफक ॥१॥

चलना राज के पीछल, किया अपना कुरबान । भयो गौवच्छ पद कहिवे को, जाय लगे ब्रह्म बान ॥२॥

भवजल मोह सागर, पार न आवे कोय । वास्ते दीन इसलाम के, नजरों आया सोय ॥३॥

सूर कई संसार में, होत तरवारों टूक टूक । पर इनकी तौल न आवहीं, जो हक वास्ते हुए भूक भूक ॥४॥

आकार अपना डारते, जरा न करी सक । साबित हुए मोमिन, पहुंचे कदमों हक ॥५॥

इनको पीछे फेरन को, बहुत करी अन्‍तराय । पर जिनकी नजर धाम में, ताको कौन फिराय ॥६॥

पुकार करी इनों बहुतक, सबों को दिया पैगाम । बिना हक के हुकुमें, क्यों पहुंचे इसलाम ॥७॥

कूच सुनत धनीय का, विरह न किया याद । सोतो नहीं मोमिन, अरस अजीम की बुनियाद ॥८॥

सुनते सब्द धनीय का, तब ही अरवाह उड़ जाय । ताको कहिए मोमिन, सुनते विरह उड़ जाय ॥९॥

पीछे रखे आकार को, लालच वजूद के । सो क्यों बैठे सैंयन में, बात कहनें को ए ॥१०॥

मोमिन ऐसी न करे, जो कछू होय पहिचान । अरवाह सो उड़ावहीं, जाको होय ईमान ॥११॥

धिक धिक पड़ो तिन को, जो ए बात सुने कान । बिछोहा धनी धाम सों, जाको कछू नहीं पहिचान ॥१२॥

तिन सनमंध अपना तोड़िया, जो था बीच बका । अब क्यों मुख दिखावहीं, जो बीच बजूद थका ॥१३॥

ले बैठे आकार को, विरह सुनत हैं कान । तिनको ईमान जिन कहो, कहा रही इत जान ॥१४॥

जो रहे सोहबत में, आठ पहर एक ठौर । तो पीछे क्यों कर रहे, जाको बात न दिल में और ॥१५॥

पर ए बात हुकम की, सो तो हाथ है हक । ऐसा जान बूझ क्यों करें, जिनों नहीं दिल में सक ॥१६॥

जो रहे सो हुकमें, और चले बीच इजन । मोमिन रखे जिन वास्ते, मजल जाहिर सबों रोसन ॥१७॥

सम्वत् सत्रह सै इक्यावना, भादों वदी चतुर्दसी के दिन । प्रणाम कर सब साथ को, पहुंचे हक कदमों मोमिन ॥१८॥

मैं कहूं नाम तिनके, जिन सुनत होइए पाक । उड़ाय बजूद अपना, थे हक कदमों खाक ॥१९॥

बल्लभदास एक इनमें, दूजे हैं केसवदास । तीसरा था मथुरा, ए तीनों मोमिन खास ॥२०॥

राम कुंवर केसव संग, प्रसादी इनके संग । हमीरा स्त्री इनकी, थी धाम धनी के अंग ॥२१॥

और जो था साहमन, पाचवां नरसिंहदास । सन्तदास जो इन संग, ए छेहू मोमिन खास ॥२२॥

पूरबाई और खड़गो, और केसरबाई नाम । कासी चल्या तीसरे दिन, चल्या असऊ पीछे इन काम ॥२३॥

श्री महामति कहे ए मोमिनों, धरो कदमों पर कदम । तुम आय धाम धनी से, जगाओ अपनी आतम ॥२४॥

(प्रकरण ९, चौपाई ४१५)

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