Kuljam.org

विषय-सूची

छोटा कयामतनामा - प्रकरण १ | Chhota Kayamatnama prakaran 1

मोमिन दुनी का बेवरा

जो नूर पार अर्स अजीम, ए जो बेवरा कयामत का । मोमिन दुनी की तफावत, ए फना ओ बीच बका ॥१॥

जब लाहूत से रूहें उतरीं, कह्या अलस्तो बे रब कुंम । नासूत जिमीमें जाए के, जिन मुझे भूलो तुम ॥२॥

तब रूहों वले कह्या, हम भूलें नहीं क्योंए कर । तुम साहेद किए रूहें फरिस्ते, पल रेहे न सकें तुम बिगर ॥३॥

तुम खावंद हमारे सिर पर, अर्स अजीम बका वतन । हम क्यों भूलें सुख कायम, तुमारे कदमों हमारे तन ॥४॥

हकें कौल किया भेजों मासूक, तिन के साथ फुरमान । भेज इलम लेऊं जगाए, देसी रूह अल्ला सब पेहेचान ॥५॥

हाथ रसूल के फुरमान, रूह अल्ला साथ इलम । हादी करावें हजूर बंदगी, खोले पट हक के हुकम ॥६॥

तीनों सूरत महंमद की, तिन जुदी जुदी करी पुकार । रूहें फरिस्ते लेवें सब साहेदियां, जो लिख भेजी परवरदिगार ॥७॥

बसरी मलकी और हकी, ए तीनों के जुदे खिताब । एक फुरमान ल्याई दूसरी कुंजी, तीसरी खोले किताब ॥८॥

लिख भेजी रमूजें इसारतें, दो गिरो तीन सूरत पर । दूसरा बका की न खोल सके, ए वाहेदत गुझ खबर ॥९॥

हजरत आए आया सब कोई, और ले चलेंगे सब । ए लिखियां जो इसारतें, फुरमाया फिरे न कब ॥१०॥

चले लैलत कदर से, तकरार जो अव्वल । सो भेले दुनी के क्यों चले, जो उमत अर्स असल ॥११॥

गिरो बचाई साहेब ने, तले कोहतूर हूद तोफान । बेर दूजी किस्ती पर, चढ़ाए उबारी सुभान ॥१२॥

अब आई बेर तीसरी, तिनका सुनो विचार । पेहेचान बिना गिरो क्या करे, या यार या सिरदार ॥१३॥

या अर्स आपकी पेहेचान, या हक हादी रूहें निसबत । गिरो खासी उतरी अर्स से, और दुनी पैदा जुलमत ॥१४॥

दिल मोमिन अर्स कह्या, सैतान दुनी दिल पर । क्यों गिरो दुनी भेली चले, भई तफावत यों कर ॥१५॥

ना पेहेचान ना निसबत, दुनी गिरो असल दुस्मन । एक हक न छोड़ें उमत, दुनी दुनियां बीच वतन ॥१६॥

निसबत इन तफावत, ए भेले चलें क्यों कर । दुनी जिमी गिरो आसमानी, दुनी के पांउं गिरो के पर ॥१७॥

एक ईमान दूजा इस्क, ए पर मोमिन बाजू दोए । पट खोल पोहोंचावे लदुन्नी, इन तीनों में दुनी पे न कोए ॥१८॥

ए दुनी चले चाल वजूद की, उमत चले रूह चाल । लिख्या एता फरक कुरान में, दुनी उमत इन मिसाल ॥१९॥

कह्या दुनियां दिल मजाजी, सो उलंघे ना जुलमत । दिल अर्स हकीकी मोमिन, ए कहे कुरान तफावत ॥२०॥

इनमें रूह होए जो अर्स की, सो क्यों रहे दुनी सों मिल । कौल फैल हाल तीनों जुदे, यामें होए ना चल विचल ॥२१॥

जो मोमिन देखें राह दुनी की, सो रूह नहीं अर्स तन । दुनियां घर जुलमत से, मोमिन अर्स वतन ॥२२॥

पेहेले च‍ल्या सैयद अकेला, तब तो थी सरीयत । अब अकेले क्यों छोड़िए, गिरो पोहोंची दिन मारफत ॥२३॥

पेहेले एक जहूद बुजरक, तिन पीठ न छोड़ी महंमद । यार असहाब न चल सके, ताकी दे मसनवी साहेद ॥२४॥

जहूद कहिए क्यों तिन को, जो करे ऐसे फैल । आगे हुआ सबन के, कदम छोड़ी ना महंमद गैल ॥२५॥

तिन खोली रूह नजर, जाए हकें बखसी बातन । इन राह सोई चलसी, जो हक अर्स दिल मोमिन ॥२६॥

दिल मजाजी जो कहे, ताको अर्स दिल कबूं न होए । सो आए न सके वाहेदत में, जिन दिल अबलीस कह्या सोए ॥२७॥

रसूलें राह बताई मेयराज में, अर्स लेसी सोई मोमिन । देखाई चढ़ उतर, जो हकें खिलवत कहे सुकन ॥२८॥

मजकूर करी महंमद ने, हक हादी बीच रूहन । हकें कह्या उतरते रूहों को, सो सब मुसाफ करे रोसन ॥२९॥

जो पोहोंच्या इन खिलवतें, दिल हकीकी इन राह । इत दिल मजाजी आए न सके, जित अबलीस दिलों पातसाह ॥३०॥

भूले करे जाहेरियों सिफत, सुध न परी बातन । मारफत सूरज उगे बिना, क्यों देखें बका अर्स तन ॥३१॥

तो दें बड़ाई जाहेर परस्तों को, जो समझे नहीं हकीकत । हक इलम आए बिना, तो क्यों समझे मारफत ॥३२॥

सरीयत करे फरज बंदगी, करे जाहेर मजाजी दिल । बका तरफ न पावे अर्स की, ए फानी बीच अंधेर असल ॥३३॥

दिल हकीकी जो मोमिन, सो लें माएने बातन । हक इलम इस्क हजूरी, रूहें चलें बका हक दिन ॥३४॥

फेर आए रसूल स्याम मिल, सोई फेर आये यार । देख निसबत पांचों दुनीमें, क्यों छोड़ें असल अर्स प्यार ॥३५॥

कहे महंमद पेहेले जब मैं चलों, यार आए मिलें खिन मांहें । ए वाहेदत की साहेदी, जाग्या जुदा रेहेवे नाहें ॥३६॥

मैं अव्वल जो चलों, साथ आए मिलें सब कोए । तो सिफत दुनियां मिने, खासी गिरो की होए ॥३७॥

इत मैं चलो जो अव्वल, कर यारों सों सहूर । तो खूबी होए तेहेकीक, नूर पर नूर सिर नूर ॥३८॥

खूबी खुसाली अधिक, और ज्यादा सोभा संसार । ले प्याला रूह जगाए के, ल्‍यो इस्क चलो हादी लार ॥३९॥

पोहोंचे नहीं अंग दिल के, ताथें रूह अंग लीजे जगाए । तो लों आपा ना मरे, जोलों खुदी न देवे उड़ाए ॥४०॥

जब उठें अंग रूह के, सो तूं जागी जान । आई अर्स अंग लज्जत, तिन पूरी भई पेहेचान ॥४१॥

जो अंग होवे अर्स की, उपजत नहीं अंग आहे । बारे हजार रूहन में, सो काहे को आप गिनाए ॥४२॥

करवट लेते सूते नींदमें, नाला मारत जे । याद बिगर किए अंग आवहीं, स्वाद आसिक मासूक के ॥४३॥

जो होए आवे मोमिन रूह से, सो कबूं ना और सों होए । इत चली जो रूह जगाए के, सो सोभा लेवे ठौर दोए ॥४४॥

देख बिछोहा हादी का, पीछा साबित राखे पिंड । धिक धिक पड़ो तिन अकलें, सो नहीं वतनी अखंड ॥४५॥

ए जाहेर देखावें दोस्ती, जाए रूह न अंदर पेहेचान । ए मोमिन रूहें जानहीं, जाको अर्स दिल कह्यो सुभान ॥४६॥

रूहें दम बिछोहा न सहें, जो होए बका की असल । रूह हादी की चलते, अरवा आगूं हीं जाए चल ॥४७॥

दिल हकीकी रहे ना सकें, जो आया लदुन्नी दरम्यान । दिल मजाजी क्या करे, हुआ फरक जिमी आसमान ॥४८॥

कोई छोड़े ना अपनी असल, पोहोंचे सिफली का मलकूत । जबरूती जबरूत में, रूहें लाहूती लाहूत ॥४९॥

बेवरा लिख्या मुसाफ में, लिखे जुदे जुदे बयान । दिल मजाजी क्यों समझे, जाको मुरदार कह्या फुरकान ॥५०॥

ए उपले पानी उजूसे, हुआ न कोई पाक । ए पानी न पोहोंचे दिल को, क्या होए ऊपर धोए खाक ॥५१॥

किताबों सबों यों कह्या, अर्सें पोहोंचे रूह पाक । दिल मजाजी इन जिमी के, मिल जाए खाक में खाक ॥५२॥

खाक कछू न पावहीं, रूह तो अपने बीच असल । कोई देखे सहूर करके, तो पोहोंचे हादी कदमो नसल ॥५३॥

गुम हुई जिनों की अकलें, होए नजीक न तिनों हक । जान बूझ न छोड़े इन जिमी, तिन से रेहेनी न होए बेसक ॥५४॥

कदी केहेनी कहे मुख से, बिन रेहेनी न होवे काम । रेहेनी रूह पोहोंचावहीं, केहेनी लग रहे चाम ॥५५॥

केहेनी सुननी गई रात में, आया रेहेनी का दिन । बिन रेहेनी केहेनी कछुए नहीं, होए जाहेर बका अर्स तन ॥५६॥

केहेनी करनी चलनी, ए होंए जुदियां तीन । जुदा क्या जाने दुनी कुफर की, और ए तो इलम आकीन ॥५७॥

अर्स सब जाहेर हुआ, नूर तजल्ला हक । रूहअल्ला महंमद मेंहेंदी ने, उड़ाए दई सब सक ॥५८॥

सूर ऊग्या मारफत का, महंमद मेंहेंदी दिल । नूर अंधेर जुदे हुए, जो रहे थे रात के मिल ॥५९॥

कुफर और ईमान की, सुध न थी बीच रात । अब सुध परी सबन को, जाहेर हुई हक जात ॥६०॥

ना सुध मोमिन मुसलिम, ना सुध काफर मुनाफक । सो सुध हुई सबन को, किया बेवरा इलम हक ॥६१॥

हक इलम मारफत की, जाहेर किया नबी दिल नूर । कुफर काढ़ ईमान दिया, ऊग्या दिल मोमिन अर्सों सूर ॥६२॥

खोली इलमें सब किताबें, या कतेब या वेद । सब खोले मगज मुसाफ के, मांहें छिपे हुते जो भेद ॥६३॥

जेता कोई पैगंमर, सो सब जहूदों मांहें । इसलाम मोमिन सब याही में, कोई जाहेरियों में नाहें ॥६४॥

जाकी करे मुसाफ सिफतें, औलिए अंबिए पैगंमर । सो हुए सब जहूदों मिनें, जो देखे बातून सहूर कर ॥६५॥

जिने लिए माएने बातून, हुआ पैगंमर सोए । उमत औलिए अंबिए, बिन बातून न हुआ एक कोए ॥६६॥

जाहेरी बड़े जानें आपको, और समझें नहीं हकीकत वतन । हक इलम आया नहीं, तोलों होए नहीं रोसन ॥६७॥

कह्या जाहेर मांहें दुनियां, और बातून मांहें हक । ए वेद कतेब पुकारहीं, हक इलम कहे बेसक ॥६८॥

ए नूर जाहेर तो हुआ, जब कुराने खोली हकीकत । रात मेट के दिन किया, सो दिल महंमद सूर मारफत ॥६९॥

कौल किया हकें रूहों सों, बीच बका वतन । सो साइत आए मिली, जाहेर हुआ अर्स तन ॥७०॥

एक खुदी थी दुनी में, दूजी सुभे सक । करते फैल तरफ हवा के, पीठ दिए तरफ हक ॥७१॥

सो खुदी काढी जड़ मूल से, हुए जाहेर हक इलम । सक सुभे कछू ना रही, हुई सब में एक रसम ॥७२॥

जुदी जुदी जातें कहावतीं, फैल करते जुदे नाम धर । सो रात मेट के दिन किया, हुई जाहेर सबों फजर ॥७३॥

जिनों खुली नजर रूह की, सोई पोहोंचे अर्स हक । जिनों छूटी न नजर जाहेरी, सो पड़े दुनी बीच सक ॥७४॥

जिनों खुली हकीकत मारफत, सो सहे ना बिछोहा खिन । और हक इलम खोल्या आखिरी, ए बीच असल अर्स तन ॥७५॥

जो जाग उठ बैठा हुआ, जगाया हक इलम । सो हादी बिना पल एक ना रहे, छोड़ न सके कदम ॥७६॥

सब साहेदी दई जो हदीसों, और अल्ला कलाम । सो साहेदी ले पीछा रहे, तिन सिर रसूल न स्याम ॥७७॥

जिनों लदुन्नी पोहोंचिया, लिया बका अर्स भेद । सो क्यों गिरो सों जुदा पड़े, जाए परे कलेजे छेद ॥७८॥

जाए खुली हकीकत मारफत, पाई अर्स पेहेचान । सो क्यों सहे बका बिछोहा, जिनों नींद उड़ी निदान ॥७९॥

ए पोहोंच्या मता सब रूहों को, जब पोहोंचाया इलम हक । इत सक जरा ना रही, पोहोंच्या हक बका मुतलक ॥८०॥

जाको हक इलम पोहोंचिया, तिन हुआ सब दीदार । अंतर कछुए ना रह्या, वह पोहोंच्या नूर के पार ॥८१॥

जाको हक इलम आया नहीं, ताए पट रह्या अंतराए । हक नजीक थे सेहेरग से, तहां से दूर ले गए उठाए ॥८२॥

रूह ठौर है रूह के, ए जो लेती इत दम । सो गया असल जुलमतें, जिनों सुध परी ना हक कदम ॥८३॥

लिया लदुन्नी जिनने, सो क्यों सोवे कबर मांहें । जिने मूल सरूप देख्या अपना, उठ जागे सोवे नाहें ॥८४॥

वाको तो फजर हुई, हुआ बका सूरज दीदार । मिल्या कौल अव्वल का, जो किया था परवरदिगार ॥८५॥

जो उठी कयामत को, सो क्यों सोवे ऊगे दिन । आया असल तन में, बीच बका वतन ॥८६॥

जो कदी वह आगे चली, जिमी बैठी वह जिमी मांहें । पांचों पोहोंचे पांचों में, रूह अपनी असल छोड़े नाहें ॥८७॥

यों इलम समझावते, जो कोई ना समझत । तिन मजाजी दिल पर, जिन करो नसीहत ॥८८॥

काफर मुसलिम मोमिन, जो ए जुदे न होते तीन । तो अर्स तन और जिमी के, क्यों पाइए कुफर आकीन ॥८९॥

अर्स बका तन मोमिन, दुनियां फना जिमी तन । ताकी केहेनी रेहेनी क्यों होवे, क्यों होए एक चलन ॥९०॥

जो हक अर्स दिल मोमिन, मिल के करो सहूर । कही जिमी तले की दुनियां, रूहें नूर पार तजल्ला नूर ॥९१॥

मोमिन और दुनी के, चाहिए सब विध जुदागी । दुनियां पैदा जुलमत से, रूहें उतरी अर्स अजीम की ॥९२॥

ए सब बातें याद राखियो, फल बखत आखिरत । चलते फरक जो ना होवे, तो रूहों की क्यों करे हक सिफत ॥९३॥

मर मर सब कोई जात हैं, चाहिए मोमिनों मौत फरक । दुनियां बीच गफलत के, मोमिन जागें दिल अर्स हक ॥९४॥

जो रूह होसी मोमिन, चल्या चाहिए सावचेत । कह्या काफर स्याह मुंह आखिर, मुख मोमिन नूर सुपेत ॥९५॥

मेला मजाजी दिलों का, ए चले बांधी जात कतार । ए अर्स दिल हकीकी जीवते, क्यों चलें भांत मुरदार ॥९६॥

बीच फना जीवों के, क्यों रहें बका अर्स तन । पल इनमें रेहे ना सकें, जिन सिर बका वतन ॥९७॥

ए जो दुनियां दिल मजाजी, या उनके सिरदार । ना पोहोंचे फना बका मिने, ए हक कौल परवरदिगार ॥९८॥

मोमिन उतरे नूर बिलंद से, ए दुनी पैदा जुलमत । सांच झूठ क्यों मिल सके, क्यों रास आवे सोहोबत ॥९९॥

सांचे सांचा मिल चले, मिले झूठा झूठों मांहें । जो जैसा तैसी सोहोबत, इनमें धोखा नाहें ॥१००॥

अर्स दिल मोमिन कह्या, दुनी दिल पर अबलीस । ए सैतान दोस्त न किसी का, जो काट देवे कोई सीस ॥१०१॥

लाहूत बका फना नासूत, ए तौल देखो दोए । चिरकीन जिमी से निकस के, क्यों न लीजे बका खुसबोए ॥१०२॥

जान बूझके भूलिए, इलम पाए बेसक । देखो दिल विचार के, क्यों राजी करोगे हक ॥१०३॥

जीवते मारिए आपको, सब्द पुकारत हक । जो जीवते न मरेंगे मोमिन, तो क्या मरेंगे मुनाफक ॥१०४॥

फुरमाए कलाम सब रूहों को, ए मोमिन करें सहूर । इन अंधेरी से निकस के, क्यों न जैए पार नूर ॥१०५॥

हक हुकम हादी चलावते, क्यों न लीजे अर्स राह । मूल सरूप ले दिल में, उड़ाए दीजे अरवाह ॥१०६॥

चलना सबों सिर हक है, ए जान्या सबों तेहेकीक । पर आप बस कोई न चल्या, चले एक दूजे की लीक ॥१०७॥

जो कोई इत जागिया, सो क्यों चले परवस । सब सावचेत सुरत बांध के, बीच उठिए अपने अर्स ॥१०८॥

जो जागी इत होएसी, तिनका एही निसान । मूल सरूप ले सुरत में, पट खोलिए कर पेहेचान ॥१०९॥

भला कहे दुनियां मिने, न भूलिए अपने तन । हक हादी रूहें बीच खिलवत, उठिए बीच बका वतन ॥११०॥

जो मसलहत कर चलिए, अर्स रूहें मिल कर । अपनी जुदाई दुनी से, सो क्यों होए इन बिगर ॥१११॥

अपनी जुदाई दुनी से, किया चाहिए जहूर । दोऊ एक राह क्यों चलें, वह अंधेरी एह नूर ॥११२॥

महामत कहे सुनो मोमिनों, मेहेर हक की आपन पर । सब अंगों देखो तुम, तब खुले रूह की नजर ॥११३॥

॥ प्रकरण ॥१॥ चौपाई ॥११३॥

इसी सन्दर्भ में देखें-