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छोटा कयामतनामा - प्रकरण २ | Chhota Kayamatnama prakaran 2

बाब पैगंमरों का

जेते पैगंमर भए, जिनों पोहोंचाया हक पैगाम । पाई जबराईल से बुजरकी, जो पोहोंच्या नूर मुकाम ॥१॥

हकीकत कुरान की, सो पोहोंची ठौर नूर । आगे हक के दिल की, सो मारफत में मजकूर ॥२॥

हुआ मेयराज महंमद पर, तिन में बका सब बात । महंमद पोहोंच्या हजूर, तहां देखी हक जात ॥३॥

देखे मोती पूर नूर से, कह्या मुंह पर कुलफ तिन । इन कुलफ को खोलेगा, तेरा दिल रोसन ॥४॥

गुनाह तेरी उमत का, कुलफ मुंह मोतियन । देख दाहिने हाथ पर, जो हक मुख कहे सुकन ॥५॥

किस वास्ते फिकर करे, देख दाहिने हाथ पर । कुलफ मोतियों के मुंह पर, सब नूर आया महंमद नजर ॥६॥

हकें कह्या गुनाह किया उमतें, कह्या कुलफ ऊपर दिल । ए जो दई फरामोसी खेल में, जो उतरते मांग्या रूहों मिल ॥७॥

कहूं पेहेले जंगल जरी जवेर, रोसन नूर झलकत । जोए किनारें दरखत, पाक खुसबोए बेहेकत ॥८॥

देख्या हौज अर्स का, दयोहरियां गिरदवाए । और जंगल पूर मोतियों से, दिया महंमद को देखाए ॥९॥

इहां लग साथ जबराईल, पोहोंच्या इन मकान । कहे आगे मेरे पर जलें, चढ़ सक्या न चौथे आसमान ॥१०॥

महंमद की बुजरकी, बीच इन कलाम । और कही हकीकत, आखिर आवने ईसा इमाम ॥११॥

पाया बीच नासूत के, हजरत ईसे दीदार । दई कुंजी बका की, देखे लैलत कदर तीन तकरार ॥१२॥

हक बैठे आए अंदर, पट अर्स दिए सब खोल । जो कही मारफत महंमदें, सो रूहअल्ला कहे सब बोल ॥१३॥

जो हुकमें किए नबिएं जाहेर, दूजे रखे रसूल पर अखत्यार । और गुझ रखे जो तीसरे, सो कहे रूहअल्ला कर प्यार ॥१४॥

अब कहूं रूहअल्लाह की, जिन दई महंमद साहेदी । मेरा दिल उनसे रोसन हुआ, पाई न्यामत बका दोऊ की ॥१५॥

जित जबराईल ना चल सक्या, आगे परे न पाए । सो ए ठौर देखे सबे, बरकत रूहअल्लाह ॥१६॥

हौज जोए आई नजरों, और नूरजलाली हद । इलम ईसे के देखाया, और मुसाफ हदीस महंमद ॥१७॥

और जो मजकूर हुई अंदर, कौल कहे इसारत । ए साहेदी हादी मोमिन बिना, तो ए किनकी को खोलत ॥१८॥

देखी सूरत अमरद, तासों किया मजकूर । सो ए दुनी में महंमदें, सब मेयराजें किया जहूर ॥१९॥

दुनियां चौदे तबक में, जाकी तरफ न पाई किन । सो सब मेयराज में, रसूलें करी रोसन ॥२०॥

पर ए बानी सो समझे, जो पोहोंच्या होए इन मजल । और क्यों समझें ए माएने, जो इन राह में जात हैं जल ॥२१॥

इत पोहोंच्या ईसा रूहअल्ला, सो भी महंमद की सूरत । ताको हकें कही रूह अपनी, जाको खावंद खिताब आखिरत ॥२२॥

महंमद कहे ईसा आवसी, और महंमद मेंहेंदी इमाम । मार दज्जाल कुफर दुनी का, एक दीन करसी तमाम ॥२३॥

एक दीन तब होवहीं, जब साफ होवें सब दिल । ए हक बिना न होवहीं, जो चौदे तबक आवें मिल ॥२४॥

सो ए खिताब रूहअल्ला का, या महंमद सिर खिताब । या तो सिर इमाम के, जो आखिर खोलसी किताब ॥२५॥

सोई खोले ए माएने, जिन लई मजल इन ठौर । ए बानी वाहेदत की, दूजा केहेते जल मरे और ॥२६॥

ए जो औलाद आदम की, दिल मजाजी ऐसा दुस्मन । पूजत सब हवा को, सो क्यों सुनी जाए फुरकान इन ॥२७॥

हक महंमद मोमिन मुसाफ, ए पेहेचान होसी जब । झूठ सांच दोऊ मिल रहे, पाउ पलमें जुदे होसी तब ॥२८॥

ए सब पैदा महंमद के नूर से, अव्वल आखिर सोई नूर । एक साइत न खाली नूर बिना, तब दुनी देखे जब होसी जहूर ॥२९॥

सिर खिताब जमाने खावंद, सो करसी मुसाफ जहूर । झूठ दूर होए रात अंधेरी, सब देखें हक अर्स ऊगे सूर ॥३०॥

सब की जुबां से महंमद, सब पर करसी हिदायत । ए सुकन लिखे सब किताबों, पर क्यों समझे दम गफलत ॥३१॥

अव्वल आखिर बीच महंमद, इत सब जाने दुनी कलाम । हकें मासूक कह्या महंमद को, सो क्यों समझे दुनी आम ॥३२॥

जेता कोई रूह मोमिन, जाए पोहोंच्या हक इलम । सो बात समझे हक अर्स की, जिन दिल पर लिख्या बिना कलम ॥३३॥

और जाहेर दिल जो मजाजी, सो भी कहे गोस्त टुकड़े । सो क्यों सुनसी केहेसी क्या, जो कहे अंधे बेहेरे मुरदे ॥३४॥

दिल मोमिन अर्स कह्या, उतरे भी अर्स से । हक बैठक इनों दिल पर, ए सिफत न आवे जुबां में ॥३५॥

कह्या दुनी निकाह अबलीस से, दिल मजाजी तिन पैदास । जेती औलाद आदम की, पूजे हवा चले लिबास ॥३६॥

कह्या महंमद हक के नूर से, नूर महंमद के मोमिन । हक हादी रूहें वाहेदत, इत मिले न दूजा सुकन ॥३७॥

कहे तिहत्तर फिरके महंमद के, एक नाजी नारी बहत्तर । नाजी को हिदायत हक की, खड़ा बीच राह के पर ॥३८॥

और तफरका भए, चले कौल तोड़ कर । दाएं बाएं चलाए दुस्मनें, मारे गए हक बिगर ॥३९॥

मेयराज हुआ महंमद पर, कोई और न आया ढिग इन । सो आखिर ईसा इमामें, किए मेयराज में सब मोमिन ॥४०॥

खूबियां आखिर बखत की, किन मुख कही न जाए । खूबी कहिए तिन की, जो सब्द मांहें समाए ॥४१॥

अव्वल जमाने के सैयद, और बड़े केहेलाए पैगंमर । पर सो बराबरी कर ना सके, जो आई उमत महंमद की आखिर ॥४२॥

लिख्या सब कुरान में, माएने मगज सब्द । क्या समझें अव्वल कतार जो, दुनी बांधी जाए मांहें हद ॥४३॥

रूहअल्ला मुरदे उठावत, हक का हुकम ले । आखिर अपने हुकम उठावहीं, मोमिन महंमद के ॥४४॥

इन बिध लिख्या जाहेर, तो भी देखे न खुलासा । सब बोले फना में रात को, किया उमतें फजर बका ॥४५॥

जो लिखी सबे बुजरकियां, सो सब बीच आखिर । सो गिरो नाजी महंमद की, लिखे नामे याके फैलों पर ॥४६॥

अव्वल आखिर कयामत लग, कह्या नूर चढ़ता नबी का । खाली न जमाना महंमद बिना, ए बीच मुसाफ हदीस लिख्या ॥४७॥

ए जाहेर करे सोई बुजरकी, कह्या जिनका दिल अर्स । आखिर सोई नजीकी मोमिन, जो अर्स मता के वारस ॥४८॥

मोमिन उतरे नूर बिलंद से, कौल किया हक सों जिन । कह्या रसूल तुम पर आवसी, सो करसी तुमें चेतन ॥४९॥

और भेजोंगा फुरमान, सब इत की हकीकत । और इसारतें रमूजें, मासूक देसी तुमें मारफत ॥५०॥

दुनियां पैदा कलमें कुंन से, असल उनों जुलमत । जिन मिल जाओ तिन में, तुम हादी मुझ से निसबत ॥५१॥

तुम आप में रहियो साहेद, और गवाही फरिस्ते । मैं भी साहेद तुम में, तुम जिन भूलो सुकन ए ॥५२॥

याद कीजो मेरे अर्स को, और निसबत हक हादी । इलम देऊं मैं अपना, जासों सक रहे न जरे की ॥५३॥

खेल किया तुम वास्ते, ज्यों बाजी के कबूतर । जिन मिल जाओ तिन में, ओ तुम नहीं बराबर ॥५४॥

हांसी इसही बात की, मेरा इलम तुमको जगाए । तुम बका करोगे दम खेल के, पर सकोगे न आप उठाए ॥५५॥

ऐसा फरेब देखावसी, तुम हूजो खबरदार । तुम जिन भूलो आप अर्स मुझे, मैं तुमारा परवरदिगार ॥५६॥

हम कबूं न भूलें तुमको, बैठेंगे पकड़ कदम । हम तुमारे ऐसे आसिक, तुमें छोड़े नहीं एक दम ॥५७॥

तुम साहेब हमारे ऐसे मासूक, हम ऐसे तुमारे आसिक । तुमको क्यों हम भूलेंगे, और देओगे इलम बेसक ॥५८॥

ए तो बड़ी हाँसी कोई खेल में, जो ऐसी होए हमसे । मोमिन रहियो साहेद, ए हक कौल करत हममें ॥५९॥

लिख्या इन बिध जाहेर, तो भी पावें न खेल कबूतर । अकल न पोहोंचे इनों की, सो भी लिख्या लिखन हारे यों कर ॥६०॥

सब्द लिखे जो बुजरकों, सो सब आखिरी उमत का । रात सब्द सब फना के, सब्द आखिरी दिन बका ॥६१॥

सो ए बड़ाई सब उमत की, जो कही महंमद की आखिर । वह खावंद कहे खेल के, ए खेल के कबूतर ॥६२॥

एता फरक कह्या जाहेर, तो भी करें इन की सरभर । वह फरक मुरदे ज्यों जीवते, पर क्या करें अकल बिगर ॥६३॥

फुरमान ल्‍याया हक का, महंमद आया किन ऊपर । एती खबर किने ना करी, जोलों हुई आखिर ॥६४॥

बीती सदी अग्यारहीं, ‍ल्याए रसूल फुरमान । बड़े उलमा आरिफ कहावहीं, पर पड़ी न काहू पेहेचान ॥६५॥

पढ़सी को फुरमान को, लेसी को हकीकत । कलाम अल्ला को खोलसी, को लेसी हक मारफत ॥६६॥

जोलों फुरमान खुल्या नहीं, तोलों रात है सब में । एही फुरमान करसी फजर, जब लिया हाथ हादी ने ॥६७॥

कौल तोड़ जुदे किए कुफरें, मेटे मसी तफरका । एक दीन तब होएसी, दिन ऊगे अर्स बका ॥६८॥

ए अव्वल कह्या महंमद ने, आए ईसा मारसी दज्जाल । साफ दिल होसी सबों, कराए दीदार नूरजमाल ॥६९॥

इमाम इमामत उमत की, करसी अर्स अजीम ऊपर । ए होसी हैयाती सिजदा, तब हुई तमाम फजर ॥७०॥

जो अर्स से रूहें उतरीं, तामें था रूहअल्ला सिरदार । कह्या तुम पर रसूल भेजोंगा, हकें यों कौल किया करार ॥७१॥

इन विध लिख्या जाहेर, पर किने न किया बयान । ए होए तिनहीं से जाहेर, हकें जिन पर भेज्या फुरमान ॥७२॥

खिताब रसूली महंमद पर, तमामी आखिर मेंहेंदी खिताब । ए ले इलम आखिरी हक का, महंमद मेंहेंदी खोले किताब ॥७३॥

फुरमान हकें लिख भेजिया, दिया हाथ रसूल के । रूह अल्ला पर भेजिया, किन खबर न पाई ए ॥७४॥

ए आगे फुरमाया रसूलें, कौल तोड़ होसी तफरका । एक नाजी बहत्तर नारी लिखे, पर किन पाया न खुलासा ॥७५॥

कौल सोई तोड़ेंगें, जिनों होसी मजाजी दिल । होसी जुदे बुजरकी वास्ते, कह्या फिरसी फिरके मिल मिल ॥७६॥

जाहेर लिख्या मिस्कात में, मैं डरों पीछले इमामों से । गुमराह करसी दुनी को, ऐसे बुजरक होसी आखिर में ॥७७॥

होसी दिल सैतान का, और वजूद आदमी का । लोहू सैतान ज्यों बीच वजूद, ए बीच हदीस लिख्या ॥७८॥

तरफ चारों बीच वजूद के, लिख्या विध विध कर । यों दुनी निगली सैतान ने, एक हकें मोमिन बचाए फजर ॥७९॥

भाँत भाँत आलम में, रसूलें करी पुकार । बिन मोमिन कोई न कादर, जो सुनके होए हुसियार ॥८०॥

जिन विध लिख्या कुरान में, हदीसों में भी सोए । ए अर्स दिल मोमिन जानहीं, जो नूर बिलंद से उतरया होए ॥८१॥

आखिर खिताब सिर रसूल, दूजा सिर मेंहेंदी इमाम । इन विध खावंदी रूहअल्लाह की, ए तीनों एक दीन करसी तमाम ॥८२॥

ए अव्वल कह्या रसूलें, पर क्यों पावे मजाजी दिल । ना बूझे हक हादी रूहों की, जो चौदे तबक मथें मिल ॥८३॥

केहे केहे रसूलें फेर कही, ज्यों समझें सब कोए । पर ए बूझें हक हादी रूहें, और बूझे जो दूसरा होए ॥८४॥

कहे हादी हक इलम से, ज्यों एक हरफें बूझे सब बयान । पर नफस मजाजी क्या जानहीं, जाके दिल आँख बुध न कान ॥८५॥

जो रूह होवे अर्स अजीम की, नूर बिलंद से उतरी । सोई समझे हक इसारतें, और खबर न काहू परी ॥८६॥

ना तो इन बिध कही जो रसूलें, ज्यों सब समझी जाए । जाको असल ना दिल अकल, तिन हक कौल क्यों समझाए ॥८७॥

जो हक मुख आपे कही, करता हों इसारत । सो हक की हादी बिना, और न कोई समझत ॥८८॥

हकें लिखे समझ इसारतें, या ल्‍याया समझे सोए । या समझें आई जिन पर, और बूझे जो दूसरा होए ॥८९॥

तो एते दिन बूझी नहीं, साल बीते नब्बे हजार पर । क्यों समझे औलाद आदम की, हक दिल छिपी खबर ॥९०॥

निकाह हवा सों कही आदम की, निकाह अबलीस औलाद आदम । पूजे हवा खाहिस ले अपनी, जेता बुजरक आदम हर दम ॥९१॥

तो रही छिपी बीच फुरमान के, निकाह अबलीस सोहोबत अकल । सो क्यों पावें मगज मुसाफ का, कहे मुरदे मजाजी दिल ॥९२॥

जिन गेहूं खाया कौल तोड़ के, आदम तिन नसल । सो क्यों पावे रमूजें हक की, जो लिख्या अर्स असल ॥९३॥

ए फुरमान रूहअल्ला पर, ल्‍याया हक का रसूल । इमाम खिताब खोले किताब, परे न मारफत भूल ॥९४॥

खोली अग्यारहीं सदी मिनें, ए जो किताब फुरकान । मार दज्जाल करे एक दीन, मिलाए कयामत निसान ॥९५॥

इमाम मसी मिल रसूल, मार दज्जाल करसी फजर । रोज फरदा सदी बारहीं, खोली बातून उमत नजर ॥९६॥

काफर कौल कयामत के, जानते थे झूठ कर । सो सरत महंमद की सत हुई, अग्यारहीं सदी आखिर ॥९७॥

कोई एक कौल महंमद का, हुआ न चल विचल । पर क्यों बूझें औलाद आदम की, जिनकी अबलीस नसल ॥९८॥

सॉंचे कौल महंमद के, फिरवले सब पर । जो कछू कह्या सो सब हुआ, पर समझे नहीं काफर ॥९९॥

दीदार हुआ मुरदे उठे, आए हक इलम । भिस्त दोजख कही त्यों हुई, किया हिसाब चलाए हुकम ॥१००॥

कौल केतेक आए मिले, और केतेक हैं मिलने । भूल परे ना किसी कौल की, रसूलें कह्या तिनमें ॥१०१॥

निसान मिले सब बातून, अब जाहेर होसी सब । दाभ-तूल-अर्ज काफरों, स्याह मुंह करसी तब ॥१०२॥

जब खोले मगज मुसाफ के, द्वार हकीकत मारफत । एही दिन ऊगे होसी जाहेर, देखसी दुनी कयामत ॥१०३॥

महामत कहे ए मोमिनों, जिन जागी भूलो कोए । राह अर्स इस्क न छोड़िए, ज्यों सोभा लीजे ठौर दोए ॥१०४॥

॥ प्रकरण ॥२॥ चौपाई ॥२१७॥

प्रकरण तथा चौपाइयों का संपूर्ण संकलन

प्रकरण ५०३, चौपाई १८२२७

॥ छोटा कयामतनामा सम्पूर्ण ॥

इसी सन्दर्भ में देखें-