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विषय-सूची

खटरूती - प्रकरण १२ | Khatruti prakaran 12

वसंत रूत (फागुन-चैत्र) - राग मलार

वाला मारा आवी रे रूतडी वसंत, चंद्र मुख अमृत रस रे झरंत । वाला वनडू मोरयूं रे कूपलियो करंत, एणे समे न आवो तो आवे मारो अंत ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥१॥

एणे समे अबीर गुलाल उछलियां, चोवा चंदन केसर कचोले भरिया । नाहो नारी रमे रे फागणिऐ मलिया, एणे समे अमें तो घणूं कलकलिया ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥२॥

वाला वन फागणियो रे उछाले, पंखीठा करे रे कलोल बेठा माले । हांरे अम विरहणियो ना चितडा चाले, आंगणडे ऊभियो पंथडो निहाले ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥३॥

वाला वनडु कोल्यूं कामनी पामी करार, पसु पंखी हरख्या पाडे रे पुकार । वाला विरह भाजोरे विरहणियो ना आवार, एणे समे न आवो केम प्राणना आधार ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥४॥

वाला मारा चैतरिए एणे मास, पिउजी सो करता विनोद घणा हांस । वन मांहे विविध पेरे रे विलास, ते अमे अहनिस नाखूं छूं निस्वास ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥५॥

वाला मूने ए दिन केम करी जाय, पिउ जी विना खिण वरसां सो थाए । वाला मूने विलखंतां रैणी विहाय, पिउ जी विना ए दुख केने न केहेवाय ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥६॥

॥ प्रकरण ॥४॥ चौपाई ॥२४॥

इसी सन्दर्भ में देखें-