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खटरूती - प्रकरण १३ | Khatruti prakaran 13

ग्रीखम रूत (वैसाख-जेठ) - राग मलार

वाला मारा आवी रे रूतडी ग्रीखम, अमृत रस लावी रे फल उत्तम । वन फल पाकीने थया रे नरम, वाला तमे एणे समे न आवो केम ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥१॥

वाला मारा त्रट जमुनाना वृंदावन, हांरे टाढी छांहेडी तले रे कदम । पिउजी इहां देता रे पावलिए पदम, ते अमे विलखूं छूं वालाने वदन ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥२॥

वैसाख फूल्यो रे वेलडिए वेहेकार, भमरा मदया करे रे गुंजार । पंखीडा अनेक कला रे अपार, वाला वन विलस्या तणी आवार ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥३॥

वाला रवि तपेरे अंबरियो निरमल, पिउजी कारण वास्या जल रे सीतल । वदन देखाडो रे वालैया सकोमल, पिउजी अमे पंथडो निहालूं पल पल ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥४॥

वाला वनमां मेवो रे महिनो जेठ सार, एणे समे आवो रे नंदना कुमार । पिउजी तमे सदा रे सुखना दातार, वृज वधु विलखती पाडे रे पुकार ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥५॥

सखियो तारा सुखडा संभारीने रूए, हवे अम विजोगणियों ने कोण आवी जुए । पिउजी विना आंसूडा ते कोण आवी लुए, वाला पछे आवसोसूं अममुए ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥६॥

॥ प्रकरण ॥५॥ चौपाई ॥३०॥

इसी सन्दर्भ में देखें-