खटरूती - प्रकरण १४ | Khatruti prakaran 14
वरखा रूत - राग मलार
पावसियो आव्यो रे वरखा रूत मांहें, भोमलडी ढांकी रे वादलिए छाहे । अंबरियो गरजे रे वीजलडी वा वाय, पिउजी विना मारे रे अमने घाए ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥१॥
एणे समे भेला सहु घर वारी, अधखिण अलगां न थाए नर नारी । परदेस होय ते पण आवेरे संभारी, पिउजी एवी केही अप्राप्त अमारी ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥२॥
मेघलियो आवीने असाढ धडूके, सेरडियो सामसामी रे ढलूके । मोरलिया कोईलडी रे टहूके, एणे समे कंथ कामनियो ने केम मूके ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥३॥
वाला मारा भोमलडी रे नीलाणी, मेघलियो वली वली सींचे पाणी । वीजलडी चमके आभण माणी, रे पिउजी तमे एणे समे वेदना न जाणी ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥४॥
रे वालाजी श्रावणियो सलसलियो, आंभलियो आवीने भोमे लडसडियो । चहु दिस चमके गरजे गलियो, पिउडा तूं हजिए कां अमने न मलियो ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥५॥
पिउ जी तमे पेहेली कां प्रीतडी देखाडी, माहेंला मंदिरियो कां दीधां रे उघाडी । पिउजी तमे अनेक रंग रमाडी, हवे तो लई आसमाने भोम पछाडी ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥६॥
॥ प्रकरण ॥६॥ चौपाई ॥३६॥
