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विषय-सूची

खटरूती - प्रकरण १५ | Khatruti prakaran 15

बारहमासी का कलस - राग मलार

वाला मारा खटरूतना बारे मास, हां रे तेना अहनिस त्रण से ने साठ । वाला तारी रोई रोई जोई में वाट, अम ऊपर एवडो कोप कीधा स्या माट ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥१॥

वाला मारा हुती रे मोटी तारी आस, जाण्यूं अमने मूकसे नहीं रे निरास । ते तो तमे मोकल्यो तमारो खवास, तेणे आवी वछोडया सांणसिए मांस ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥२॥

रे वाला भलुं थयुं रे भ्रांतडी भागी, हांरे तारे संदेसडे अमे जागी । हांरे एणे वचने रूदे आग लागी, हवे अमे जाण्यूं चोकस अमने त्यागी ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥३॥

रे ऊधव तूं भली रे वधामणी लाव्यो, अमारे काजे सूलीने सांणसियो लई आव्यो । ऊधव तें तो अक्रूर पर इंडू रे चढाव्यो, ऊधव तें दुखडा घणूंज देखाड्यो ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥४॥

रे ऊधवडा तूं एटलूं जाण निरधार, ऊधव तूंने नथी रे बीक करतार । एणी मते पामीस नहीं तूं पार, तूं पण तारा धणीसो विछडीस आवार ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥५॥

रे ऊधव राख तूं कने तारूं डापण, पिउजी नहीं मूकूं अमें एवी पापण । ताताने म दिए वली वली तापण, सखियो हवे समझ्या संदेसडे आपण ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥६॥

ऊधव तारे डापणिए घणूं रे संतापी, रे मूरख तूंने ए मत कोंणे आपी । अमें तूंने जाण्यो नहीं एवो पापी, तें तो नाख्या अमारा अंगडा कापी ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥७॥

सखियो हवे दुखडा के ऊपर कीजे, आपणो नंद कुंअर होय तो रीझे । आपणी वातें जदूनो राय न भीजे, सखियो हवे ऊधवने संदेसा स्या दीजे ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥८॥

सखियो हवे आपोपूं सहु कोई झालो, कान्हजी होय तो दोडी जईए चालो । ए जदुराय नहीं रे गोपियोनों वहालो, सखियो हवे ऊधव ने गुझडी कां आलो ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥९॥

रे ऊधवडा अमारा धणी अम पासे, तारी मत लई जा रे तूं साथे । अधखिण अलगो न थाए अमथी नाथ, विरह मांहें विलसूं वालैया संघात ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥१०॥

रे ऊघवडा विरह मा नंदनो कुंअर, एणी अमकने खरी रे खबर । विरह मा जोयो लाधे ततपर, ते ऊधव अमे भूलूं केम अवसर ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥११॥

रे ऊधवडा अमारो धणी अममा गलियो, तमे आवतांते सांसो सर्वे टलियो । ऊधव तारी वातें चित अमारो न चलियो, विरह वधारी ऊधव पाछो वलियो ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥१२॥

सखियो हवे घरडा सहुए संभारो, रखे कोई वालाजीने दोष देवरावो । ए विरह मांहेना मांहेज मारो, सखियो एतो नहीं घर वार उघारो ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥१३॥

सखियो तमे मूको रे बीजी सहु वात, आपण ऊपर निसंक पडी रे निघात । दुखे केम मूकिए गोपीनो नाथ, हवे आपोपूं नाखो जेम रहे अख्यात ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥१४॥

सखियो हवे विना घाय नाखो आप मारी, वालाजीना विरहनी वात संभारी । वसेके वली राखो घर लोकाचारी, हवे एवी कठण कसोटी खमो नारी ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥१५॥

सखियो हवे विरहनी भारी रे उपाडो, ए अंग मायाना माया मांहें पछाडो । ए विरह बीजा कहेने मा देखाडो, सखियो विना रखे कोणे बार उघाडो ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥१६॥

सखियो मारो जीव जीवन मांहें भलियो, अमें माया ग्रही तोहे ते पल न टलियो । ए वालो अम विना कोणे न कलियो, इंद्रावती कहे अमारो अमने मलियो ॥ हो स्याम पिउ पिउ करी रे पुकारूं ॥१७॥

॥ प्रकरण ॥१५॥ चौपाई ॥२३०॥

प्रकरण तथा चौपाइयों का संपूर्ण संकलन

प्रकरण ९९, चौपाई २२०७

॥ खटरूती सम्पूर्ण ॥

इसी सन्दर्भ में देखें-