खिलवत - प्रकरण १० | Khilwat prakaran 10
कलस पंच रोसनी का
रे रूह करे ना कछू अपनी, के तूं उरझी उमत माहें । उमर गई गुन सिफत में, तोहे अजूं इस्क आया नाहें ॥१॥
हक सिर पर इन विध खड़े, देखत ना हक तरफ । जो स्वाद लगे मेहेबूब का, तो मुख ना निकसे एक हरफ ॥२॥
बात करत तूं हक की, जो रूहों सों गुफ्तगोए । इन बका की खिलवत से, कछू तोको भी नसीहत होए ॥३॥
ए सब्द कहे तैं नींद में, के सुपने करत स्वाल । के जवाब तेरे जागते, कछू देखे ना अपना हाल ॥४॥
कैसी बात करत है, किन ठौर की बात । तूं कौन गुफ्तगोए किन की, ना विचारत हक जात ॥५॥
ए बात ना होए कबूं नींद में, और सुपने भी ना एह । जो तूं बात करे जागते, तो तेरी क्यों रहे झूठी देह ॥६॥
ए बात ना नींद सुपन की, जो तूं बात करे जाग्रत । तो कौल फैल ना हाल कोई, रहे ना देह गत मत ॥७॥
जो ए बात करे जागते, तो तोहे नींद आवे क्यों फेर । नैनों पल क्यों लेवहीं, क्यों बोले और बेर ॥८॥
के तूं बुध रहित है, के तूं बोलत बेसहूर । बेसहूर क्यों कहे सके, ए हक का गुझ जहूर ॥९॥
अब तेहेकीक एही होत है, तोहे बोलावत हुकम । हुकमें वजूद रेहेत है, और हुकमें दिया इलम ॥१०॥
आए इलम हक बका के, तब देह रहे क्यों कर । बेसक हुए हक अर्स सों, सो दम रहे न हक बिगर ॥११॥
अर्स हक की बेसकी, पाई जरे जरे जेती । ज्यों जाग के केहे हकीकत, और देह बोलत सुपने की ॥१२॥
बड़ा होत है अचरज, बात जाग्रत माहें सुपना । जब कछू होवे जाग्रत, तब तो ए आगे ही से फना ॥१३॥
जो विचार विचार विचारिए, तो अनहोनी हक करत । इत बल किसी का नहीं, दिल आवे सो देखावत ॥१४॥
अर्स की रूहों को सुपना, देखो कैसे ए आया । ए भी हकें जान्या त्यों किया, अपने दिल का चाह्या ॥१५॥
देह रखी सुपन की, और सक ना जागे में । ए भी हकें जान्या त्यों किया, विचार देखो दिल में ॥१६॥
आप अर्स देखाइया, ज्यों देखिए नींद उड़ाए । जरा सक दिल ना रही, यों अर्स दिया बताए ॥१७॥
फेर देखो सुपन को, तो अजूं रह्या है लाग । फरामोसी नींद ना गई, जानों किन ने देख्या जाग ॥१८॥
जो देखूं अर्स जागते, तो इत नाहीं जरा सक । फेर देखूं तरफ सुपन की, तो यों ही खड़ा मुतलक ॥१९॥
ए बातें नूरजमाल की, इनमें कैसा तअजुब । जनम लाख देखावें पल में, जानों ढ़ांप के खोली अब ॥२०॥
एक खस-खस के दाने मिने, देखाए चौदे तबक । तो कौन बात का अचरज, ऐसे देखावें हक ॥२१॥
ऐसी बातें हक की, इत कोई सक ल्याओ जिन । देख दिन में ल्यावें रात को, और रात में ल्यावे दिन ॥२२॥
ऐसे खेल कई हक के, बैठे देखावें अर्स माहें । रूह बकाएँ लई देह नासूती, जो मुतलक कछुए नाहें ॥२३॥
तन ऐसा धर नासूत में, करी हक सों निसबत । कजा चौदे तबक की, इन तन पे करावत ॥२४॥
ऐसी अचरज बातें हक की, क्यों कहूं झूठी जुबान । कहूं इन तन का खसम, जो वाहेदत में सुभान ॥२५॥
दोस्त कहूं हक बका को, धर ऐसा झूठा तन । निसबत तुमसों तो कहूं, जो देख्या बका वतन ॥२६॥
एह विध मैं केती कहूं, कौन अचरज इन । कई बातें ऐसी हक की, जो विचार देखो रूह तन ॥२७॥
अब केहेती हों खसम को, तुम से कैसी चतुराए । ए भी जानो त्यों करो, ऐसी बनी खेल में आए ॥२८॥
जेती बातें मैं कही, तिन सब में चतुराए । ए चतुराई भी तुम दई, ना तो एक हरफ न काढ़्यो जाए ॥२९॥
एह बात रही हुकम पर, करें हक सांची सोए । या राजी या दलगीर, ए हाथ खसम के दोए ॥३०॥
उमर तो सब चल गई, आया उठने का दिन । या तो उठाओ हँसते, ज्यों जानो त्यों करो रूहन ॥३१॥
नींद आई हुकम सों, हुकमें हुआ सुपन । हुकम से जागत हैं, एक जरा न हुकम बिन ॥३२॥
हकें इलम ऐसा दिया, जो चौदे तबकों नाहें । और नाहीं नूर मकान में, सो दिया मोहे सुपने माहें ॥३३॥
ए इलम नूर जमाल बिना, दूजा कौन बकसत । मुझ बिना किने ना पाइया, मेरी बेसक रूह जानत ॥३४॥
या जानें एह मोमिन, जिन इलम पाया बेसक । तिनों नीके कर चीन्हया, जिन बूझ लिया इस्क ॥३५॥
मोमिन तिन को जानियो, नूर-जमाल सों निसबत । मेरी बेसक देसी साहेदी, जिनों पाई हक न्यामत ॥३६॥
अब इन ऊपर क्या बोलना, आगूं मेहेबूब तुम । जिन विध जानो त्यों करो, दोऊ तन तले कदम ॥३७॥
जो हक के दिल में आइया, सो सब देख्या नीके कर । जो देखाया इलमें, या देखाया नजर ॥३८॥
और जो हक के दिल में, बाकी होसी अब । जो तुम देखाओगे, सो रूहें देखें हम सब ॥३९॥
केहेना केहेलावना ना रह्या, ऐसा तुम दिया इलम । तुम बिना जरा है नहीं, ज्यों जानो त्यों करो खसम ॥४०॥
बोलिए सो सब बन्धन, ए भी बोलावत तुम । ए सहूर भी तुम देत हो, ज्यों जानो त्यों करो खसम ॥४१॥
खसम खसम तो केहेती हों, जानों खुदी रहे ना मुझ माहें । गुनाह अपनी अंगना पर, बका में आवत नाहें ॥४२॥
ए भी इलम हकें दिया, मैं कहा कहूं खसम । ठौर ना कोई बोलन की, बैठी हों तले कदम ॥४३॥
खसम खसम तो केहेती हों, जो तुम देखाई निसबत । भार भी तुम देओगे, तुम ही देओगे लज्जत ॥४४॥
दोऊ तन तले कदम के, आतम परआतम । इनमें सक कछू ना रही, यों कहे हक इलम ॥४५॥
सिखाओ चलाओ बोलाओ, सो सब हाथ हुकम । सो इलमें बेसक करी, और कहा कहूं खसम ॥४६॥
अन्तर माहें बाहेर की, सब जानत हो तुम । ए इलमें बेसक करी, अब कहा कहूं खसम ॥४७॥
साथ आए मेला मिलसी, सो सब हाथ हुकम । ए सक इलमें ना रखी, अब कहा कहूं खसम ॥४८॥
खेल कर उतारे खेल में, रूहें पोहोंची इन इलम । इन बातों सक ना रही, कहा कहूं तुमें खसम ॥४९॥
हुकमें पूरी सब उमेद, और बाकी हाथ हुकम । ए इलमें बेसक करी, अब कहा कहूं खसम ॥५०॥
दिन गए सो तुम जानत, बाकी भी जानत तुम । जिन विध राखो त्यों रहूं, कहा कहूं खसम ॥५१॥
ठौर और कोई ना रही, सो बेसक करी इलम । ए बेवरा तुम कहावत, सो केहेती हों खसम ॥५२॥
चौदे तबक सिर मलकूत, ए तो कुरसी फरिस्तों अर्स । इन सिर ला-मकान है, आगूं सब्द न चले निकस ॥५३॥
फना तले ला मकान लग, आगूं नूर-मकान बका । उतथें उतरे सो चढ़े, और चढ़ ना सके इत का ॥५४॥
देख्या बेचून बेचगून को, और बेसबी बेनिमून । निराकार देख्या ला निरंजन, ए बेसक पड़ी सब सुंन ॥५५॥
अव्वल इलमें देखाइया, आखिर बेसक इलम । चौदे तबक देखे नूर लग, ठौर नहीं बिना तेरे तले कदम ॥५६॥
और नजीक न कोई फरिस्ता, कोई नाहीं इन्सान और । हादी रूहें तेरे कदम तले, कोई और न पोहोंचे इन ठौर ॥५७॥
गिरो नजीकी फरिस्ते, इनका नूर-मकान । ए मलकूत में रेहे ना सकें, चढ़ ना सकें लाहूत आसमान ॥५८॥
नूर-मकान का खावंद, जिनके होत एक पल । कोट ब्रह्मांड ऐसे होए के, वाही खिन में जात हैं चल ॥५९॥
इन नूर-मकान का खावंद, जाको नामै नूर-जलाल । आवत दायम दीदार को, जित अर्स नूर-जमाल ॥६०॥
दई साख रसूल अल्लाह ने, ना पोहोंचे जबराईल इत । कहे पर जले तजल्ली से, ताथें जोए ना उलंघत ॥६१॥
इन अर्स नूरजमाल के, हादी रूहें इन दरगाह माहें । रूहें इन कदम तले, और ठौर ना कोई क्याहें ॥६२॥
नूर-जलाल दीदार बाहेर से, करके पीछे फिरत । नूर-जमाल के कदमों, बड़ीरूह रूहें बसत ॥६३॥
ए ना खबर नूरजलाल को, सुख नूरजमाल कदम । इन बातों सब बेसक करी, मोहे रूह-अल्ला इलम ॥६४॥
हादी रूहों को खेल देखाइया, देख्या बैठे तले कदम । और न कोई केहे सके, बिना निसबत खसम ॥६५॥
मोहे इन इलमें बेसक करी, सक न जरा इलम । दई बेसकी सबन को, ठौर नहीं बिना तेरे कदम ॥६६॥
रूहें बारे हजार नूर बड़ी रूह के, बड़ी रूह नूर खसम । ए ठौर बेसक देखिया, बिना नहीं तले तेरे कदम ॥६७॥
फेर फेर दई ए बेसकी, याही वास्ते भेज्या इलम । जाने जिन भूलें रूहें खेल में, याद देने हक कदम ॥६८॥
ए हादी रूहें इन कदम तले, जिनको कहे मोमिन । फुरमान इसारतें रमूजें, आई कुन्जी ऊपर इन ॥६९॥
कुंजी हाथ रूहअल्ला, और रसूल हाथ फुरमान । भेजे इमाम पे खेल में, सो हादी रूहों लिए निसान ॥७०॥
नासूत में बैठाए के, भेज्या बेसक इलम । एक जरे जेती सक ना रही, बैठी बेसक तले कदम ॥७१॥
ए सक हमको तो मिटी, जो हम बैठे तले कदम । फरामोसी हम को मिटावने, भेज्या तुम अपना इलम ॥७२॥
आया फुरमान खेल देखावने, और आया हक इलम । ए खेल नीके तब देखिया, जब देख्या बैठे तले कदम ॥७३॥
तुम मोहे ऐसा देखाइया, एक वाहेदत में हैं हम । दूजा कछुए है नहीं, बिना तुम तले कदम ॥७४॥
ए भी इलम तुम दिया, जासों तुम हुए मुकरर । दिल सों रूहों विचारिया, कछू है ना वाहेदत बिगर ॥७५॥
ए तेहेकीक तुम कर दिया, तुम बिना कछुए नाहें । ए भी तुम कहावत, इत मैं न आवत मुझ माहें ॥७६॥
ए जिन बिध हक बोलावत, तिन बिध रूह बोलत । हम बैठे तले कदम के, ए हम पे हक कहावत ॥७७॥
अनजानत को इलमें, बेसक दिए देखाए । कदमों नूरजमाल के, हम सब रूहें लई बैठाए ॥७८॥
तुम बैठाए बैठत हों, मुझ में नहीं ताकत । बैठी कदम तले हक, ए भी तुम कहावत ॥७९॥
महामत कहे मेहेबूब जी, कोई रह्या न और उदम । बेसक और काहूं नहीं, बिना तेरे तले कदम ॥८०॥
॥ प्रकरण ॥१०॥ चौपाई ॥५२२॥
